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केरल: मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (Special Intensive Revision - SIR) पर चल रही बहस में, कानूनी वैधता और इसे लागू करने में आने वाली कमियों को अलग-अलग करके देखा जाना चाहिए। देश भर में हाल की घटनाओं ने मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) पर चल रही बहस को और तेज़ कर दिया है। इस पूरे मुद्दे को समझने के लिए तीन सवालों पर स्पष्ट रूप से बात होनी चाहिए: SIR क्या है, इसकी ज़रूरत क्यों है, और इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त की क्या भूमिका होती है? सबसे पहले यह स्पष्ट कर लेना चाहिए कि SIR, मौजूदा चुनाव आयोग की कोई नई योजना या रणनीति नहीं है, बल्कि भारत में यह एक स्थापित प्रक्रिया है। असल में, मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 324 और 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950' की धारा 21(3) के तहत, चुनाव आयोग को यह प्रक्रिया चलाने का अधिकार दिया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि SIR को सिर्फ इसलिए 'गैर-कानूनी' नहीं माना जा सकता क्योंकि यह हर साल होने वाले सामान्य पुनरीक्षण से अलग है। इसके उलट, कोर्ट ने कहा कि SIR का उद्देश्य स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के सिद्धांत के अनुरूप है। कानूनी वैधता के सवाल पर, यह मामला काफी हद तक सुलझा हुआ है।
इसकी ज़रूरत क्यों है? स्वतंत्र चुनाव के लिए मतदाता सूची का एकदम सही और साफ़ होना बहुत ज़रूरी है। ज़्यादातर राज्यों में पिछली बार 'गहन पुनरीक्षण' (intensive revision) 2000 के दशक की शुरुआत में हुआ था। पिछले दो दशकों में भारत में बड़े पैमाने पर लोगों का पलायन हुआ है, तेज़ी से शहरीकरण हुआ है, और कई लोगों की मौतें हुईं जिनका रिकॉर्ड कभी दर्ज ही नहीं किया गया। नतीजतन, कई मतदाता एक से ज़्यादा जगहों पर पंजीकृत हो गए हैं। हर साल होने वाले सामान्य पुनरीक्षण से इन कमियों और एक से ज़्यादा जगहों पर दर्ज नामों (multiple-entries) को पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता। इसलिए, समय-समय पर दोबारा सर्वे करना एक व्यावहारिक ज़रूरत है।
आलोचक क्या कहते हैं? आलोचकों का तर्क है कि दस्तावेज़ जुटाने का सबसे ज़्यादा बोझ प्रवासियों, गरीबों और महिलाओं पर पड़ता है, जिसकी वजह से कई योग्य मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं। उन्हें इस बात पर भी आपत्ति है कि चुनाव आयोग नागरिकता से जुड़े सवालों पर विचार कर रहा है। उनका कहना है कि चुनाव से ठीक पहले ऐसा करने और पारदर्शिता की कमी के कारण लोगों का भरोसा कम हुआ है। वे चुनाव आयोग पर यह आरोप भी लगाते हैं कि आयोग पारदर्शी नहीं है और विपक्ष की शिकायतों का जवाब देने में बहुत सुस्त है। इन आरोपों की सच्चाई का पता लगाने के लिए, उचित कानूनी प्रक्रिया और सही रास्ते का पालन किया जाना चाहिए। इसके अलावा, मनमानी और सत्ता के दुरुपयोग के आरोपों को प्रचार के आधार पर नहीं, बल्कि सबूतों के आधार पर परखा जाना चाहिए। इसलिए, यह एक तथ्यात्मक सवाल है कि क्या यह प्रक्रिया निष्पक्ष और सटीक रही है। इसका जवाब अंतिम रूप से हटाए गए नामों की संख्या, गलत तरीके से हटाए गए कितने मतदाताओं को वापस सूची में शामिल किया गया, और वास्तव में कितनी फर्जी प्रविष्टियों को हटाया गया, इसमें छिपा है।
कुछ राज्यों में 'एसआईआर' (SIR) कवायद यह दिखाती है कि पुरानी और अद्यतन (अपडेटेड) सूची के बीच कितना बड़ा अंतर हो सकता है। गौर करने वाली बात यह है कि इसे स्वीकार भी कर लिया गया है, क्योंकि ऐसा न करने पर भविष्य के चुनावों पर इसके बुरे प्रभाव पड़ सकते थे। यह पूछना कि क्या 'एसआईआर' ने हाल के चुनावों को प्रभावित किया, एक तरह से केवल सैद्धांतिक चर्चा है। हर चुनाव से पहले पूरी सूची का पुनरीक्षण (रिवीजन) करना व्यावहारिक नहीं है, और बिल्कुल भी पुनरीक्षण न करने के अपने नुकसान हैं—जैसे कि मतदाता सूची का बहुत बड़ा और अविश्वसनीय हो जाना। इसका समाधान अदालतों में है, न कि इस्तीफे में। यह सोचना एक आदर्शवादी कल्पना होगी कि हर कदम बिना किसी गलती के उठाया गया होगा और लागू करने में कोई कमी नहीं रही होगी।
लेकिन, प्रक्रिया को लागू करने में आई कमियां पूरी प्रक्रिया को ही गलत नहीं ठहरा देतीं। जहां प्रक्रियात्मक चूक का आरोप हो, वहां जरूरत पड़ने पर संबंधित अधिकारियों के पास जाना चाहिए—जैसा कि अदालतें पहले भी कर चुकी हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग करने से गलत तरीके से हटाया गया नाम वापस नहीं आ जाता। इसके बजाय, लिखित शिकायतें, पारदर्शी डेटा और न्यायिक समीक्षा ही सही समाधान हैं; और यही एक तरह से संविधान और संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखना है। - जस्टिस वी. चिताम्बरेश, पूर्व न्यायाधीश, केरल उच्च न्यायालय
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