
तिरुवनंतपुरम। केरल में स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) से पीड़ित बच्चों को दी जा रही दवाओं को लेकर विवाद गहरा गया है। क्लिनिकल ट्रायल के लिए चिह्नित दवाओं की आपूर्ति और उनके इस्तेमाल पर सवाल उठने के बाद राजनीतिक बहस तेज हो गई है। राज्य की तीन पूर्व महिला स्वास्थ्य मंत्रियों ने इस मामले की आलोचना करते हुए मरीजों की सुरक्षा और दवा वितरण की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। इसके बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी CPI(M) को अपने रुख पर सफाई देनी पड़ी है।
केरल के पूर्व मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता पिनाराई विजयन ने स्पष्ट किया है कि उनकी पार्टी जेनेरिक दवाओं के खिलाफ नहीं है। CPI(M) की आपत्ति उन दवाओं को मरीजों तक पहुंचाए जाने को लेकर है, जिनकी पैकेजिंग पर ‘केवल क्लिनिकल ट्रायल के लिए’ जैसे लेबल होने की बात सामने आई है। विजयन ने इस मामले में पारदर्शिता और मरीजों की सुरक्षा से जुड़े सवालों को गंभीर बताते हुए सरकार से जवाब मांगा है।
तीन पूर्व स्वास्थ्य मंत्रियों ने उठाए सवाल
इस विवाद के बीच केरल की तीन पूर्व स्वास्थ्य मंत्रियों और CPI(M) नेताओं पी.के. श्रीमती, के.के. शैलजा और वीणा जॉर्ज ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस की। तीनों ने SMA मरीजों को कथित तौर पर क्लिनिकल ट्रायल के लिए चिह्नित दवाएं दिए जाने पर चिंता जताई और राज्य के मौजूदा स्वास्थ्य मंत्री के. मुरलीधरन से मामले में जवाबदेही तय करने की मांग की।
पूर्व मंत्रियों ने दवाओं की खरीद, अस्पताल तक उनकी आपूर्ति और मरीजों को दिए जाने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे बच्चों के इलाज में दवाओं की सुरक्षा और नियामकीय प्रक्रिया का पालन सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
पी.के. श्रीमती ने आरोप लगाया कि दवाओं के पैकेट पर मौजूद लेबल को लेकर मरीजों के परिजनों ने चिंता जताई थी। पूर्व मंत्रियों ने इस पूरे मामले की व्यापक जांच कराने की मांग भी की। हालांकि, दवाओं के लेबल से संबंधित आरोपों और उनके वास्तविक नियामकीय दर्जे की पुष्टि जांच तथा संबंधित दस्तावेजों के आधार पर होनी बाकी है।
जेनेरिक दवा और क्लिनिकल ट्रायल के लेबल में अंतर
विवाद का मुख्य मुद्दा यह है कि SMA के इलाज में इस्तेमाल होने वाली जेनेरिक दवा और क्लिनिकल ट्रायल के लिए चिह्नित दवा को लेकर अलग-अलग चिंताएं सामने आई हैं। जेनेरिक दवा किसी पहले से स्थापित दवा के सक्रिय घटक पर आधारित होती है, जबकि क्लिनिकल ट्रायल का लेबल दवा के परीक्षण या उसके निर्धारित उपयोग से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी हो सकता है। इसलिए पैकेजिंग पर इस तरह का उल्लेख होने पर दवा की गुणवत्ता, मंजूरी और मरीजों को देने की प्रक्रिया की स्पष्ट जांच जरूरी हो जाती है।
इस मामले में स्विट्जरलैंड की दवा कंपनी रोश की दवा एव्रीस्डी (रिस्डिप्लाम) के भारतीय जेनेरिक विकल्प नैटस्मार्ट को लेकर विवाद हुआ है। यह दवा SMA से पीड़ित बच्चों के इलाज में इस्तेमाल की जाती है। विवाद के बाद अभिभावकों की चिंता का विषय यह रहा कि क्या उन्हें दी गई दवा की प्रकृति और उसके लेबल के बारे में पर्याप्त जानकारी दी गई थी।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। किसी दवा के पैकेट पर क्लिनिकल ट्रायल का उल्लेख होने से अपने आप यह साबित नहीं होता कि दवा असुरक्षित है। लेकिन इस तरह की स्थिति में यह स्पष्ट होना चाहिए कि दवा किस श्रेणी में आती है, उसके इस्तेमाल की अनुमति क्या है और उसे मरीजों को किस प्रक्रिया के तहत दिया गया।
स्वास्थ्य मंत्री ने दवा को बताया उपयुक्त
विवाद पर राज्य के स्वास्थ्य मंत्री के. मुरलीधरन ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि दवा की आपूर्ति विशेषज्ञ समिति की सिफारिश के आधार पर की गई। उन्होंने दवा की गुणवत्ता पर सवाल उठाने वाले आरोपों का विरोध किया और कहा कि विशेषज्ञों ने इसके इस्तेमाल को उपयुक्त बताया है।
मंत्री के अनुसार, दवा को लेकर चिंता जताने वाले परिवारों की बातों पर गौर किया जा सकता है और लिखित शिकायत मिलने पर मामले की जांच कराई जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय कंपनी की दवा की आपूर्ति जारी रखी जाएगी, क्योंकि उसके निर्माण की गुणवत्ता पर कोई औपचारिक शिकायत सामने नहीं आई है।
इस तरह विवाद में दो प्रमुख सवाल सामने आए हैं। पहला, क्या दवा की खरीद और आपूर्ति की प्रक्रिया में सभी जरूरी नियमों का पालन किया गया? दूसरा, क्या मरीजों और उनके माता-पिता को दवा के लेबल, उसकी मंजूरी तथा इस्तेमाल के बारे में पर्याप्त जानकारी दी गई?
मरीजों के परिवारों की चिंता बनी अहम मुद्दा
स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी है, जो मांसपेशियों की ताकत और काम करने की क्षमता को धीरे-धीरे प्रभावित करती है। इस बीमारी से पीड़ित बच्चों के इलाज में दवा की निरंतरता, चिकित्सकीय निगरानी और उपचार संबंधी स्पष्ट जानकारी बेहद महत्वपूर्ण होती है।
ऐसे में दवा बदलने या नए विकल्प का इस्तेमाल करने को लेकर माता-पिता की चिंताओं को गंभीरता से लेना जरूरी है। परिवारों को यह जानने का अधिकार है कि उनके बच्चों को कौन-सी दवा दी जा रही है, वह किस आधार पर चुनी गई है और उसके इस्तेमाल से संबंधित चिकित्सकीय निर्णय किसने लिया है।
हालांकि, किसी दवा को लेकर विवाद सामने आने के आधार पर मरीजों को खुद इलाज बंद करने या दवा बदलने का फैसला नहीं करना चाहिए। ऐसे मामलों में इलाज कर रहे विशेषज्ञ डॉक्टरों से सलाह लेना जरूरी है।
राजनीतिक विवाद के बीच जांच और पारदर्शिता की मांग
तीन पूर्व स्वास्थ्य मंत्रियों की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस और पिनाराई विजयन की प्रतिक्रिया के बाद यह मुद्दा केरल की राजनीति में भी चर्चा का विषय बन गया है। CPI(M) ने अपनी आपत्ति को जेनेरिक दवाओं के विरोध के बजाय क्लिनिकल ट्रायल के लिए चिह्नित दवाओं की आपूर्ति और उससे जुड़ी प्रक्रिया पर केंद्रित बताया है।
दूसरी ओर, मौजूदा स्वास्थ्य मंत्री ने विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों का हवाला देते हुए दवा को उपयुक्त बताया है। ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष जांच, संबंधित दस्तावेजों की समीक्षा और दवा के नियामकीय दर्जे को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा।
फिलहाल इस विवाद का निर्णायक निष्कर्ष जांच और उपलब्ध चिकित्सकीय एवं नियामकीय साक्ष्यों के आधार पर ही निकाला जा सकता है। मरीजों की सुरक्षा, अभिभावकों का भरोसा और दवा खरीद की पारदर्शिता इस मामले के सबसे महत्वपूर्ण पहलू हैं।





