
तिरुवनंतपुरम। केरल में इसी साल मई में हुए विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत दर्ज कर सत्ता में आई कांग्रेस की अगुवाई वाली यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी UDF सरकार को स्थानीय निकाय उपचुनाव में झटका लगा है। राज्य के विभिन्न स्थानीय निकायों की 38 सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजे मंगलवार को सामने आए। इनमें UDF ने 19 सीटें जीतीं, जबकि इन 38 सीटों में पहले उसके पास 22 सीटें थीं। इस तरह गठबंधन को तीन सीटों का शुद्ध नुकसान हुआ। वहीं विपक्षी लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी LDF ने अपनी सीटों की संख्या 15 से बढ़ाकर 18 कर ली। एक सीट ट्वेंटी-20 के खाते में गई।
ये उपचुनाव मई में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन के नेतृत्व वाली UDF सरकार की पहली चुनावी परीक्षा माने जा रहे थे। विधानसभा चुनाव में UDF ने 140 में से 102 सीटों पर जीत दर्ज की थी। ऐसे में स्थानीय निकायों के उपचुनाव के नतीजों पर राजनीतिक दलों की खास नजर थी। हालांकि केवल 38 वार्ड और डिवीजन में हुए इन उपचुनावों को पूरे राज्य के जनमत का सीधा संकेत मानना उचित नहीं होगा, लेकिन सत्ता संभालने के चार महीने बाद आए नतीजों ने राजनीतिक चर्चा जरूर तेज कर दी है।
उपचुनाव में UDF को कुछ महत्वपूर्ण सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। विपक्षी LDF ने UDF के कब्जे वाली सात सीटें अपने नाम कीं, जबकि UDF ने LDF से चार सीटें छीनीं। इसी कारण कुल आंकड़े में UDF की संख्या 22 से घटकर 19 हो गई और LDF 15 से बढ़कर 18 सीटों पर पहुंच गया।
UDF के लिए सबसे बड़ा झटका उन सीटों पर माना जा रहा है, जो उसके नेताओं या मौजूदा विधायकों से जुड़ी थीं। पालक्काड की चित्तूर नगरपालिका में कांग्रेस ने वह वार्ड गंवा दिया, जिसका प्रतिनिधित्व पहले सुमेश अच्युतन करते थे। वह बाद में विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। इसी तरह कोट्टायम जिला पंचायत के त्रिक्कोडिथानम डिवीजन में UDF सहयोगी केरल कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। यह सीट विनु जॉब के विधानसभा चुनाव जीतने के बाद खाली हुई थी।
त्रिक्कोडिथानम डिवीजन में CPM उम्मीदवार मंजू सुजीत ने जीत दर्ज की। यह परिणाम LDF के लिए खास माना जा रहा है क्योंकि यह सीट पहले UDF के पास थी। वहीं कुछ अन्य जिलों में UDF अपने गढ़ बचाने में सफल रहा और उसने LDF के कब्जे वाली सीटें भी जीतीं। इससे साफ है कि परिणाम पूरी तरह एकतरफा नहीं रहे।
उपचुनाव में मतदान प्रतिशत भी विधानसभा चुनाव की तुलना में काफी कम रहा। 38 स्थानीय निकाय सीटों पर करीब 58.81 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया, जबकि अप्रैल में हुए विधानसभा चुनाव में मतदान लगभग 80 प्रतिशत के आसपास था। कम मतदान भी परिणामों के विश्लेषण में एक महत्वपूर्ण पहलू माना जा रहा है।
LDF ने नतीजों को अपने लिए राजनीतिक वापसी का संकेत बताया है। CPM के राज्य नेतृत्व ने कहा कि 2025 में इन्हीं 38 सीटों में LDF के पास 15 सीटें थीं, जो अब बढ़कर 18 हो गई हैं। वहीं UDF की सीटें 22 से घटकर 19 रह गईं। LDF का दावा है कि कई ऐसी सीटों पर भी UDF की जीत का अंतर कम हुआ है, जहां वह सीट बचाने में सफल रहा।
विपक्ष के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने भी नतीजों को लेकर UDF सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि सत्ता में आने के चार महीने के भीतर ही सरकार के खिलाफ असंतोष सामने आने लगा है। यह विपक्ष का राजनीतिक आकलन है, जबकि सत्तारूढ़ UDF ने इन सीमित उपचुनावों को पूरे राज्य के मूड का प्रतिनिधि मानने से इनकार किया है।
UDF सरकार ने सत्ता संभालने के बाद कई लोकप्रिय घोषणाएं की हैं। इनमें राज्य परिवहन निगम की बसों में महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा जैसी योजनाएं शामिल हैं। वहीं सरकार को कुछ नीतिगत विवादों, कल्याण पेंशन के भुगतान में देरी, सरकारी अस्पतालों में दवाओं की उपलब्धता, बिजली आपूर्ति और अन्य प्रशासनिक मुद्दों पर विपक्ष की आलोचना का सामना भी करना पड़ा है।
राजनीतिक नजरिए से इन नतीजों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि विधानसभा चुनाव में UDF को प्रचंड जनादेश मिला था। विधानसभा में कांग्रेस अकेले 63 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी है और सहयोगी दलों के साथ मिलकर UDF की सरकार बनी। ऐसे में स्थानीय स्तर पर सीटों का नुकसान सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए संगठन और जमीनी समर्थन की समीक्षा का कारण बन सकता है।
हालांकि 38 सीटों का उपचुनाव राज्य की हजारों स्थानीय निकाय सीटों के मुकाबले बहुत छोटा नमूना है। इस कारण इसे राज्य सरकार के खिलाफ व्यापक जनादेश कहना उचित नहीं होगा। फिर भी यह पहला मौका था जब विधानसभा चुनाव के बाद मतदाताओं ने स्थानीय स्तर पर UDF और LDF को आमने-सामने परखा।
नतीजों के बाद अब दोनों प्रमुख गठबंधनों की नजर आने वाले चुनावों पर रहेगी। UDF के लिए चुनौती यह होगी कि वह विधानसभा चुनाव में मिली राजनीतिक बढ़त को स्थानीय स्तर पर भी बनाए रखे। वहीं LDF इन नतीजों को संगठन मजबूत करने और सरकार पर दबाव बढ़ाने के अवसर के रूप में देख रहा है।
फिलहाल आंकड़े साफ बताते हैं कि 38 सीटों में UDF 22 से घटकर 19 पर आया है, जबकि LDF 15 से बढ़कर 18 सीटों पर पहुंच गया है। इससे केरल की राजनीति में सत्ता और विपक्ष के बीच मुकाबला एक बार फिर तेज होता दिखाई दे रहा है।





