
कोल्लांगोड: धान की खेती करने वाले किसानों के लिए एक नई चिंता सामने आई है। कृषि विभाग ने धान के खेतों में फैल रही एक बीमारी को लेकर किसानों को सतर्क रहने की सलाह दी है। अधिकारियों के अनुसार, ओलाकारिया बीमारी की तरह ही यह बीमारी भी धान की फसल को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर रही है।
कृषि विभाग ने बताया कि कोल्लांगोड क्षेत्र के कई धान के खेतों में इस बीमारी के लक्षण देखने को मिले हैं। बारिश के बाद बढ़ी नमी और अनुकूल मौसम की वजह से इसके तेजी से फैलने की आशंका जताई जा रही है।
अधिकारियों का कहना है कि किसानों को समय रहते फसल की निगरानी करनी चाहिए और बीमारी के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर तुरंत कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेनी चाहिए। यदि बीमारी को शुरुआती चरण में नियंत्रित नहीं किया गया तो इसका असर उत्पादन पर पड़ सकता है।
कृषि विभाग के मुताबिक, यह बीमारी केवल कीटनाशकों के इस्तेमाल से पूरी तरह खत्म नहीं की जा सकती। इसके फैलने के कई माध्यम हैं, जिनमें मिट्टी, पानी और हवा शामिल हैं। इसलिए बीमारी के नियंत्रण के लिए किसानों को व्यापक उपाय अपनाने की जरूरत है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बारिश के बाद खेतों में नमी बढ़ जाती है, जो कई प्रकार की फफूंद और रोगजनक तत्वों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करती है। ऐसे मौसम में धान की फसल में बीमारियों का खतरा सामान्य दिनों की तुलना में अधिक बढ़ जाता है।
कृषि अधिकारियों ने किसानों को सलाह दी है कि वे खेतों में जल निकासी की उचित व्यवस्था रखें। खेतों में लंबे समय तक पानी जमा रहने से बीमारी फैलने की संभावना बढ़ सकती है।
इसके अलावा, खेतों की नियमित निगरानी करने, संक्रमित पौधों को पहचानने और जरूरत पड़ने पर उन्हें अलग करने की सलाह दी गई है। इससे बीमारी को अन्य हिस्सों में फैलने से रोका जा सकता है।
कृषि विभाग का कहना है कि केवल रासायनिक दवाओं पर निर्भर रहने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखना, संतुलित उर्वरकों का उपयोग करना और खेती के वैज्ञानिक तरीकों को अपनाना भी जरूरी है।
धान राज्य के प्रमुख कृषि उत्पादों में शामिल है और बड़ी संख्या में किसान इसकी खेती पर निर्भर हैं। ऐसे में फसल में किसी भी तरह की बीमारी किसानों की आय को प्रभावित कर सकती है।
अधिकारियों ने कहा कि किसान घबराएं नहीं, बल्कि सतर्क रहें। कृषि विभाग की टीमें स्थिति पर नजर रख रही हैं और प्रभावित क्षेत्रों में किसानों को आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, मौसम में बदलाव के कारण फसलों में नई-नई बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। इसलिए किसानों को पारंपरिक तरीकों के साथ-साथ वैज्ञानिक सलाह को भी अपनाना चाहिए।
कई बार किसान बीमारी की पहचान नहीं कर पाते और गलत दवाओं का इस्तेमाल कर देते हैं, जिससे खर्च बढ़ जाता है और फसल को नुकसान भी हो सकता है। इसलिए विशेषज्ञों से सलाह लेकर ही उपचार करना बेहतर विकल्प है।
कोल्लांगोड क्षेत्र में बीमारी के मामले सामने आने के बाद कृषि विभाग ने निगरानी बढ़ा दी है। अधिकारियों का कहना है कि खेतों की स्थिति का लगातार निरीक्षण किया जा रहा है और किसानों को जागरूक किया जा रहा है।
फिलहाल कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे अपने खेतों में धान की फसल पर नजर रखें और किसी भी असामान्य लक्षण की जानकारी तुरंत संबंधित कृषि अधिकारियों को दें।





