
बेंगलुरु। कर्नाटक में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के दौरान ‘नो-मैपिंग’ और ‘लॉजिकल गड़बड़ियों’ को लेकर नोटिस पाने वाले मतदाताओं के बीच बनी असमंजस की स्थिति पर चुनाव आयोग ने नया निर्देश जारी किया है। अब ऐसे मतदाताओं को सामान्य परिस्थितियों में AERO या ERO कार्यालय जाकर व्यक्तिगत सुनवाई में शामिल होने की जरूरत नहीं होगी। बूथ लेवल अधिकारी यानी BLO संबंधित मतदाताओं के घर जाकर जरूरी दस्तावेज जुटाएंगे और उन्हें ECINet पर अपलोड करेंगे।
चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को यह फैसला लिया। इसके बाद उन सभी राज्यों में आमने-सामने की सुनवाई की प्रक्रिया रोक दी गई, जहां SIR के दौरान मतदाताओं को ‘नो-मैपिंग’ या ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के नोटिस जारी किए गए थे। कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने भी राज्य में व्यक्तिगत सुनवाई तत्काल रोकने के निर्देश दिए।
इससे पहले बड़ी संख्या में मतदाताओं को नोटिस देकर तय तारीख और समय पर ERO या AERO कार्यालय में उपस्थित होने को कहा गया था। इसके कारण खासकर बेंगलुरु में मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति बनी हुई थी। कई लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि पुराने नोटिस के अनुसार कार्यालय पहुंचें या नए निर्देश के मुताबिक BLO के घर आने का इंतजार करें।
कर्नाटक में SIR प्रक्रिया के दौरान ‘नो-मैपिंग’ और डेटा में तार्किक गड़बड़ियों के बड़ी संख्या में मामले सामने आए हैं। अकेले बेंगलुरु में सितंबर की शुरुआत तक 24.06 लाख से अधिक नोटिस तैयार किए गए थे। इनमें करीब 17.81 लाख नोटिस ‘नो-मैपिंग’ और 6.24 लाख से ज्यादा नोटिस डेटा से जुड़ी अलग-अलग विसंगतियों के कारण जारी किए गए थे।
‘नो-मैपिंग’ का मतलब ऐसे मामलों से है, जहां किसी वर्तमान मतदाता की जानकारी को पुरानी SIR मतदाता सूची से स्पष्ट रूप से जोड़ा नहीं जा सका। वहीं ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ में नाम, उम्र, माता-पिता की जानकारी या दूसरे डेटा में ऐसा अंतर शामिल हो सकता है, जिसे सिस्टम ने जांच के लिए चिह्नित किया है। उदाहरण के तौर पर नाम में अंतर, उम्र में असंगति या माता-पिता और बच्चों की उम्र के बीच असामान्य अंतर जैसे मामलों को इस श्रेणी में रखा गया है।
पहले की प्रक्रिया के तहत ऐसे नोटिस मिलने पर मतदाता को संबंधित निर्वाचन अधिकारी के सामने उपस्थित होकर दस्तावेज दिखाने होते थे। बेंगलुरु में इसके लिए 1,300 से अधिक AERO अधिकारियों को सुनवाई की जिम्मेदारी भी दी गई थी। हजारों मतदाता पहले ही व्यक्तिगत सुनवाई में शामिल हो चुके थे।
अब चुनाव आयोग ने इस प्रक्रिया को आसान करने का फैसला किया है। नए निर्देश के मुताबिक BLO खुद मतदाता के घर जाएंगे, जरूरी दस्तावेज लेंगे और उन्हें ECINet सिस्टम में अपलोड करेंगे। इसके बाद ERO उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर संबंधित मामले पर फैसला करेगा।
चुनाव आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि व्यक्तिगत सुनवाई केवल असाधारण परिस्थितियों में ही कराई जाएगी। यदि किसी मामले में सुनवाई जरूरी हो तो उसे जहां संभव हो ऑनलाइन माध्यम से किया जाएगा। जरूरत पड़ने पर मतदाता की अनुमति से परिवार का कोई वयस्क सदस्य भी उसकी ओर से सुनवाई में शामिल हो सकता है।
इस फैसले का उद्देश्य बुजुर्गों, दिव्यांगों, बीमार लोगों और उन मतदाताओं को राहत देना है जिन्हें केवल दस्तावेज जमा करने के लिए निर्वाचन कार्यालय जाना पड़ रहा था। चुनाव आयोग ने जिला निर्वाचन अधिकारियों को जरूरत के मुताबिक सहायता डेस्क और विशेष शिविर लगाने के निर्देश भी दिए हैं।
हालांकि पुराने नोटिस में व्यक्तिगत सुनवाई की तारीख लिखी होने के कारण कई मतदाताओं के बीच अभी भी भ्रम बना हुआ है। चुनाव आयोग के नए निर्देश के अनुसार सामान्य रूप से उन्हें पुराने कार्यक्रम के मुताबिक कार्यालय जाने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। स्थानीय BLO या निर्वाचन कार्यालय की ओर से दस्तावेज संग्रह की नई व्यवस्था लागू की जानी है।
यह बदलाव ऐसे समय किया गया है जब SIR प्रक्रिया और ECINet सिस्टम को लेकर कई सवाल उठे हैं। चुनाव आयोग ने ECINet की समीक्षा के लिए एक समिति गठित करने का भी फैसला किया है। इसमें एक वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त के साथ IIT या IIIT से एक स्वतंत्र विशेषज्ञ को शामिल किया जाएगा। समिति यह देखेगी कि सिस्टम चुनाव कानूनों और नियमों के अनुरूप काम कर रहा है या नहीं।
कर्नाटक में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ वाले मामलों की जांच को लेकर पहले से भी कुछ राहत की बात कही गई थी। ऐसे मामलों में ‘नो-मैपिंग’ की तुलना में कम दस्तावेजी जांच की जरूरत पड़ सकती है और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर ERO निर्णय कर सकते हैं।
राज्य में लाखों नोटिस जारी होने के कारण निर्वाचन अधिकारियों पर भी भारी दबाव पड़ा है। सितंबर के अंतिम सप्ताह तक कर्नाटक में जारी करीब 43.8 लाख नोटिसों में से 41.6 लाख से अधिक नोटिस मतदाताओं तक पहुंचाए जा चुके थे।
नई व्यवस्था के बाद अब बड़ी जिम्मेदारी BLO पर आ गई है। उन्हें घर-घर जाकर उन मतदाताओं से संपर्क करना होगा जिनके रिकॉर्ड में समस्या चिह्नित हुई है। दस्तावेज हासिल करने के बाद उन्हें डिजिटल सिस्टम में अपलोड करना होगा ताकि ERO बिना मतदाता को कार्यालय बुलाए मामले पर निर्णय ले सके।
चुनाव आयोग ने यह भी कहा है कि SIR का उद्देश्य पात्र मतदाताओं को सूची से बाहर करना नहीं, बल्कि मतदाता सूची को सही और अपडेट रखना है। आयोग के अनुसार जिन लोगों के नाम किसी कारण से सूची में शामिल नहीं हो पाए हैं, वे निर्धारित प्रक्रिया के जरिए नाम जुड़वाने के लिए आवेदन कर सकते हैं।
फिलहाल कर्नाटक में ऐसे मतदाताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यही है कि ‘नो-मैपिंग’ या ‘लॉजिकल गड़बड़ी’ का नोटिस मिलने मात्र से ERO या AERO कार्यालय में व्यक्तिगत रूप से पहुंचना अब सामान्य नियम नहीं है। दस्तावेज लेने की जिम्मेदारी BLO को दी गई है और आमने-सामने सुनवाई केवल विशेष मामलों में ही होगी।





