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तिरुवनंतपुरम: इस साल की शुरुआत में नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र विरोध प्रदर्शनों से जुड़ा एक सवाल केरल पब्लिक सर्विस कमीशन (PSC) की परीक्षा में पूछा गया। यह सवाल ऐसे समय में चर्चा का विषय बना है जब केंद्र सरकार ने जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन के लिए तय जगहों की सूची से हटाने का फैसला किया है।
राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने 'X' पर एक पोस्ट में इस सवाल का ज़िक्र किया। उन्होंने इस बात पर हैरानी जताई कि केंद्र सरकार द्वारा जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन की जगह के तौर पर हटाने का आदेश जारी करने के ठीक दो दिन बाद ही एक प्रतियोगी परीक्षा में इस विरोध प्रदर्शन का ज़िक्र आया।
सवाल-पत्र की तस्वीर शेयर करते हुए ब्रिटास ने कहा कि इससे पता चलता है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों को रोकने की कोशिशों के बावजूद यह जगह लोगों की बातचीत और चर्चा का हिस्सा बनी हुई है।
सांसद जॉन ब्रिटास ने सवाल-पत्र की तस्वीर के साथ 'X' पर लिखा, "आज केरल PSC की परीक्षा में जंतर-मंतर पर पिछले जुलाई में हुए मशहूर विरोध प्रदर्शन के बारे में एक सवाल पूछा गया। हैरानी की बात यह है कि यह सवाल केंद्र सरकार द्वारा जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन की जगह के तौर पर हटाने का आदेश जारी करने के ठीक दो दिन बाद आया! एक तरफ़ केंद्र सरकार इसे दबाने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ़ जंतर-मंतर अलग-अलग रूपों में सामने आ रहा है। उस कभी न खत्म होने वाले जज़्बे को किसी सरकारी आदेश (GO) से खत्म नहीं किया जा सकता।"
PSC के सवाल में जून और जुलाई 2026 के दौरान जंतर-मंतर पर हुए छात्र विरोध प्रदर्शनों का ज़िक्र था। ये प्रदर्शन राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में गड़बड़ी और प्रश्न-पत्र लीक होने के आरोपों को लेकर किए गए थे।
उम्मीदवारों से कहा गया था कि वे विरोध प्रदर्शनों से जुड़े चार बयानों में से सही बयानों की पहचान करें।
पहला बयान कहता था कि ये प्रदर्शन मुख्य रूप से राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी और पेपर लीक की चिंताओं के कारण शुरू हुए थे। दूसरे बयान में कहा गया था कि इन विरोध प्रदर्शनों को कई छात्र संगठनों और नागरिक समाज समूहों का समर्थन मिला था। तीसरे बयान में दावा किया गया था कि प्रदर्शनकारियों ने भारत में सभी राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं को खत्म करने की मांग की थी। चौथे बयान में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय से जवाबदेही की मांग का ज़िक्र था।
सवाल में उम्मीदवारों को यह तय करना था कि इनमें से कौन-कौन से बयान सही हैं। यह मामला जंतर-मंतर के स्टेटस को लेकर फिर से शुरू हुए विवाद के बीच सामने आया है। जंतर-मंतर लंबे समय से छात्रों, किसानों, राजनीतिक संगठनों और सिविल सोसाइटी समूहों के विरोध-प्रदर्शनों के लिए एक अहम जगह रही है।
यह ताज़ा विवाद तब शुरू हुआ जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के विरोध-प्रदर्शन से पहले राजधानी में पाबंदियां लगाई गईं।
CJP ने वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' में कथित गड़बड़ियों को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफ़े की मांग की थी।
दिल्ली पुलिस ने कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता जताते हुए 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' की धारा 163 के तहत लोगों के इकट्ठा होने पर पाबंदियां लगा दीं।
इन पाबंदियों के साथ-साथ सेंट्रल दिल्ली में, खासकर जंतर-मंतर और कनॉट प्लेस के आस-पास, भारी संख्या में पुलिस और पैरामिलिट्री फोर्स तैनात की गई।
पाबंदियों के बावजूद प्रदर्शन करने की कोशिशें जारी रहीं, जिसके चलते कई प्रदर्शनकारियों और एक्टिविस्टों को हिरासत में लिया गया।
विवाद तब और बढ़ गया जब एक आदेश में विरोध-प्रदर्शन के लिए रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और CBD ग्राउंड जैसी वैकल्पिक जगहों की पहचान की गई, जबकि जंतर-मंतर को तय प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया गया।
इस फ़ैसले की एक्टिविस्टों और विपक्षी नेताओं ने आलोचना की है। उनका कहना है कि भारत में लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शन के इतिहास में जंतर-मंतर का एक प्रतीकात्मक महत्व है।
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