केरल
राहुल गांधी की बहस की चुनौती पर सियासत तेज, वेणुगोपाल ने उठाए सवाल
Ratna Netam
4 Nov 2026 6:12 PM IST

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तिरुवनंतपुरम। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और संसद की लोक लेखा समिति (पीएसी) के अध्यक्ष केसी वेणुगोपाल ने सरकारी खर्च में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए संसदीय समितियों को अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता जताई है। उन्होंने कहा कि सरकारी धन का इस्तेमाल किस तरह किया जा रहा है और विभिन्न योजनाओं का लाभ आम नागरिकों तक कितना पहुंच रहा है, इसकी गंभीर समीक्षा जरूरी है। इसी बीच उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुली बहस की चुनौती से जुड़े राजनीतिक विवाद पर भी सवाल उठाए हैं।केरल के तिरुवनंतपुरम में आयोजित लोक लेखा समितियों के अध्यक्षों के दो दिवसीय अखिल भारतीय सम्मेलन के दौरान वेणुगोपाल ने संसदीय निगरानी व्यवस्था को मजबूत बनाने पर जोर दिया। सम्मेलन का उद्घाटन 3 नवंबर को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने किया। इसमें संसद और विभिन्न राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों की विधानसभाओं से जुड़े प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सम्मेलन का उद्देश्य सार्वजनिक धन के उपयोग की निगरानी और वित्तीय जवाबदेही की व्यवस्था को बेहतर बनाना था।
सरकारी खर्च की निगरानी मजबूत करने की जरूरत
वेणुगोपाल ने कहा कि देश में विकास योजनाओं, बुनियादी ढांचे और जनकल्याण कार्यक्रमों पर सरकारी खर्च लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि आवंटित धन का उपयोग निर्धारित उद्देश्यों के लिए हो और योजनाओं के अपेक्षित परिणाम भी सामने आएं।उन्होंने लोक लेखा समितियों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इनका काम केवल सरकारी खर्च का हिसाब देखना नहीं, बल्कि प्रशासनिक कमियों की पहचान करना और उन्हें दूर करने के लिए जरूरी सुझाव देना भी है।पीएसी सरकार के वित्तीय कामकाज की संसदीय समीक्षा में प्रमुख भूमिका निभाती है। यह नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्टों सहित विभिन्न वित्तीय मामलों की जांच करती है। समिति की सिफारिशों पर समयबद्ध कार्रवाई होने से सार्वजनिक संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल में मदद मिल सकती है।
संसद में PAC रिपोर्टों पर व्यापक चर्चा की मांग
वेणुगोपाल ने इस बात पर भी जोर दिया कि लोक लेखा समितियों की महत्वपूर्ण रिपोर्टों को संसद और विधानसभाओं में पर्याप्त महत्व मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि रिपोर्टों में सामने आने वाली अनियमितताओं और प्रशासनिक कमजोरियों पर गंभीर चर्चा से संबंधित विभागों की जवाबदेही बढ़ सकती हैउनका मानना है कि समिति की सिफारिशों पर कार्रवाई की निगरानी भी उतनी ही जरूरी है जितनी कि रिपोर्ट तैयार करना। यदि रिपोर्टें प्रस्तुत होने के बाद उन पर पर्याप्त चर्चा या कार्रवाई नहीं होती, तो संसदीय निगरानी का उद्देश्य पूरी तरह हासिल नहीं हो पाता।वेणुगोपाल ने हाल में एक पीएसी बैठक में छह राज्यों के मुख्य सचिवों की अनुपस्थिति को लेकर भी चिंता जताई थी। उन्होंने इस मुद्दे को संसदीय समितियों के प्रति प्रशासनिक जवाबदेही से जोड़ा।
स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी योजनाओं के ऑडिट पर जोर
वेणुगोपाल ने सीएजी की ऑडिट प्रक्रिया की प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि रक्षा और रेलवे जैसे क्षेत्रों की तुलना में स्वास्थ्य, शिक्षा और गृह मामलों से जुड़े क्षेत्रों में ऑडिट की संख्या कम दिखाई देती है। उनके मुताबिक, पोषण अभियान, समग्र शिक्षा अभियान, स्वच्छ भारत मिशन, जल जीवन मिशन और प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी योजनाओं की प्रभावी समीक्षा आवश्यक है।उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण से संबंधित प्रस्तावित ऑडिट में देरी का मुद्दा भी उठाया। वेणुगोपाल का कहना था कि ऑडिट में देरी होने से खामियों की पहचान और सुधारात्मक कदम उठाने की प्रक्रिया प्रभावित होती है।
राहुल गांधी की खुली बहस की चुनौती पर सियासत तेज
दूसरी ओर, राहुल गांधी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुली बहस की चुनौती को लेकर देश की राजनीति में बयानबाजी तेज है। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री के सामने सार्वजनिक मंच पर बहस का प्रस्ताव रखा है। उन्होंने कहा कि दोनों नेता मीडिया और युवाओं की मौजूदगी में राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर चर्चा कर सकते हैं।राहुल गांधी ने भारत-अमेरिका समझौते, देश की वित्तीय व्यवस्था और विदेशी प्रभाव से जुड़े आरोपों सहित कई मुद्दों पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, ये कांग्रेस नेता के राजनीतिक आरोप हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।कांग्रेस की ओर से सवाल उठाया जा रहा है कि प्रधानमंत्री इस बहस की चुनौती को स्वीकार क्यों नहीं कर रहे हैं। वेणुगोपाल ने भी राहुल गांधी के इस राजनीतिक अभियान का समर्थन किया है। हालांकि, पीएसी सम्मेलन में उनके संबोधन का मुख्य विषय सरकारी खर्च की जवाबदेही और संसदीय निगरानी था।
भाजपा ने दिया जवाब, संसद में चर्चा करने की चुनौती
राहुल गांधी की चुनौती पर भाजपा नेताओं ने भी पलटवार किया है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि बहस के लिए संसद उपयुक्त मंच है और राहुल गांधी को विपक्ष के नेता के रूप में वहीं मुद्दे उठाने चाहिए।केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों से जुड़े मुद्दों पर संसदीय चर्चा की चुनौती दी है। इस तरह दोनों पक्ष एक-दूसरे से बहस की मांग कर रहे हैं, लेकिन बहस के मंच और विषयों को लेकर मतभेद बने हुए हैं।
जवाबदेही और पारदर्शिता पर केंद्रित रही चर्चा
पीएसी सम्मेलन और प्रधानमंत्री को दी गई बहस की चुनौती अलग-अलग विषय हैं, लेकिन दोनों के केंद्र में सरकार की जवाबदेही का सवाल है। एक ओर वेणुगोपाल सार्वजनिक धन के इस्तेमाल की संसदीय समीक्षा मजबूत बनाने की वकालत कर रहे हैं, तो दूसरी ओर राहुल गांधी राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दों पर प्रधानमंत्री से सार्वजनिक जवाब मांग रहे हैं।अब देखना होगा कि लोक लेखा समितियों को मजबूत बनाने के लिए सम्मेलन में सामने आए सुझावों पर आगे क्या पहल होती है। साथ ही राहुल गांधी की खुली बहस की चुनौती को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जारी राजनीतिक टकराव किस दिशा में बढ़ता है।
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