
पैनकुलम: पैनकुलम वझालिकावु देवस्वम मंदिर में इस साल ‘इल्लम निरा’ उत्सव के लिए विशेष रूप से उगाई गई धान की फसल तैयार हो गई है। मंदिर के भंडार कक्ष यानी ‘इल्लम’ को भरने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली धान की बालियों की पैदावार एक लाख तक पहुंच गई है। मंदिर प्रबंधन ने स्थानीय स्तर पर खेती कर इस परंपरा को फिर से जीवंत करने की पहल की है।
मंदिर में धान की बालियों की जरूरत हर साल ‘इल्लम निरा’ उत्सव के दौरान होती है। पहले इन बालियों को खरीदकर लाया जाता था, लेकिन इस बार बाजार में कीमत बढ़ने के बाद देवस्वम ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने खुद खेती करने का फैसला किया।
मंदिर प्रबंधन के अनुसार, धान की एक मुट्ठी का दाम पहले करीब 320 रुपये था, लेकिन इस साल कीमतों में बढ़ोतरी के कारण खर्च काफी बढ़ गया। इसके बाद ट्रस्ट ने मंदिर की परंपरा को बनाए रखने के लिए खुद धान उगाने की योजना बनाई।
करीब चार महीने पहले चार एकड़ जमीन पर धान के बीज बोए गए थे। खेती में स्थानीय खाद का इस्तेमाल किया गया और प्राकृतिक तरीके से फसल तैयार की गई। मेहनत के बाद अब करीब एक लाख धान की बालियां तैयार हो चुकी हैं।
मंदिर में ‘इल्लम निरा’ उत्सव 16 अगस्त को आयोजित किया जाएगा। यह उत्सव कर्कड महीने में ‘वाव’ के बाद आने वाले रविवार को मनाया जाता है। इस अवसर पर मंदिर में धान की बालियों का विशेष महत्व होता है और इन्हें धार्मिक परंपराओं के अनुसार इस्तेमाल किया जाता है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मंदिर से प्राप्त धान की बालियों को घर के बरामदे में लटकाने से सालभर घर में अन्न की कमी नहीं होती। इसी विश्वास के कारण श्रद्धालु हर साल मंदिर से धान की बालियां प्राप्त करते हैं और उन्हें अपने घरों में रखते हैं।
मंदिर प्रबंधन का कहना है कि पुराने समय में लोग इस तरह की धान की फसल खुद उगाते थे और इसका उपयोग अपने दैनिक जीवन में करते थे। हालांकि, समय के साथ खेती के तरीके बदल गए और इस विशेष प्रकार की फसल की ओर लोगों का ध्यान कम होता गया।
देवस्वम ट्रस्ट ने अब इस परंपरा को आगे बढ़ाने की कोशिश की है। ट्रस्ट के पदाधिकारियों के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य केवल मंदिर की जरूरत पूरी करना नहीं, बल्कि पुरानी कृषि परंपराओं को संरक्षित करना भी है।
देवस्वम ट्रस्ट के अध्यक्ष के. रमेश कुमार, सचिव पी.वी. मुरलीधरन, प्रबंधक वी. कृष्णनकुट्टी और भजन संघम के अध्यक्ष पी. उन्नीकृष्णन ने बताया कि मंदिर अन्य देवस्वम और धार्मिक संस्थानों को भी जरूरत पड़ने पर धान की बालियां उपलब्ध कराने के लिए तैयार है।
उन्होंने कहा कि इस तरह की पहल से पारंपरिक कृषि पद्धतियों को बढ़ावा मिलेगा और आने वाली पीढ़ियों को पुराने रीति-रिवाजों से जोड़ने में मदद मिलेगी।
ग्रामीणों ने भी मंदिर की इस पहल का स्वागत किया है। उनका कहना है कि धार्मिक आयोजनों से जुड़ी कृषि परंपराओं को बचाए रखना सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने जैसा है।
धान की बालियों की यह पैदावार केवल एक कृषि उपलब्धि नहीं, बल्कि एक पुरानी परंपरा को दोबारा मजबूत करने का प्रयास भी है। मंदिर प्रबंधन को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में भी इसी तरह खेती कर ‘इल्लम निरा’ उत्सव के लिए आवश्यक धान की बालियां तैयार की जाती रहेंगी।
इस बार एक लाख धान की बालियों की उपलब्धता से मंदिर प्रशासन उत्साहित है और इसे परंपरा, आस्था और स्थानीय कृषि के संगम के रूप में देखा जा रहा है।





