
Kerala केरल: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारी दत्तात्रेय होसबोले के उस बयान का बचाव किया, जिसमें पाकिस्तान के साथ बातचीत की संभावना बनाए रखने की बात कही गई थी। इस मुद्दे पर उठे सवालों के जवाब में भागवत ने स्पष्ट किया कि होसबोले का संदर्भ पाकिस्तान सरकार नहीं, बल्कि वहां के लोगों से जुड़ा था।
RSS की शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा कि संगठन की नीति हमेशा भारत सरकार के रुख के अनुरूप रहती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान के साथ संबंधों को लेकर RSS किसी स्वतंत्र नीति का पालन नहीं करता, बल्कि केंद्र सरकार द्वारा तय की गई दिशा का अनुसरण करता है।
भागवत ने अपने बयान में कहा कि दत्तात्रेय होसबोले ने पाकिस्तान के आम लोगों और समाज के कुछ वर्गों के बारे में बात की थी, न कि किसी राजनीतिक निर्णय या कूटनीतिक नीति पर टिप्पणी की थी। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान में ऐसे कई लोग मौजूद हैं जो मानते हैं कि भारत का विभाजन एक गलत निर्णय था और दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध होने चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि पाकिस्तान में कुछ पत्रकार और बुद्धिजीवी भी ऐसे हैं जो RSS के कार्यों और विचारधारा की सराहना करते हैं। इसके अलावा वहां एक ऐसा वर्ग भी है जो ‘दो-राष्ट्र सिद्धांत’ के खिलाफ है और यह मानता है कि भारत और पाकिस्तान को साथ रहना चाहिए था। भागवत ने कहा कि ऐसे विचार रखने वाले लोग सीमाओं के पार भी मौजूद हैं और उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इस बयान को ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जब भारत-पाकिस्तान संबंधों को लेकर राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर लगातार चर्चा जारी रहती है। RSS प्रमुख के इस स्पष्टीकरण को संगठन की स्थिति को स्पष्ट करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है, ताकि किसी भी तरह की गलतफहमी या विवाद को टाला जा सके।
मोहन भागवत ने यह भी दोहराया कि संगठन की प्राथमिकता देशहित है और सभी अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर उसका दृष्टिकोण भारत सरकार की आधिकारिक नीति के अनुरूप ही होता है। उन्होंने कहा कि किसी भी पड़ोसी देश के साथ संबंधों को लेकर निर्णय लेने का अधिकार सरकार के पास है और संगठन उस निर्णय का सम्मान करता है।
इस पूरे बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। कई लोग इसे RSS के रुख को स्पष्ट करने वाला बयान मान रहे हैं, जबकि कुछ इसे क्षेत्रीय शांति और संवाद की संभावनाओं से जोड़कर देख रहे हैं।
फिलहाल इस मुद्दे पर विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं और आने वाले दिनों में इस पर और बहस होने की संभावना है।





