
तिरुवनंतपुरम। केरल में तिरुवनंतपुरम नगर निगम में पहली बार जीत दर्ज कर उत्साहित भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सामने कुछ ही दिनों में अंदरूनी कलह की चुनौती खड़ी हो गई है। केरल की पहली महिला आईपीएस अधिकारी और पूर्व डीजीपी आर. श्रीलेखा ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम के शास्तमंगलम वार्ड के पार्षद पद से इस्तीफा दे दिया है। बताया जा रहा है कि वह मेयर का पद नहीं मिलने से नाराज चल रही थीं। उनके इस्तीफे के बाद नगर निगम में भाजपा के लिए नई राजनीतिक मुश्किल पैदा हो गई है।
तिरुवनंतपुरम नगर निगम में भाजपा की जीत को पार्टी ने ऐतिहासिक उपलब्धि के तौर पर पेश किया था। जीत के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने जोरदार जश्न मनाया था। केरल की राजनीति में तिरुवनंतपुरम नगर निगम की जीत को भाजपा के लिए महत्वपूर्ण सफलता माना जा रहा था। लेकिन इस जीत के कुछ ही दिनों बाद पार्टी के भीतर पद को लेकर असंतोष खुलकर सामने आ गया।
आर. श्रीलेखा का नाम तिरुवनंतपुरम नगर निगम की राजनीति में इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि उनका प्रशासनिक करियर लंबा रहा है। केरल की पहली महिला आईपीएस अधिकारी के रूप में उनकी अलग पहचान है और वह पूर्व डीजीपी भी रह चुकी हैं। प्रशासनिक सेवा से राजनीति की ओर आईं श्रीलेखा के पार्षद पद से इस्तीफे ने भाजपा के भीतर चल रही खींचतान को सार्वजनिक कर दिया है।
श्रीलेखा शास्तमंगलम वार्ड से पार्षद चुनी गई थीं। भाजपा की जीत के बाद नगर निगम में मेयर पद को लेकर कई तरह की चर्चाएं शुरू हुई थीं। इसी दौरान श्रीलेखा का नाम भी प्रमुखता से सामने आया। हालांकि उन्हें मेयर का पद नहीं मिला। इसके बाद उनकी नाराजगी की खबरें सामने आने लगीं और आखिरकार उन्होंने पार्षद पद छोड़ने का फैसला कर लिया।
उनका इस्तीफा भाजपा के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी अभी नगर निगम की जीत का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रही थी। पहली बार मिली सफलता के तुरंत बाद एक प्रमुख चेहरे का पद छोड़ना संगठन के भीतर समन्वय को लेकर सवाल खड़े कर सकता है।
तिरुवनंतपुरम नगर निगम में भाजपा की जीत को केरल में पार्टी के विस्तार से जोड़कर देखा जा रहा था। केरल की राजनीति में लंबे समय से अन्य प्रमुख राजनीतिक दलों का प्रभाव रहा है। ऐसे में राजधानी के नगर निगम में भाजपा की जीत पार्टी के लिए राजनीतिक और प्रतीकात्मक दोनों रूप से महत्वपूर्ण थी।
जीत के बाद भाजपा के भीतर मेयर पद सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसलों में शामिल था। नगर निगम में नेतृत्व किसके हाथ में रहेगा, इसे लेकर पार्टी के अंदर अलग-अलग नामों की चर्चा होना स्वाभाविक था। लेकिन श्रीलेखा के इस्तीफे से संकेत मिलता है कि नेतृत्व चयन को लेकर सभी नेताओं के बीच सहमति नहीं बन सकी।
आर. श्रीलेखा का प्रशासनिक अनुभव उनकी राजनीतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पुलिस सेवा में लंबे समय तक रहने के बाद उन्होंने सार्वजनिक जीवन में अपनी अलग पहचान बनाई। यही कारण है कि उनके भाजपा से जुड़ने और चुनावी मैदान में उतरने के बाद उन्हें पार्टी के प्रमुख चेहरों में देखा जाने लगा था।
शास्तमंगलम वार्ड से जीत के बाद उनके समर्थकों को उम्मीद थी कि नगर निगम की नई व्यवस्था में उन्हें महत्वपूर्ण भूमिका मिल सकती है। मेयर पद को लेकर भी उनका नाम चर्चा में रहा। हालांकि अंतिम निर्णय उनके पक्ष में नहीं होने से असंतोष की स्थिति बनी और अब उन्होंने पार्षद पद से ही इस्तीफा दे दिया है।
इस घटनाक्रम के बाद भाजपा के सामने दोहरी चुनौती दिखाई दे रही है। एक तरफ पार्टी को नगर निगम में अपनी नई सत्ता और प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करना है, वहीं दूसरी तरफ संगठन के भीतर पैदा हुए असंतोष को भी संभालना होगा। शुरुआती दौर में ही किसी प्रमुख पार्षद का इस्तीफा पार्टी की रणनीति पर असर डाल सकता है।
राजनीतिक रूप से देखा जाए तो विपक्षी दल भी इस घटनाक्रम को भाजपा की अंदरूनी खींचतान के उदाहरण के रूप में उठा सकते हैं। हालांकि भाजपा के भीतर इस विवाद को किस तरह सुलझाया जाता है और श्रीलेखा के इस्तीफे के बाद आगे क्या फैसला लिया जाता है, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।
नगर निगम की राजनीति में एक-एक पार्षद की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। खासतौर पर तब जब सत्ता का संतुलन सीटों की संख्या पर निर्भर करता हो। ऐसे में श्रीलेखा का पार्षद पद छोड़ना केवल संगठनात्मक विवाद नहीं, बल्कि नगर निगम की राजनीतिक स्थिति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भाजपा के लिए चुनौती यह भी है कि जिस जीत को उसने ऐतिहासिक बताते हुए कार्यकर्ताओं के बीच उत्साह पैदा किया था, उसी जीत के कुछ दिनों बाद असंतोष सामने आ गया है। पार्टी को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि नेतृत्व को लेकर मतभेद अन्य पार्षदों या नेताओं तक न फैलें।
श्रीलेखा के इस्तीफे ने मेयर चयन की प्रक्रिया और उसके पीछे पार्टी की रणनीति को भी चर्चा में ला दिया है। मेयर पद किसी भी नगर निगम में महत्वपूर्ण होता है और राजधानी तिरुवनंतपुरम में इस पद का राजनीतिक महत्व और बढ़ जाता है। ऐसे में इस पद को लेकर पार्टी के अंदर दावेदारी होना असामान्य नहीं है, लेकिन इस्तीफे तक मामला पहुंचना भाजपा के लिए चिंता बढ़ाने वाला घटनाक्रम है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पार्टी नेतृत्व आर. श्रीलेखा से बातचीत कर उनके फैसले पर पुनर्विचार कराने की कोशिश करेगा या उनका इस्तीफा अंतिम रहेगा। इसके अलावा भाजपा के भीतर इस पूरे घटनाक्रम पर क्या प्रतिक्रिया आती है, इस पर भी नजर रहेगी।
श्रीलेखा का फैसला उनके समर्थकों के लिए भी महत्वपूर्ण है। एक पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के तौर पर उनकी अपनी पहचान और समर्थक वर्ग है। चुनावी राजनीति में उतरने के बाद उनसे प्रशासनिक अनुभव का लाभ नगर निगम को मिलने की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन अब पार्षद पद से इस्तीफे के कारण उनकी आगे की राजनीतिक भूमिका को लेकर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम में भाजपा की ऐतिहासिक जीत के उत्साह के बीच अंदरूनी मतभेद को सामने ला दिया है। सत्ता हासिल करने के बाद पदों और जिम्मेदारियों का बंटवारा किसी भी राजनीतिक दल के लिए संवेदनशील प्रक्रिया होती है। यहां मेयर पद को लेकर असंतोष ने शुरुआती दौर में ही पार्टी के सामने संकट पैदा कर दिया है।
अब भाजपा नेतृत्व के सामने संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखने और नगर निगम में स्थिर प्रशासन देने की चुनौती होगी। पार्टी के लिए यह भी जरूरी होगा कि पार्षदों और वरिष्ठ नेताओं के बीच मतभेदों को बातचीत के जरिए सुलझाया जाए।
कुल मिलाकर तिरुवनंतपुरम नगर निगम में पहली जीत का जश्न मना रही भाजपा को आर. श्रीलेखा के इस्तीफे से बड़ा झटका लगा है। केरल की पहली महिला आईपीएस अधिकारी और पूर्व डीजीपी श्रीलेखा ने शास्तमंगलम वार्ड के पार्षद पद से इस्तीफा दे दिया है। उनके मेयर पद नहीं मिलने से नाराज होने की बात सामने आई है। अब उनकी इस नाराजगी और इस्तीफे के बाद भाजपा नगर निगम के भीतर पैदा हुए राजनीतिक संकट से किस तरह निपटती है, इस पर नजर रहेगी।





