
तिरुवनंतपुरम। केरल के नए राज्यपाल ओम प्रकाश माथुर ने पदभार संभालने के पहले ही दिन ऐसा फैसला लिया है, जिससे राज्य की राजनीति में विवाद खड़ा हो गया है। राज्यपाल ने लोकभवन यानी राजभवन की रसोई में केवल शाकाहारी भोजन तैयार करने का निर्देश दिया है। इस फैसले के सामने आते ही कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। दोनों दलों के नेताओं ने राज्यपाल पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और संघ परिवार की विचारधारा को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया है। हालांकि, राज्यपाल कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि यह निर्देश केवल राज्यपाल और उनके परिवार के लिए खाना बनाने वाली रसोई तक सीमित है। कर्मचारियों के खान-पान पर किसी तरह की पाबंदी नहीं लगाई गई है।
शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026 को ओम प्रकाश माथुर ने केरल के 29वें राज्यपाल के रूप में शपथ ली थी। इसके कुछ ही समय बाद लोकभवन की रसोई में मांसाहारी भोजन नहीं बनाने संबंधी निर्देश की खबर सामने आई। इस मुद्दे ने देखते ही देखते राजनीतिक विवाद का रूप ले लिया।
शपथ लेते ही राज्यपाल के फैसले पर विवाद
ओम प्रकाश माथुर ने शुक्रवार को तिरुवनंतपुरम स्थित लोकभवन में आयोजित समारोह में राज्यपाल पद की शपथ ली। केरल हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई।
माथुर इससे पहले सिक्किम के राज्यपाल रह चुके हैं। उन्होंने राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर का स्थान लिया है, जिन्हें तमिलनाडु का राज्यपाल नियुक्त किया गया है।
पदभार संभालने के बाद लोकभवन की रसोई में केवल शाकाहारी भोजन बनाने का निर्देश सामने आया। रिपोर्टों के मुताबिक, राज्यपाल स्वयं पूर्ण रूप से शाकाहारी हैं और उन्होंने अपने भोजन की तैयारी के लिए यह व्यवस्था करने को कहा है।
हालांकि, कुछ राजनीतिक नेताओं ने इसे व्यक्तिगत पसंद तक सीमित नहीं मानते हुए संस्थागत व्यवस्था में हस्तक्षेप बताया है।
कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने उठाए सवाल
कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव केसी वेणुगोपाल ने राज्यपाल के फैसले की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह संघ परिवार के वैचारिक एजेंडे को केरल में लागू करने की दिशा में उठाया गया कदम है।
वेणुगोपाल ने कहा कि केरल की खान-पान संस्कृति विविधता से भरी हुई है। यहां शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के भोजन की परंपरा रही है।
उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को क्या खाना चाहिए और क्या नहीं, यह तय करने का अधिकार उसी व्यक्ति का है।
कांग्रेस नेता ने राज्यपाल के संवैधानिक पद का उल्लेख करते हुए कहा कि इस पद पर बैठे व्यक्ति से नागरिकों की स्वतंत्रता और अधिकारों का सम्मान करने की अपेक्षा की जाती है।
उन्होंने राज्यपाल से ऐसे किसी भी निर्णय को वापस लेने की मांग की, जिससे लोगों की खान-पान संबंधी स्वतंत्रता प्रभावित होती हो।
गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने भी जताई नाराजगी
केरल के गृह मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता रमेश चेन्निथला ने भी राज्यपाल के कथित निर्देश का विरोध किया है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति क्या पहनेगा, क्या खाएगा और कौन-सी भाषा बोलेगा, यह उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विषय है।
चेन्निथला के अनुसार, किसी दूसरे व्यक्ति के खान-पान की आदतों को नियंत्रित करना उचित नहीं है। उन्होंने राज्यपाल से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की।
उनका कहना था कि केरल में अलग-अलग समुदायों और परंपराओं के लोग रहते हैं। ऐसे में खान-पान की विविधता का सम्मान किया जाना चाहिए।
इस विवाद के बाद राज्य की राजनीति में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सार्वजनिक संस्थानों की कार्यप्रणाली को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
सीपीएम ने लगाया संघ परिवार का एजेंडा थोपने का आरोप
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी राज्यपाल के इस निर्णय की आलोचना की है।
सीपीएम के प्रदेश सचिव एमवी गोविंदन ने कहा कि भारत में लोगों को शाकाहारी या मांसाहारी भोजन चुनने का लोकतांत्रिक अधिकार है।
उन्होंने कहा कि राज्यपाल अपनी व्यक्तिगत पसंद के अनुसार शाकाहारी भोजन कर सकते हैं, लेकिन उनकी पसंद दूसरे लोगों पर लागू नहीं की जानी चाहिए।
गोविंदन ने आरोप लगाया कि भोजन जैसी व्यक्तिगत पसंद को राजनीतिक और सांप्रदायिक मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही है।
उन्होंने इसे संघ परिवार के एजेंडे से जोड़ते हुए कहा कि केरल की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता में खान-पान का विशेष महत्व है।
सीपीएम नेता ने कहा कि लोगों की व्यक्तिगत पसंद का सम्मान होना चाहिए और किसी भी प्रकार की अनावश्यक पाबंदी स्वीकार्य नहीं है।
राज्यपाल कार्यालय ने दी सफाई
विवाद बढ़ने के बाद लोकभवन की ओर से पूरे मामले पर स्पष्टीकरण दिया गया।
राज्यपाल कार्यालय के सूत्रों के अनुसार, ओम प्रकाश माथुर पूर्ण रूप से शाकाहारी हैं। उन्होंने केवल उस रसोई में मांसाहारी भोजन नहीं बनाने को कहा है, जहां उनके और उनके परिवार के लिए भोजन तैयार किया जाता है।
लोकभवन परिसर में कर्मचारियों के लिए अलग रसोई की व्यवस्था है। वहां कर्मचारियों को अपनी पसंद का भोजन बनाने या खाने की स्वतंत्रता है।
कार्यालय ने स्पष्ट किया कि कर्मचारियों को घर से मांसाहारी भोजन लाने या बाहर जाकर खाने से नहीं रोका गया है।
इस स्पष्टीकरण के अनुसार, राज्यपाल का निर्देश लोकभवन परिसर में रहने वाले सभी कर्मचारियों पर लागू होने वाला सामान्य प्रतिबंध नहीं है।
पहले राजभवन में बनता था शाकाहारी और मांसाहारी भोजन
रिपोर्टों के अनुसार, पूर्व राज्यपालों के कार्यकाल में लोकभवन की रसोई में शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के भोजन तैयार किए जाते थे।
पूर्व राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर के कार्यकाल में भी मछली सहित अन्य व्यंजन बनाए जाने की जानकारी सामने आई है।
हालांकि, ओम प्रकाश माथुर ने अपने व्यक्तिगत खान-पान की पसंद को ध्यान में रखते हुए नई व्यवस्था का निर्देश दिया है।
राज्यपाल कार्यालय का कहना है कि संबंधित रसोई मुख्य रूप से राज्यपाल और उनके निजी स्टाफ के कुछ सदस्यों के लिए भोजन तैयार करती है।
ऐसे में कार्यालय की ओर से इसे राज्यपाल की व्यक्तिगत भोजन व्यवस्था से जुड़ा निर्णय बताया जा रहा है।
कौन हैं नए राज्यपाल ओम प्रकाश माथुर?
ओम प्रकाश माथुर राजस्थान के पाली जिले के रहने वाले हैं। उन्होंने अपनी सार्वजनिक जीवन की शुरुआत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में की थी।
इसके बाद वे भारतीय जनता पार्टी के संगठन में सक्रिय हुए और पार्टी के कई महत्वपूर्ण पदों पर जिम्मेदारी संभाली।
माथुर भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और राष्ट्रीय महासचिव रह चुके हैं। वे राजस्थान से राज्यसभा सदस्य भी रहे हैं।
इसके अलावा उन्होंने गुजरात सहित विभिन्न राज्यों में भाजपा के संगठनात्मक कार्यों की जिम्मेदारी संभाली थी।
केरल का राज्यपाल बनने से पहले वे सिक्किम के राज्यपाल के रूप में कार्यरत थे। 23 अक्टूबर को उन्होंने केरल के 29वें राज्यपाल के रूप में पदभार ग्रहण किया।
खान-पान की स्वतंत्रता पर छिड़ी राजनीतिक बहस
केरल में भोजन केवल व्यक्तिगत पसंद का विषय नहीं, बल्कि राज्य की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है।
यहां मछली, मांस और विभिन्न प्रकार के शाकाहारी व्यंजन पारंपरिक खान-पान का हिस्सा हैं। तटीय राज्य होने के कारण मछली का उपयोग भोजन में व्यापक रूप से होता है।
इसी पृष्ठभूमि में कांग्रेस और सीपीएम के नेताओं ने राज्यपाल के निर्देश पर आपत्ति जताई है।
हालांकि, राज्यपाल कार्यालय का कहना है कि निर्देश कर्मचारियों की भोजन संबंधी स्वतंत्रता को प्रभावित नहीं करता है।
फिलहाल इस विवाद का मुख्य मुद्दा यह बन गया है कि राज्यपाल की व्यक्तिगत भोजन व्यवस्था और सार्वजनिक संस्थान में कर्मचारियों की स्वतंत्रता के बीच सीमा कहां निर्धारित होती है। दोनों पक्षों की ओर से सामने आए बयानों के बाद यह मामला केरल की राजनीति में चर्चा का विषय बना हुआ है।





