केरल

Kerala: संघचेतना लाइब्रेरी की बदौलत केरल के थेट्टमाला गांव ने बागानों से आगे के सपने देखे

Tulsi Rao
12 Oct 2026 11:43 AM IST
Kerala: संघचेतना लाइब्रेरी की बदौलत केरल के थेट्टमाला गांव ने बागानों से आगे के सपने देखे
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कल्पेट्टा: कई पीढ़ियों तक, मनंतवाडी के एक छोटे से पहाड़ी गाँव 'थेट्टमाला' में चाय के बागान ही संभावनाओं का एकमात्र दायरा थे। लोगों की ज़िंदगी इन्हीं बागानों के इर्द-गिर्द घूमती थी और बहुत से युवाओं के लिए इनसे बाहर निकलने का विचार भी दूर की कौड़ी लगता था।

आज, इस गाँव की कहानी कुछ और ही है। यहाँ की सड़कें सरकारी दफ़्तरों, अस्पतालों, स्कूलों और इंजीनियरिंग संस्थानों तक जाती हैं। इन सड़कों पर उस पीढ़ी की उम्मीदें और सपने आगे बढ़ रहे हैं, जो कभी एक साधारण से लाइब्रेरी रूम की चारदीवारी में बैठकर पढ़ाई करती थी।

इस शांत बदलाव के केंद्र में है 'संघचेतना लाइब्रेरी', जिसे 2006 में स्थानीय युवाओं के एक समूह ने शुरू किया था। न तो इसके पास कोई आलीशान इमारत थी और न ही बहुत सारे संसाधन। इसके पास था तो बस युवाओं का एक ऐसा समूह जो साथ बैठकर पढ़ने और सबसे ज़रूरी बात, एक-दूसरे को यह यकीन दिलाने को तैयार था कि सरकारी नौकरी कोई असंभव सपना नहीं है।

PSC परीक्षाओं की तैयारी के लिए वहाँ इकट्ठा हुआ पहला बैच ही टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। सरकारी नौकरी पाने के बाद, वे उसी कमरे में वापस लौटे जहाँ से उन्होंने अपनी तैयारी शुरू की थी। शाम के समय, वे अगली पीढ़ी के लिए शिक्षक बन गए।

यह सिलसिला चलता रहा। और अब, इलाके के लगभग 75 लोग सरकारी नौकरी कर रहे हैं। अन्य लोगों ने मेडिकल, इंजीनियरिंग, टीचिंग और कई तरह के प्रोफेशनल करियर अपनाए हैं, जिनमें से कुछ को केरल के बाहर और विदेशों में भी मौके मिले हैं।

यह बदलाव खास तौर पर उस समुदाय में दिखाई दिया है, जहाँ कभी बहुत कम परिवारों के पास शिक्षा के सीमित अवसर हुआ करते थे।

लाइब्रेरी के सेक्रेटरी सुरेश कहते हैं, "तरक्की की चाहत तो हमेशा से थी, लेकिन हमारे पास सही दिशा का अभाव था। लंबे समय तक हमारी ज़िंदगी चाय के बागानों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही। लाइब्रेरी इसलिए शुरू की गई क्योंकि समुदाय इस हकीकत को बदलना चाहता था। हम चाहते थे कि हमारे बच्चे एक बड़ी दुनिया देखें और वहाँ तक पहुँचने के लिए उनके पास ज़रूरी संसाधन हों।"

सुरेश कहते हैं, "जब पहले समूह ने यहाँ PSC परीक्षाओं की तैयारी शुरू की, तो उनमें से लगभग सभी को सरकारी नौकरी मिल गई। हो सकता है कि उनका एकेडमिक बैकग्राउंड बहुत शानदार न रहा हो, लेकिन उनमें यह भरोसा था कि पक्की लगन और मेहनत से वे बहुत आगे जा सकते हैं।" धीरे-धीरे, यह लाइब्रेरी कम्युनिटी की गतिविधियों का केंद्र बन गई। यहाँ के स्थानीय युवा सेल्फ-हेल्प ग्रुप, गंभीर बीमारी में देखभाल (पैलिएटिव केयर), महिलाओं और बुज़ुर्गों के लिए फोरम और यहाँ तक कि फुटबॉल ट्रेनिंग जैसी गतिविधियाँ भी चलाने लगे।

इस लाइब्रेरी की सफलता में एक अजीब बात भी है। सरकारी कर्मचारियों और प्रोफेशनल्स की एक पीढ़ी तैयार करने में मदद करने के बावजूद, आज भी इसकी अपनी कोई इमारत नहीं है।

सालों से इसकी गतिविधियाँ एक किराए के कमरे से चल रही हैं। अब कम्युनिटी ने एक प्राइवेट इमारत की पहली मंज़िल पर जगह हासिल की है और उम्मीद है कि इसे लाइब्रेरी के लिए एक स्थायी ठिकाना बनाया जा सकेगा। लेकिन इसे तैयार करने के लिए ज़रूरी पैसे जुटाना अभी भी एक चुनौती है।

सुरेश कहते हैं, "चूँकि ज़मीन हमारी अपनी नहीं है, इसलिए हमें स्थानीय निकायों से कोई मदद नहीं मिल पाई है। हमने अब एक प्राइवेट इमारत में जगह तो ले ली है, लेकिन वहाँ लाइब्रेरी शुरू करने के लिए फंड का इंतज़ाम करना मुश्किल है। हम इस बाधा को पार करना चाहते हैं क्योंकि हमारा मकसद साफ़ है: ज़्यादा से ज़्यादा बच्चों तक किताबें, ज्ञान और मौके पहुँचाना।"

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