
Kerala केरल: फसल कटाई के बाद खेतों में बचे अवशेषों का उपयोग करने के लिए भेड़-बकरियों के झुंड एक बार फिर कृषि क्षेत्रों में लौट आए हैं। इन दिनों कुनिस्सेरी इलाके में बड़ी संख्या में भेड़-बकरियों के झुंड दिखाई दे रहे हैं, जो चारे की तलाश में कटे हुए धान के खेतों में विचरण कर रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, ये भेड़-बकरियों के झुंड मुख्य रूप से तमिलनाडु के मदुरै, डिंडीगुल, थेनी, रामनाथपुरम और शिवगंगा जिलों से हर साल अलग-अलग कृषि क्षेत्रों में लाए जाते हैं। फसल कटने के बाद खेतों में बची पराली और अन्य अवशेष इनके लिए चारे का प्रमुख स्रोत बन जाते हैं।
चरवाहों की यह परंपरा दशकों पुरानी है, जिसमें वे अपने पशुओं को तय रूट के अनुसार विभिन्न इलाकों में लेकर जाते हैं। इनमें से कई चरवाहे स्थानीय किसानों से भी लंबे समय से परिचित हैं, जिससे उनके बीच आपसी विश्वास और सहयोग का संबंध बना हुआ है।
चरवाहे आमतौर पर हफ्तों तक एक ही क्षेत्र में डेरा डालते हैं और भेड़ों को खुले खेतों में चरने देते हैं। इस प्रक्रिया को स्थानीय भाषा में ‘लेटा’ कहा जाता है, जिसमें रात के समय भेड़ों को सुरक्षित रूप से खेतों में रोका जाता है।
इस ‘लेटा’ व्यवस्था के तहत चरवाहे किसानों के खेतों में भेड़ों को एक रात के लिए ठहराते हैं, जिसके बदले वे प्रति रात 500 से 700 रुपये तक शुल्क लेते हैं। यह शुल्क भेड़ों की संख्या और खेत के आकार पर निर्भर करता है।
स्थानीय किसानों का मानना है कि भेड़ों के इस तरह खेतों में आने से खेतों की प्राकृतिक सफाई भी हो जाती है, क्योंकि ये पशु फसल अवशेषों को खा लेते हैं और जमीन को हल्का उर्वरक भी मिलता है। हालांकि कुछ किसान इसे लेकर अलग-अलग राय भी रखते हैं।
वहीं, चरवाहों के लिए यह व्यवस्था उनके पारंपरिक जीवन और आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है। आधुनिक समय में भी यह परंपरा ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि जीवन का हिस्सा बनी हुई है।
कुल मिलाकर, धान कटाई के बाद भेड़-बकरियों के झुंडों का खेतों में लौटना न केवल एक पारंपरिक कृषि व्यवस्था को दर्शाता है, बल्कि किसानों और चरवाहों के बीच लंबे समय से चले आ रहे आपसी सहयोग को भी उजागर करता है।





