
Kerala केरल: ट्रॉलिंग बैन के दौरान पारंपरिक मछुआरों को इस बार भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। उम्मीद के मुताबिक ‘चकारा’ न मिलने से मछुआरा समुदाय को न केवल आर्थिक नुकसान हुआ है, बल्कि कई परिवारों के सामने आजीविका का संकट भी खड़ा हो गया है।
मछुआरों ने मछली पकड़ने के लिए अपनी नावों और जालों की मरम्मत पर लाखों रुपये खर्च किए थे, ताकि प्रतिबंध हटने के बाद वे समुद्र में उतरकर अच्छी कमाई कर सकें। लेकिन उम्मीद के विपरीत इस बार समुद्र में अपेक्षित मछली उपलब्ध नहीं हुई, जिससे उन्हें निराशा हाथ लगी।
नाव मालिकों का कहना है कि उन्होंने कर्ज लेकर नावों की मरम्मत करवाई और तैयारी की थी, लेकिन समुद्र में मछली न मिलने से उनकी स्थिति और खराब हो गई है। कई परिवार अब कर्ज और रोजमर्रा की जरूरतों के बीच फंस गए हैं।
हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि कुछ मछुआरे नाव लेकर समुद्र में तो उतरे, लेकिन उन्हें एक दिन की जरूरत भर की मछली भी नहीं मिली। इससे उनकी आय पूरी तरह प्रभावित हुई है और कई परिवारों के लिए भोजन तक की समस्या उत्पन्न हो गई है।
पारंपरिक रूप से माना जाता है कि ट्रॉलिंग बैन के दौरान समुद्र शांत रहता है और मानसून के बाद ‘चकारा’ तट के पास दिखाई देता है, जिससे मछुआरों को अच्छी पकड़ मिलती है। ‘चकारा’ को मछलियों का झुंड माना जाता है जो तटीय क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मछुआरों को लाभ पहुंचाता है।
लेकिन इस बार स्थिति अलग रही। मछुआरों के अनुसार, इस बार चकारा बिल्कुल भी नहीं दिखाई दिया, जिससे उनकी पूरी उम्मीदें टूट गईं।
विशेषज्ञों का मानना है कि समुद्री पर्यावरण में बदलाव, मौसम की अनियमितता और जलवायु परिवर्तन जैसे कारणों से मछलियों के व्यवहार में बदलाव हो सकता है, जिसका सीधा असर पारंपरिक मछली पकड़ने पर पड़ रहा है।
स्थानीय मछुआरा संगठनों ने सरकार से मांग की है कि इस कठिन समय में उन्हें आर्थिक सहायता दी जाए और वैकल्पिक रोजगार या राहत पैकेज उपलब्ध कराया जाए।
कुल मिलाकर, ट्रॉलिंग बैन के दौरान ‘चकारा’ न मिलने से मछुआरों की आजीविका पर गहरा असर पड़ा है और वे गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं।





