केरल
केरल हाईकोर्ट का बड़ा संदेश, न्यायिक व्यवस्था में सभी बेंचों का सम्मान जरूरी
Ratna Netam
26 Oct 2026 5:52 PM IST

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कोच्चि। केरल हाईकोर्ट ने न्यायिक संस्थाओं के भीतर आपसी सम्मान और अनुशासन को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि अदालत के सभी न्यायाधीश समान दर्जा और अधिकार रखते हैं। केवल अधिक न्यायाधीशों वाली बेंच होने से किसी बेंच को दूसरी बेंच पर निगरानी रखने या उसे निर्देश देने का अधिकार नहीं मिल जाता। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायाधीशों के विचार अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन किसी भी बेंच को दूसरी से श्रेष्ठ मानकर व्यवहार नहीं करना चाहिए।न्यायमूर्ति देवन रामचंद्रन और न्यायमूर्ति बसंत बालाजी की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक न्यायिक अपील की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने कहा कि न्यायिक व्यवस्था की मजबूती आपसी सम्मान, संस्थागत मर्यादा और अनुशासन से आती है, न कि किसी बेंच के दूसरी पर वर्चस्व स्थापित करने से।कोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट की एकल पीठ और खंडपीठ अपनी निर्धारित न्यायिक भूमिका के तहत काम करती हैं। खंडपीठ को अपील पर फैसला सुनाने का अधिकार है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि एकल पीठ उसके अधीनस्थ अधिकारी की तरह काम करती है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला तिरुवनंतपुरम सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक की एक पूर्व कर्मचारी आई. बिंदु से जुड़ा है। बैंक ने उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही की थी। कोल्लम श्रम न्यायालय ने 29 सितंबर 2023 को अनुशासनात्मक जांच और उसके आधार पर दी गई सजा को रद्द कर दिया था। हालांकि, बैंक को नए सिरे से कार्यवाही करने की अनुमति दी गई थी, जिसे तीन महीने के भीतर पूरा करना था।बाद में बैंक ने कार्यवाही पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा, जिसे श्रम न्यायालय ने मंजूरी दे दी। पूर्व कर्मचारी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। एकल न्यायाधीश ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद मामला अपील में खंडपीठ के सामने पहुंचा।
बड़ी बेंच होने का मतलब श्रेष्ठ होना नहीं
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि एकल पीठ और खंडपीठ के बीच न्यायिक अधिकारों को लेकर अधीनस्थ और वरिष्ठ अधिकारी जैसा संबंध नहीं है। दोनों हाईकोर्ट का हिस्सा हैं और संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने निर्धारित अधिकार क्षेत्र में काम करती हैं।अदालत ने कहा कि खंडपीठ किसी अपील में एकल न्यायाधीश के फैसले से असहमत हो सकती है। उचित कानूनी कारण होने पर वह फैसले को बरकरार रख सकती है, उसमें बदलाव कर सकती है या उसे रद्द कर सकती है। लेकिन अपीलीय अधिकार का इस्तेमाल संबंधित न्यायाधीश को सलाह देने, उनके काम करने के तरीके की आलोचना करने या अपने आप को उन पर प्रशासनिक रूप से श्रेष्ठ बताने के लिए नहीं किया जा सकता।
जिस मुद्दे पर विचार नहीं हुआ, उस पर दोबारा सुनवाई संभव
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि एकल पीठ ने किसी महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दे पर विचार नहीं किया है, तो खंडपीठ उस विषय पर पुनर्विचार के लिए मामला वापस भेज सकती है या संबंधित मुद्दे पर विचार करने का अनुरोध कर सकती है।हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि खंडपीठ किसी आदेश के जरिए एकल न्यायाधीश पर अपनी श्रेष्ठता स्थापित कर रही है। यह प्रक्रिया मुकदमे से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों की उचित न्यायिक समीक्षा सुनिश्चित करने के लिए होती है।अदालत के मुताबिक, न्यायिक संस्थाओं में आपसी मर्यादा बनाए रखने के लिए यह समझ जरूरी है कि अपीलीय समीक्षा और किसी न्यायाधीश पर प्रशासनिक नियंत्रण दो अलग-अलग बातें हैं।
श्रम न्यायालय का आदेश रद्द, दो महीने में दोबारा विचार के निर्देश
मामले में खंडपीठ ने पाया कि श्रम न्यायालय ने बैंक को अतिरिक्त समय देने के निर्णय में देरी के कारणों और पूर्व कर्मचारी की आपत्तियों पर पर्याप्त विचार नहीं किया था। इसलिए हाईकोर्ट ने एकल न्यायाधीश के फैसले और श्रम न्यायालय के समय बढ़ाने संबंधी आदेश को रद्द कर दिया।खंडपीठ ने श्रम न्यायालय को निर्देश दिया कि वह बैंक के आवेदन पर दोबारा उसके गुण-दोष के आधार पर विचार करे और दो महीने के भीतर उचित आदेश पारित करे।
न्यायिक व्यवस्था में आपसी सम्मान जरूरी
केरल हाईकोर्ट की इस टिप्पणी का प्रमुख संदेश है कि अदालतों में असहमति न्यायिक प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा है। न्यायाधीशों की राय अलग हो सकती है, लेकिन संस्थागत मर्यादा और आपसी सम्मान बनाए रखना जरूरी है।अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक अनुशासन का उद्देश्य किसी एक बेंच को दूसरी पर हावी करना नहीं, बल्कि कानून के अनुसार निष्पक्ष और प्रभावी न्याय सुनिश्चित करना है।
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