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Thiruvananthapuram तिरुवनंतपुरम। केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने बुधवार को केंद्र सरकार के प्रस्तावित परिसीमन अभ्यास की कड़ी आलोचना की। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे भारत की संघीय व्यवस्था को नुकसान पहुंच सकता है और राज्यों के बीच समान प्रतिनिधित्व का सिद्धांत कमजोर हो सकता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस कदम को केवल एक सामान्य प्रशासनिक सुधार के रूप में नहीं देखा जा सकता।
उन्होंने केंद्र सरकार की उस कथित योजना पर चिंता जताई, जिसमें 2011 की जनगणना के आधार पर संसद के विशेष सत्र में परिसीमन विधेयक लाने की बात कही जा रही है। उन्होंने कहा कि ऐसा प्रस्ताव राज्यों के अधिकारों को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है और लोकसभा में प्रतिनिधित्व के संतुलन को बिगाड़ सकता है।
विजयन ने व्यापक परामर्श की कमी पर भी सवाल उठाए और कहा कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर राज्यों से पर्याप्त चर्चा किए बिना आगे बढ़ती दिख रही है। उन्होंने कहा कि इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर सहमति जरूरी है, और इस प्रक्रिया को अत्यंत चिंताजनक बताया। मुख्यमंत्री ने चिंता यह भी जताई कि अधिक जनसंख्या वाले उत्तरी राज्यों का राजनीतिक वर्चस्व बढ़ सकता है।
उन्होंने कहा कि यदि संसदीय सीटें जनसंख्या के आधार पर बढ़ाई जाती हैं तो इन राज्यों को अधिक प्रतिनिधित्व मिलेगा और इससे लंबे समय तक राजनीतिक शक्ति का केंद्रीकरण हो सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि केरल और वे राज्य जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता पाई है, वे इससे असमान रूप से प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने कहा, ''जिन राज्यों ने परिवार नियोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण में जिम्मेदारी दिखाई है, वे अब नुकसान में जा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि ऐसे राज्यों का प्रतिनिधित्व घटाना एक निष्पक्ष संघीय व्यवस्था की भावना के खिलाफ है। मुख्यमंत्री ने इसे दोहरा मानदंड भी बताया और कहा कि जिन राज्यों को केंद्र सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण की नीति अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया, अब वे ही नुकसान में आ सकते हैं, जबकि जिन्होंने ऐसा नहीं किया उन्हें लाभ मिल सकता है।
उन्होंने इस प्रक्रिया को महिला आरक्षण जैसी प्रगतिशील योजनाओं से जोड़ने के प्रयासों की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि वे महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के पक्ष में हैं, लेकिन इसे संघीय संतुलन को कमजोर करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
लोकतंत्र को केवल संख्या का खेल नहीं बताते हुए विजयन ने कहा कि यह न्याय और संतुलित प्रतिनिधित्व पर आधारित होना चाहिए।
उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की कि वह इस कदम पर पुनर्विचार करे और इसे वापस ले, क्योंकि इससे देश की एकता और लोकतांत्रिक ढांचे पर गंभीर दीर्घकालिक प्रभाव हो सकते हैं।
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