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कोच्चि। केरल हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस पीएन रवींद्रन ने बुधवार को चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी SIR प्रक्रिया का बचाव किया। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को साफ, सही और अपडेट रखना है और इसे किसी एक सरकार या राजनीतिक दल से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। जस्टिस रवींद्रन के मुताबिक, इस तरह की विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया देश में पहले भी कई बार अपनाई जा चुकी है।
SIR को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच जस्टिस रवींद्रन ने कहा कि मौजूदा प्रक्रिया अपनी तरह की नौवीं कवायद है। उनके अनुसार, इससे पहले आठ बार इस तरह का विशेष गहन पुनरीक्षण किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के सत्ता में रहने के दौरान भी ऐसी प्रक्रिया अपनाई गई थी, इसलिए इसे किसी एक पार्टी के चुनाव आयोग पर नियंत्रण के रूप में नहीं देखा जा सकता।
जस्टिस रवींद्रन ने कहा, “स्पेशल इंटेंसिव रिविजन, SIR का नौवां चरण है। यह पहले भी हो चुका है—आठ बार ऐसा हुआ है। जब कांग्रेस पार्टी सत्ता में थी, तब भी ऐसा हुआ था। इसका मतलब यह नहीं है कि कांग्रेस पार्टी का चुनाव आयोग पर नियंत्रण था। नहीं। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो कई सालों से चल रही है।”
पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि मतदाता सूची को समय-समय पर अपडेट करना चुनावी व्यवस्था का जरूरी हिस्सा है। उनका तर्क था कि मतदाता सूची में मृत मतदाताओं, स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुके लोगों, एक से ज्यादा स्थानों पर दर्ज नामों और अन्य गलत प्रविष्टियों को पहचानने के लिए पुनरीक्षण प्रक्रिया की जरूरत होती है।
चुनाव आयोग की ओर से भी SIR को मतदाता सूची की शुद्धता से जोड़कर पेश किया गया है। केंद्र सरकार की ओर से लोकसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक, SIR के दौरान मतदाता सूची में नाम हटाने की प्रक्रिया सत्यापन के बाद की जाती है और इसमें मृत मतदाताओं, स्थायी रूप से स्थानांतरित लोगों, डुप्लीकेट प्रविष्टियों तथा बार-बार संपर्क के प्रयास के बावजूद नहीं मिलने वाले मतदाताओं जैसी श्रेणियां शामिल होती हैं।
आधिकारिक जानकारी के अनुसार, SIR प्रक्रिया में बूथ लेवल अधिकारी घर-घर सत्यापन करते हैं। किसी मतदाता को अनुपलब्ध मानने से पहले कई बार संपर्क करने की व्यवस्था रखी गई है। इसके बाद मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित होती है और लोगों को दावे तथा आपत्तियां दर्ज कराने का अवसर दिया जाता है। गलत तरीके से नाम हटाए जाने की स्थिति में अपील का प्रावधान भी मौजूद है।
केरल में भी SIR से जुड़ी सामग्री मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर उपलब्ध कराई गई है। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पोर्टल पर SIR 2026 से जुड़ी सूचियां और पहले हुए SIR 2002 के रिकॉर्ड भी उपलब्ध हैं। इससे साफ है कि विशेष पुनरीक्षण की प्रक्रिया का इतिहास मौजूदा दौर से पहले का भी है।
हालांकि SIR को लेकर देश के कई हिस्सों में राजनीतिक और कानूनी बहस भी जारी है। विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों ने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने तथा पात्र मतदाताओं के छूटने की आशंका को लेकर सवाल उठाए हैं। इसी मुद्दे पर कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं और मतदाता सूची की पारदर्शिता तथा सत्यापन प्रक्रिया को लेकर बहस तेज हुई है।
इस बीच पूर्व न्यायाधीशों और कानूनी विशेषज्ञों के एक समूह को भी SIR की संवैधानिक और वैधानिक वैधता की समीक्षा के लिए शामिल किया गया है। यह समीक्षा मतदाता सूची संशोधन से जुड़े कानूनी प्रावधानों और नागरिकों के मताधिकार की सुरक्षा जैसे मुद्दों को परखेगी।
जस्टिस रवींद्रन का कहना है कि किसी प्रक्रिया पर सवाल उठाना अलग बात है, लेकिन केवल इस आधार पर इसे गलत नहीं कहा जा सकता कि यह वर्तमान चुनाव आयोग या मौजूदा सरकार के समय हो रही है। उन्होंने जोर दिया कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण लंबे समय से चुनावी प्रशासन का हिस्सा रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसके कामकाज को राजनीतिक सत्ता के साथ सीधे जोड़ना उचित नहीं होगा। उनके अनुसार, अतीत में अलग-अलग सरकारों के समय भी मतदाता सूची को अपडेट करने के लिए गहन पुनरीक्षण किए गए हैं।
SIR के पक्ष में दिया गया जस्टिस रवींद्रन का बयान ऐसे समय आया है जब इस प्रक्रिया को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक टकराव बढ़ा हुआ है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल मतदाता सूची से नाम हटाने और प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठा रहे हैं, जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि इसका उद्देश्य पात्र मतदाताओं की सही सूची सुनिश्चित करना और गलत प्रविष्टियों को हटाना है।
केंद्र सरकार ने भी संसद में कहा है कि SIR चुनाव आयोग के वैधानिक अधिकार क्षेत्र के तहत आने वाली प्रक्रिया है। आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 के एक फैसले में SIR को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र और संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत उसके दायित्वों के अनुरूप माना था।
फिर भी SIR को लेकर बहस पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। एक तरफ इसके समर्थक इसे साफ मतदाता सूची के लिए जरूरी प्रशासनिक कवायद बता रहे हैं, वहीं आलोचक यह सुनिश्चित करने की मांग कर रहे हैं कि किसी भी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से न हटे।
जस्टिस पीएन रवींद्रन का बयान इसी बहस में SIR के समर्थन का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामने लाता है। उनका जोर इस बात पर है कि यह कोई नई या पहली बार अपनाई गई प्रक्रिया नहीं है, बल्कि भारतीय चुनावी व्यवस्था में पहले से मौजूद व्यवस्था का हिस्सा है। उनके मुताबिक, इसे राजनीतिक नियंत्रण के बजाय मतदाता सूची की शुद्धता के नजरिए से देखा जाना चाहिए।
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