
तिरुवनंतपुरम। केरल में विश्वविद्यालयों के कुलपतियों (वाइस चांसलर) की राजनीतिक गतिविधियों और सार्वजनिक बयानों को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री रोजी एम. जॉन ने कहा है कि विश्वविद्यालयों के वाइस चांसलरों को राजनीतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा संस्थानों के प्रमुखों को ऐसे सार्वजनिक बयान भी नहीं देने चाहिए, जिनसे समाज में विचारधारा के आधार पर विभाजन की स्थिति पैदा हो।
उच्च शिक्षा मंत्री ने सोमवार को जारी अपने बयान में कहा कि विश्वविद्यालयों के प्रमुखों की भूमिका शिक्षा, शोध और अकादमिक वातावरण को मजबूत करने की होती है। ऐसे में उन्हें किसी भी तरह की राजनीतिक पहचान से ऊपर रहकर काम करना चाहिए। मंत्री ने कहा कि उच्च शिक्षा क्षेत्र में निष्पक्षता और संस्थानों की गरिमा बनाए रखना बेहद जरूरी है।
रोजी एम. जॉन का यह बयान केरल यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर (VC) मोहनन कुन्नुम्मल की हालिया टिप्पणी के बाद आया है। वीसी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था, जहां उनके एक बयान को लेकर राजनीतिक विवाद शुरू हो गया।
कार्यक्रम के दौरान मोहनन कुन्नुम्मल ने ‘वंदे मातरम’ से जुड़े बयान दिए थे। उनके बयान पर विपक्षी दलों और कई संगठनों ने आपत्ति जताई। आलोचकों का कहना है कि विश्वविद्यालय के शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति को ऐसे मुद्दों पर सार्वजनिक टिप्पणी करते समय संवेदनशीलता बरतनी चाहिए।
मंत्री रोजी एम. जॉन ने कहा कि विश्वविद्यालयों के वाइस चांसलर समाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और उनके शब्दों का व्यापक प्रभाव पड़ता है। इसलिए उन्हें ऐसे बयानों से बचना चाहिए, जो किसी विशेष विचारधारा या समूह के समर्थन या विरोध के रूप में देखे जा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा संस्थान लोकतांत्रिक मूल्यों, वैज्ञानिक सोच और स्वतंत्र विचारों के केंद्र होते हैं। यहां सभी विचारों और मतों के लिए जगह होनी चाहिए। विश्वविद्यालय प्रमुखों से अपेक्षा की जाती है कि वे किसी भी राजनीतिक विवाद से दूर रहकर संस्थानों के हित में काम करें।
केरल में विश्वविद्यालयों को लेकर राजनीतिक बहस पहले भी होती रही है। राज्य में उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता, कुलपतियों की नियुक्ति और सरकार तथा राजभवन के बीच अधिकारों को लेकर कई बार विवाद सामने आ चुके हैं। ऐसे में वाइस चांसलर के बयान ने एक बार फिर शिक्षा और राजनीति के संबंध को लेकर चर्चा तेज कर दी है।
मंत्री के बयान के बाद राज्य में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी आने लगी हैं। कुछ नेताओं ने मंत्री के रुख का समर्थन करते हुए कहा कि विश्वविद्यालयों के प्रमुखों को अपनी संवैधानिक और अकादमिक जिम्मेदारियों को प्राथमिकता देनी चाहिए। वहीं, कुछ लोगों का मानना है कि शिक्षाविदों को अपने विचार रखने की स्वतंत्रता भी होनी चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार, विश्वविद्यालयों के कुलपति केवल प्रशासनिक अधिकारी नहीं होते, बल्कि वे शिक्षा व्यवस्था के मार्गदर्शक भी होते हैं। इसलिए उनके सार्वजनिक बयानों में संतुलन और जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है। किसी भी बयान का असर छात्रों, शिक्षकों और पूरे संस्थान के माहौल पर पड़ सकता है।
विवाद के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या विश्वविद्यालयों के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों को राजनीतिक आयोजनों में शामिल होना चाहिए या नहीं। एक पक्ष का मानना है कि व्यक्तिगत रूप से किसी कार्यक्रम में शामिल होना उनका अधिकार है, जबकि दूसरा पक्ष मानता है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को ऐसी गतिविधियों से दूरी बनाए रखनी चाहिए।
फिलहाल केरल सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच इस मुद्दे पर बहस जारी है। उच्च शिक्षा मंत्री के बयान के बाद यह साफ है कि सरकार विश्वविद्यालयों के प्रमुखों से एक तटस्थ और गैर-राजनीतिक भूमिका की उम्मीद कर रही है।
वहीं, वाइस चांसलर मोहनन कुन्नुम्मल की टिप्पणी को लेकर विवाद अभी थमा नहीं है। आने वाले दिनों में इस मामले पर राजनीतिक और शैक्षणिक क्षेत्रों में और चर्चा होने की संभावना है। यह मामला एक बार फिर इस बहस को सामने ले आया है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में पदों पर बैठे लोगों को सार्वजनिक जीवन में किस तरह की मर्यादा बनाए रखनी चाहिए।





