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Kerala केरल: आयोजित केरल लिटरेचर फेस्टिवल (Kerala Literature Festival) ने इस बार भी साहित्य और विचारों के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखी है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा कि यह महोत्सव कोझिकोड बीच पर आयोजित किया जाता है और बड़ी संख्या में लोगों को आकर्षित करता है। यह फेस्टिवल न केवल साहित्यिक गतिविधियों का केंद्र है, बल्कि केरल की गहरी साहित्यिक संस्कृति और विचारों के प्रति प्रेम को भी दर्शाता है। शशि थरूर ने कहा, “केरल पूरे देश में पढ़ाई और लेखन के लिए जाना जाता है। यहां के लोग साहित्य, विचार और किताबों के प्रति बेहद उत्साहित हैं। केरल लिटरेचर फेस्टिवल इस बात का जीवंत प्रमाण है कि राज्य में साहित्य और विचारों को बढ़ावा देने की कितनी गहन परंपरा रही है।
फेस्टिवल में देशभर और विदेशों से लेखक, विचारक, साहित्यिक समीक्षक और युवा प्रतिभाएं शामिल हुईं। उन्होंने यहां अपनी किताबें, शोध कार्य और साहित्यिक विचार प्रस्तुत किए। कार्यक्रम में विभिन्न सत्रों के तहत किताबों की प्रदर्शनी, साहित्यिक चर्चाएं, विचार गोष्ठियां और लेखकों के इंटरैक्टिव सेशन आयोजित किए गए। थरूर ने फेस्टिवल के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि यह सिर्फ मनोरंजन का मंच नहीं है, बल्कि यह नई पुस्तकों, लेखक और साहित्यिक विचारों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित करने का अवसर भी देता है। उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजनों से साहित्य और संस्कृति के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ती है और नई पीढ़ी को पढ़ाई और लेखन के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
केरल लिटरेचर फेस्टिवल में विभिन्न भाषाओं के लेखक अपनी कहानियों, उपन्यासों, कविताओं और शोध कार्यों को साझा करते हैं। यह फेस्टिवल साहित्यिक विविधता और बहुभाषिक संवाद को बढ़ावा देने में भी अहम भूमिका निभाता है। थरूर ने बताया कि इस फेस्टिवल में युवा लेखक और नए विचारों को विशेष मंच प्रदान किया जाता है, जिससे उनकी प्रतिभा को पहचान और प्रोत्साहन मिलता है। शशि थरूर ने फेस्टिवल के आयोजकों की सराहना करते हुए कहा कि यह महोत्सव केरल की साहित्यिक धरोहर को संरक्षित करने और साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देने का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के आयोजनों से साहित्य और विचारों का व्यापक प्रसार होता है, जिससे समाज में आलोचनात्मक सोच और रचनात्मकता को बढ़ावा मिलता है। फेस्टिवल के दौरान कोझिकोड बीच पर आयोजित सत्रों ने उपस्थित लोगों को लेखक से मिलकर बातचीत करने और विचार साझा करने का अवसर दिया। थरूर ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे आयोजन साहित्य और समाज को जोड़ने, शिक्षा और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए अति आवश्यक हैं।
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