केरल

CJI सूर्यकांत ने अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणि को किया सम्मानित, गुरु को किया याद

Ratna Netam
31 Oct 2026 7:33 PM IST
CJI सूर्यकांत ने अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणि को किया सम्मानित, गुरु को किया याद
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कोच्चि। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने शनिवार, 31 अक्टूबर 2026 को देश के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि को प्रतिष्ठित 'प्रोफेसर एन. आर. माधव मेनन मेमोरियल ट्रिब्यूट ऑफ ऑनर अवार्ड' से सम्मानित किया। इस अवसर पर उन्होंने देश में कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक योगदान देने वाले प्रोफेसर एन. आर. माधव मेनन को श्रद्धांजलि अर्पित की। मुख्य न्यायाधीश ने वेंकटरमणि और प्रोफेसर मेनन के बीच करीब पांच दशक पुराने गुरु-शिष्य संबंध को याद करते हुए कहा कि एक अच्छे शिक्षक का प्रभाव केवल कक्षा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह विद्यार्थियों के पूरे जीवन और उनके कार्यों में दिखाई देता है।कोच्चि में आयोजित समारोह में केरल उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सौमेन सेन भी उपस्थित रहे। प्रोफेसर माधव मेनन की स्मृति में स्थापित यह दूसरा 'ट्रिब्यूट ऑफ ऑनर' पुरस्कार था। समारोह में न्यायिक जगत और कानूनी शिक्षा में मेनन के योगदान को विशेष रूप से याद किया गया।
गुरु-शिष्य के रिश्ते को बताया प्रेरणादायक
अपने संबोधन में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि और प्रोफेसर माधव मेनन का संबंध भारतीय कानूनी शिक्षा की एक प्रेरणादायक कहानी है। यह संबंध वर्ष 1974 में शुरू हुआ था, जब वेंकटरमणि ने पुडुचेरी के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज में प्रवेश लिया था।उसी वर्ष प्रोफेसर माधव मेनन ने इस संस्थान के प्राचार्य का पद संभाला था। यहीं से दोनों के बीच शिक्षक और विद्यार्थी का रिश्ता स्थापित हुआ, जिसका प्रभाव वेंकटरमणि के पूरे पेशेवर जीवन में दिखाई दिया।सीजेआई ने कहा कि एक शिक्षक द्वारा दिए गए आदर्श और मूल्य विद्यार्थी को जीवनभर दिशा दिखाते हैं। उन्होंने वेंकटरमणि के करीब पांच दशक लंबे कानूनी करियर का उल्लेख करते हुए बताया कि उन्होंने अपने गुरु से प्राप्त सिद्धांतों को हमेशा महत्व दिया।
कानूनी शिक्षा में माधव मेनन का ऐतिहासिक योगदान
मुख्य न्यायाधीश ने प्रोफेसर एन. आर. माधव मेनन को भारतीय कानूनी शिक्षा के आधुनिक स्वरूप का प्रमुख शिल्पकार बताया। उन्होंने कहा कि मेनन ने कानून की पढ़ाई को केवल पेशेवर डिग्री तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे सामाजिक परिवर्तन और न्याय व्यवस्था को मजबूत बनाने का माध्यम बनाया।प्रोफेसर मेनन ने वर्ष 1986 में बेंगलुरु में नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी की स्थापना की थी। उन्होंने पांच वर्षीय एकीकृत एलएलबी पाठ्यक्रम को विकसित करने में अग्रणी भूमिका निभाई। इस पहल ने देश में कानून की पढ़ाई के तरीके में महत्वपूर्ण बदलाव किया।इसके बाद उन्होंने कोलकाता में वेस्ट बंगाल नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरिडिकल साइंसेज और भोपाल में नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी की स्थापना में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।इन संस्थानों ने देश में कानून के विद्यार्थियों, अधिवक्ताओं और न्यायिक अधिकारियों के प्रशिक्षण को नई दिशा दी।
कानून को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बताया
सीजेआई सूर्यकांत ने प्रोफेसर मेनन के विचारों को याद करते हुए कहा कि कानून की शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल अदालतों में मुकदमे लड़ने के लिए पेशेवर तैयार करना नहीं होना चाहिए।उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कानून का सही ज्ञान समाज में न्याय, समानता और अधिकारों की रक्षा का माध्यम बन सकता है।प्रोफेसर मेनन विशेष रूप से गरीब, वंचित और हाशिए पर रहने वाले समुदायों को न्याय दिलाने के पक्षधर थे। उनका मानना था कि कानूनी शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को समाज की वास्तविक समस्याओं और कमजोर वर्गों की कठिनाइयों से परिचित होना चाहिए।इसी सोच के कारण उन्होंने कानूनी सहायता और सामाजिक जिम्मेदारी को विधि शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने पर जोर दिया।
अटॉर्नी जनरल के योगदान की सराहना
मुख्य न्यायाधीश ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि के लंबे कानूनी अनुभव और उनकी पेशेवर उपलब्धियों की भी सराहना की।उन्होंने बताया कि वेंकटरमणि ने अपने करियर के दौरान सर्वोच्च न्यायालय में संवैधानिक कानून, पर्यावरण संरक्षण, कराधान, आदिवासी अधिकारों तथा महिलाओं और बच्चों के अधिकारों से जुड़े अनेक मामलों में पैरवी की है।सीजेआई ने कहा कि देश के सर्वोच्च विधि अधिकारी के रूप में वेंकटरमणि ने अपने दायित्वों का निर्वहन संयम, सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता और विनम्रता के साथ किया है।उन्होंने इस बात को भी रेखांकित किया कि किसी महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर पहुंचना केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि उसके साथ बड़ी जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है।
शिक्षक की सबसे बड़ी उपलब्धि उसके विद्यार्थी
समारोह के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि प्रोफेसर माधव मेनन की विरासत केवल उनके द्वारा स्थापित संस्थानों में ही नहीं, बल्कि उन हजारों विद्यार्थियों में भी जीवित है, जिन्होंने उनसे शिक्षा और प्रेरणा प्राप्त की।उन्होंने कहा कि एक महान शिक्षक अपने विद्यार्थियों की सोच, कार्यशैली और सामाजिक दृष्टिकोण को प्रभावित करता है। जब विद्यार्थी समाज और देश के लिए महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, तब उनके शिक्षक की शिक्षा का वास्तविक महत्व सामने आता है।सीजेआई ने यह भी याद किया कि प्रोफेसर मेनन ने अपने कानूनी करियर की शुरुआत केरल उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में की थी। बाद में उन्होंने विधि शिक्षा और संस्थान निर्माण के क्षेत्र में राष्ट्रीय पहचान बनाई।जीवन के अंतिम वर्षों में भी वे अधिवक्ताओं की निरंतर शिक्षा और पेशेवर विकास से जुड़ी गतिविधियों में सक्रिय रहे।
पुरस्कार को बताया गुरु की विरासत का सम्मान
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणि को दिया गया यह सम्मान केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियों की पहचान नहीं है, बल्कि उनके शिक्षक प्रोफेसर माधव मेनन के आदर्शों और योगदान को भी सम्मानित करता है।उन्होंने अपने संबोधन के अंत में कहा कि किसी व्यक्ति की वास्तविक विरासत केवल इमारतों और स्मारकों से नहीं बनती, बल्कि उन विचारों, विद्यार्थियों और संस्थानों से बनती है जिन्हें वह अपने पीछे छोड़ जाता है।समारोह ने यह संदेश दिया कि शिक्षा का प्रभाव पीढ़ियों तक बना रहता है। प्रोफेसर माधव मेनन और आर. वेंकटरमणि का गुरु-शिष्य संबंध इसी परंपरा का उदाहरण है।यह सम्मान भारतीय न्याय व्यवस्था में शिक्षकों की भूमिका, नैतिक मूल्यों और कानूनी शिक्षा के सामाजिक महत्व को रेखांकित करने वाला अवसर बना।
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