केरल

KAAPA मामले में भाजपा पार्षद सुगाथन को बड़ी राहत

Ratna Netam
6 Oct 2026 8:35 PM IST
KAAPA मामले में भाजपा पार्षद सुगाथन को बड़ी राहत
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तिरुवनंतपुरम। केरल हाई कोर्ट ने तिरुवनंतपुरम कॉर्पोरेशन के वझोट्टुकोनम वार्ड से भाजपा पार्षद आर. सुगाथन के खिलाफ केरल एंटी-सोशल एक्टिविटीज (प्रिवेंटिव) एक्ट यानी KAAPA के तहत जारी एहतियाती हिरासत आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत के इस फैसले से विय्युर सेंट्रल जेल में बंद सुगाथन को बड़ी राहत मिली है। हाई कोर्ट ने यह आदेश उनकी पत्नी जी.आर. अश्वथी की ओर से दाखिल हेबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई के बाद दिया।मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अनिल के. नरेंद्रन और न्यायमूर्ति मुरली कृष्ण एस. की खंडपीठ ने की। याचिका में सुगाथन की पत्नी ने उनके खिलाफ 8 जून को जारी किए गए प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश की वैधता को चुनौती दी थी। उन्होंने सवाल उठाया था कि जिस आधार पर उनके पति को KAAPA के तहत हिरासत में लिया गया, वह कानूनी कसौटी पर टिकता है या नहीं। हाई कोर्ट ने पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद हिरासत आदेश निरस्त कर दिया।
अदालत ने अपने संक्षिप्त आदेश में याचिका स्वीकार करते हुए विय्युर सेंट्रल जेल एवं करेक्शनल होम के अधीक्षक को आदेश की जानकारी तत्काल पहुंचाने का निर्देश दिया। इससे सुगाथन की रिहाई का रास्ता साफ हो गया है, हालांकि यदि उनके खिलाफ किसी अन्य मामले में वैध हिरासत या न्यायिक आदेश प्रभावी है तो उसकी स्थिति अलग से देखी जाएगी।आर. सुगाथन तिरुवनंतपुरम नगर निगम के वझोट्टुकोनम वार्ड से निर्वाचित पार्षद हैं। वह पिछले कुछ महीनों से KAAPA के तहत हिरासत में थे और विय्युर सेंट्रल जेल में रखे गए थे। जुलाई में भी उनका मामला हाई कोर्ट के सामने आया था, जब उन्होंने जेल में रहते हुए पार्षद पद की दोबारा शपथ लेने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। उस समय अदालत ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हवाला देते हुए जेल परिसर में ही उनके शपथ ग्रहण की व्यवस्था करने का निर्देश दिया था।
उस पुराने मामले में हाई कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार सुगाथन दिसंबर 2025 में हुए स्थानीय निकाय चुनाव में वझोट्टुकोनम वार्ड से चुने गए थे। चुनाव परिणाम 13 दिसंबर 2025 को घोषित हुआ था और उन्होंने 21 दिसंबर को पार्षद पद की शपथ ली थी। बाद में हाई कोर्ट ने कुछ पार्षदों की शपथ प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप नहीं मानते हुए उन्हें दोबारा शपथ लेने का निर्देश दिया था। सुगाथन उस समय जेल में थे, इसलिए अदालत ने 14 जुलाई 2026 को विय्युर सेंट्रल जेल के भीतर ही शपथ ग्रहण कराने की अनुमति दी थी।सुगाथन के खिलाफ KAAPA के तहत की गई कार्रवाई को लेकर शुरू से ही कानूनी विवाद रहा। उनकी पत्नी की ओर से दाखिल हेबियस कॉर्पस याचिका में कहा गया कि प्रिवेंटिव डिटेंशन जैसी कठोर कार्रवाई केवल उन्हीं परिस्थितियों में लागू की जानी चाहिए, जब कानून में निर्धारित सभी शर्तें स्पष्ट रूप से पूरी होती हों। याचिका में हिरासत आदेश के आधार, प्रक्रिया और परिस्थितियों पर सवाल उठाए गए थे।
KAAPA, 2007 का उद्देश्य कथित असामाजिक गतिविधियों में लगातार शामिल लोगों के खिलाफ निवारक कार्रवाई की व्यवस्था करना है। यह सामान्य आपराधिक मुकदमे से अलग है क्योंकि इसमें किसी व्यक्ति को भविष्य में कानून-व्यवस्था के लिए खतरा मानते हुए एहतियाती रूप से हिरासत में लिया जा सकता है। इसी कारण ऐसे मामलों में अदालतें हिरासत आदेश जारी करते समय अपनाई गई प्रक्रिया और उपलब्ध सामग्री की बारीकी से जांच करती हैं।हाई कोर्ट के ताजा फैसले से यह स्पष्ट हुआ कि सुगाथन के मामले में जारी डिटेंशन आदेश न्यायिक समीक्षा में कायम नहीं रह सका। हालांकि विस्तृत फैसले में अदालत ने किन कानूनी कमियों या आधारों को निर्णायक माना, उसकी पूरी जानकारी आदेश के विस्तृत पाठ से स्पष्ट होगी।
इस मामले का एक राजनीतिक और नगर निगम से जुड़ा पक्ष भी रहा है। सुगाथन की अनुपस्थिति और निगम की बैठकों में उनकी उपस्थिति से जुड़े रिकॉर्ड को लेकर भी विवाद सामने आया था। विपक्षी LDF ने आरोप लगाया था कि निगम के रिकॉर्ड में उनके हस्ताक्षर से जुड़ी गड़बड़ियां थीं और उन्हें अयोग्यता से बचाने की कोशिश की गई। भाजपा की ओर से इन आरोपों का विरोध किया गया। यह विवाद उनके KAAPA हिरासत मामले से अलग है, लेकिन सुगाथन को लेकर राजनीतिक बहस को इससे और बल मिला।नगरपालिका कानून के तहत लगातार तीन बैठकों से बिना अनुमति अनुपस्थित रहने पर किसी पार्षद की सदस्यता पर सवाल उठ सकते हैं। इसी पृष्ठभूमि में सुगाथन की अनुपस्थिति, छुट्टी और बैठक रिकॉर्ड का मामला नगर निगम की राजनीति में चर्चा का विषय बना रहा। अगस्त में निगम परिषद ने उन्हें छह महीने की छुट्टी देने से संबंधित प्रस्ताव भी पारित किया था।
अब हाई कोर्ट द्वारा KAAPA हिरासत आदेश रद्द किए जाने के बाद सुगाथन को कानूनी रूप से अहम राहत मिली है। यह फैसला निवारक हिरासत से जुड़े मामलों में न्यायिक जांच के महत्व को भी रेखांकित करता है। ऐसे मामलों में अदालतें यह देखती हैं कि प्रशासनिक अधिकारों का इस्तेमाल कानून के अनुरूप हुआ है या नहीं और व्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाया गया प्रतिबंध उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए लगाया गया है या नहीं।फिलहाल अदालत के आदेश के बाद विय्युर सेंट्रल जेल प्रशासन को आवश्यक कार्रवाई करनी होगी। इसके साथ ही सुगाथन से जुड़े अन्य लंबित मामलों और नगर निगम में उनकी भूमिका पर भी राजनीतिक नजरें बनी रहेंगी। हाई कोर्ट का यह फैसला हालांकि स्पष्ट रूप से केवल KAAPA के तहत जारी प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश से संबंधित है।
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