
केरल : चिट्टुमाला ब्लॉक पंचायत के पेरायम डिवीजन के सदस्य ए.के. प्रसन्नकुमार ने जनसेवा की एक अनोखी मिसाल पेश की है। आमतौर पर जनप्रतिनिधियों को मिलने वाला मानदेय उनके व्यक्तिगत खर्चों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन प्रसन्नकुमार ने अपने मानदेय की पूरी राशि जरूरतमंद लोगों और सामाजिक संस्थाओं को समर्पित कर दी है।
प्रसन्नकुमार का कहना है कि जनप्रतिनिधि की भूमिका केवल राजनीतिक जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि समाज के कमजोर और जरूरतमंद लोगों की मदद करना भी उसका कर्तव्य है। इसी सोच के साथ उन्होंने अपने पद से मिलने वाले पहले मानदेय से लेकर अब तक प्राप्त हर राशि को जरूरतमंदों की सहायता में लगा दिया है।
उन्होंने बताया कि वह अपने मानदेय के अलावा अपनी निजी कमाई का एक हिस्सा भी ऐसे लोगों की मदद में खर्च करते हैं, जो आर्थिक परेशानियों से गुजर रहे हैं। इनमें बेघर लोग, लंबे समय से बीमारी के कारण बिस्तर पर पड़े मरीज और विभिन्न सामाजिक संस्थाएं शामिल हैं।
प्रसन्नकुमार का यह कदम उन्हें अन्य जनप्रतिनिधियों से अलग बनाता है। उनका मानना है कि राजनीति का उद्देश्य केवल पद हासिल करना नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाना होना चाहिए। वह जनसेवा को किसी लाभ या पहचान से जोड़कर नहीं देखते, बल्कि इसे एक नैतिक जिम्मेदारी मानते हैं।
प्रसन्नकुमार उपजीवनम नाम की एक जीवन बीमा एजेंसी से जुड़े हुए हैं। उनका कहना है कि यह कोई सार्वजनिक धन जुटाने या पैसा कमाने का अभियान नहीं है, बल्कि उनकी व्यक्तिगत पहल है। वह अपनी मेहनत से अर्जित आय का उपयोग समाज के उन लोगों के लिए करना चाहते हैं, जिन्हें वास्तव में सहायता की जरूरत है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, प्रसन्नकुमार लंबे समय से जरूरतमंदों की मदद करते आ रहे हैं। उन्होंने कई ऐसे परिवारों की सहायता की है, जो बीमारी, आर्थिक संकट या अन्य कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहे थे। उनकी मदद केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह व्यक्तिगत रूप से लोगों की समस्याओं को समझने और समाधान खोजने की कोशिश भी करते हैं।
एक जनप्रतिनिधि के रूप में प्रसन्नकुमार का मानना है कि जनता ने उन्हें केवल प्रतिनिधित्व करने के लिए नहीं चुना है, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का अवसर दिया है। इसी भावना के कारण उन्होंने अपने मानदेय को व्यक्तिगत सुविधा के बजाय जनकल्याण के लिए इस्तेमाल करने का फैसला किया।
उनका कहना है कि राजनीति में सेवा भावना सबसे महत्वपूर्ण होनी चाहिए। जनप्रतिनिधियों को जनता से मिले विश्वास का सम्मान करना चाहिए और अपने पद का इस्तेमाल समाज की भलाई के लिए करना चाहिए। उनके अनुसार, छोटी-छोटी मदद भी किसी जरूरतमंद व्यक्ति के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती है।
प्रसन्नकुमार की इस पहल की स्थानीय स्तर पर सराहना हो रही है। लोगों का कहना है कि जब जनप्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारियों को केवल प्रशासनिक कामों तक सीमित न रखकर मानवीय दृष्टिकोण से निभाते हैं, तो समाज में सकारात्मक संदेश जाता है।
आज के समय में जब राजनीति को अक्सर स्वार्थ और व्यक्तिगत लाभ से जोड़कर देखा जाता है, ऐसे में प्रसन्नकुमार का उदाहरण सेवा और समर्पण की भावना को सामने लाता है। उनका प्रयास यह संदेश देता है कि जनप्रतिनिधि का असली मूल्य उसके पद से नहीं, बल्कि जनता के लिए किए गए कार्यों से तय होता है।
ए.के. प्रसन्नकुमार का यह योगदान न केवल जरूरतमंद लोगों के लिए मददगार साबित हो रहा है, बल्कि अन्य जनप्रतिनिधियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रहा है। उनका मानना है कि समाज से मिले सम्मान और जिम्मेदारी का सबसे अच्छा उपयोग समाज की सेवा करके ही किया जा सकता है।





