
कोच्चि: राज्य की राजनीति में हलचल मचाने वाले एक फैसले में, केरल हाई कोर्ट ने शुक्रवार को विजिलेंस एंड एंटी-करप्शन ब्यूरो (VACB) को CMRL-एक्सलॉजिक पे-ऑफ मामले में पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन, उनकी बेटी वीणा टी, और दामाद व पूर्व मंत्री पी ए मोहम्मद रियास के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने बिना FIR दर्ज किए प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जानकारी के आधार पर शुरुआती जांच करने के लिए राज्य सरकार द्वारा विशेष जांच दल (SIT) गठित करने के फैसले को भी रद्द कर दिया।
कोर्ट ने कहा, "जब जानकारी, साथ ही दर्ज किए गए बयानों और प्राप्त दस्तावेजों से संबंधित व्यक्तियों द्वारा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध किए जाने का पता चलता है, तो मामले के तथ्यों की और शुरुआती जांच की कोई आवश्यकता नहीं है।"
कोर्ट ने कहा कि जब प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा जुटाई गई जानकारी के आधार पर FIR दर्ज करने के लिए प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) की धारा 66(2) के तहत जानकारी भेजी जाती है, जिससे किसी निर्धारित अपराध या अपराधों के होने का पता चलता है, तो राज्य पुलिस FIR दर्ज करने के लिए बाध्य है। कोर्ट ने आगे कहा कि इससे अधिसूचित एजेंसी को जहां आवश्यक हो, वहां स्वतंत्र शुरुआती जांच करने से छूट नहीं मिलती है। कोर्ट ने कहा, "हालांकि, मौजूदा मामले में, ED द्वारा राज्य पुलिस प्रमुख को भेजी गई जानकारी में CMRL और एक्सलॉजिक से जुड़े कथित कॉर्पोरेट धोखाधड़ी के बारे में विस्तृत सामग्री शामिल थी। इसलिए, FIR दर्ज करने से पहले किसी और शुरुआती जांच की आवश्यकता नहीं थी।"
जस्टिस ए बदरुद्दीन ने एक्टिविस्ट-वकील के एम शाहजहान द्वारा दायर एक याचिका पर यह आदेश पारित किया, जिसमें भ्रष्टाचार का मामला दर्ज करने के बजाय क्राइम ब्रांच SIT के माध्यम से शुरुआती जांच करने के राज्य सरकार के फैसले को चुनौती दी गई थी।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि पुलिस महानिदेशक (DGP) के पास ऐसी विशेष टीम गठित करने का कोई अधिकार नहीं था। कोर्ट ने कहा कि नोटबुक्स और डायरियों के अलावा, ED ने राज्य पुलिस प्रमुख को जो जानकारी भेजी थी, उसमें कई गवाहों और संदिग्ध लोगों के बयानों समेत काफी सबूत थे। कोर्ट ने कहा, "इस मामले के तथ्यों को देखते हुए, बिना FIR दर्ज किए जांच के लिए स्पेशल टीम बनाने का सरकार का फ़ैसला गैर-कानूनी पाया गया है और इसलिए इसे रद्द किया जाता है।"
कोर्ट ने SIT को निर्देश दिया, जिसके पास PMLA की धारा 66(2) के तहत मिली जानकारी है, कि वह इसे तुरंत VACB डायरेक्टर को सौंप दे ताकि FIR दर्ज की जा सके और कानून के मुताबिक आगे की कार्रवाई हो सके। कोर्ट ने ED को भी सभी ज़रूरी दस्तावेज़ VACB को भेजने का निर्देश दिया। साथ ही, FIR दर्ज करने के बाद जांच के लिए ज़रूरी कोई भी अतिरिक्त दस्तावेज़ मांगने की छूट भी VACB को दी।
याचिका का विरोध करते हुए एडवोकेट जनरल जाजू बाबू ने कहा कि राज्य सरकार PMLA की धारा 66(2) के तहत जानकारी मिलने पर ही FIR दर्ज करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं थी। उन्होंने तर्क दिया कि ED द्वारा भेजी गई जानकारी में लगाए गए आरोपों की सच्चाई का पता लगाने के लिए सरकार के पास शुरुआती जांच करने का विकल्प था। AG ने यह भी कहा कि CMRL के अधिकृत प्रतिनिधि द्वारा रखी गई डायरी में की गई एंट्रीज़ का कोई सबूत के तौर पर महत्व नहीं है।





