कर्नाटक

काबिनी और KRS का जलस्तर घटा किसानों की बढ़ी चिंता

Kavita2
7 Sept 2026 10:49 AM IST
काबिनी और KRS का जलस्तर घटा किसानों की बढ़ी चिंता
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बेंगलुरु। तमिलनाडु के लिए पानी छोड़े जाने के बीच काबिनी और कृष्णराज सागर (KRS) जलाशयों में लगातार घटता जलस्तर किसानों के लिए चिंता का बड़ा कारण बनता जा रहा है। खासकर मैसूर क्षेत्र में धान की खेती करने वाले किसान सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिलने को लेकर परेशान हैं। अधिकारियों के मुताबिक मौजूदा स्थिति गंभीर बनी हुई है और जलाशयों में उपलब्ध पानी मुख्य रूप से पेयजल जरूरतों को पूरा करने के लिए ही पर्याप्त रहने की स्थिति बन सकती है।

अगस्त के अंतिम सप्ताह में कोडगु क्षेत्र में हुई बारिश के बाद जलाशयों में पानी की आवक बढ़ी थी। इससे कुछ समय के लिए राहत की उम्मीद जगी, लेकिन तमिलनाडु की ओर पानी छोड़े जाने और सिंचाई तथा अन्य जरूरतों के कारण जलाशयों का स्तर फिर चिंता का विषय बन गया है।

काबिनी और KRS दोनों जलाशय क्षेत्र की जल व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इनसे पेयजल के साथ कृषि क्षेत्र को भी पानी उपलब्ध कराया जाता है। इसलिए जलस्तर में गिरावट का सीधा असर किसानों और शहरी आबादी दोनों पर पड़ने की आशंका रहती है।

मैसूर क्षेत्र में धान की खेती करने वाले किसानों की परेशानी ज्यादा है क्योंकि धान की फसल के लिए बड़ी मात्रा में और नियमित रूप से पानी की जरूरत होती है। खेतों को आवश्यक समय पर पर्याप्त पानी नहीं मिलने की स्थिति में फसल की वृद्धि और उत्पादन प्रभावित हो सकता है।

किसानों को चिंता है कि यदि आने वाले दिनों में जलाशयों में पानी की आवक नहीं बढ़ती है तो सिंचाई के लिए पानी छोड़ना मुश्किल हो सकता है। अधिकारियों की प्राथमिकता पहले लोगों की पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करने की होगी। ऐसे में कृषि के लिए उपलब्ध पानी पर दबाव बढ़ सकता है।

कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के पानी का मुद्दा लंबे समय से संवेदनशील रहा है। दोनों राज्यों की बड़ी आबादी पेयजल और कृषि के लिए इस नदी प्रणाली पर निर्भर है। कम बारिश वाले वर्षों में पानी के बंटवारे का सवाल और ज्यादा गंभीर हो जाता है।

KRS जलाशय कावेरी नदी प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसका पानी मैसूर समेत आसपास के क्षेत्रों की कृषि तथा पेयजल जरूरतों के लिए उपयोग किया जाता है। वहीं काबिनी जलाशय भी क्षेत्र की सिंचाई व्यवस्था में अहम भूमिका निभाता है। दोनों जलाशयों में पानी की स्थिति इसलिए लगातार निगरानी में रहती है।

अधिकारियों के अनुसार अगस्त के आखिरी सप्ताह में कोडगु में हुई बारिश से जलाशयों में आवक में सुधार जरूर हुआ था। लेकिन केवल कुछ दिनों की अच्छी बारिश लंबी अवधि की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त साबित नहीं हो सकती। जलाशयों का भंडारण इस बात पर निर्भर करेगा कि आने वाले दिनों में कैचमेंट क्षेत्रों में कितनी बारिश होती है।

मानसून के दौरान कावेरी बेसिन में होने वाली बारिश जलाशयों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है। कोडगु और आसपास के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अच्छी बारिश होने पर नदियों में पानी की आवक बढ़ती है और इसका फायदा नीचे स्थित जलाशयों को मिलता है। बारिश कमजोर होने पर जलस्तर तेजी से प्रभावित हो सकता है।

मौजूदा परिस्थितियों में प्रशासन के सामने पानी के प्रबंधन की बड़ी चुनौती है। एक तरफ पेयजल की जरूरत है तो दूसरी तरफ किसानों को अपनी खड़ी फसल बचाने के लिए सिंचाई की आवश्यकता है। इसके साथ तमिलनाडु को निर्धारित पानी छोड़ने का मुद्दा भी जुड़ा हुआ है।

किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय फसल की वृद्धि का होता है। धान जैसी अधिक पानी वाली फसल में सिंचाई की कमी होने पर नुकसान की आशंका बढ़ जाती है। यही कारण है कि मैसूर क्षेत्र के किसान जलाशयों के स्तर और नहरों में पानी छोड़े जाने से संबंधित हर फैसले पर नजर बनाए हुए हैं।

यदि उपलब्ध पानी का बड़ा हिस्सा पेयजल के लिए सुरक्षित रखना पड़ता है तो सिंचाई के लिए पानी की मात्रा कम हो सकती है। ऐसी स्थिति में कृषि विभाग और जल संसाधन से जुड़े अधिकारियों को किसानों के लिए वैकल्पिक रणनीति पर भी विचार करना पड़ सकता है।

जल संकट की स्थिति में किसानों को कम पानी वाली फसलों की ओर जाने की सलाह भी दी जाती रही है। लेकिन जिन किसानों ने पहले ही धान की बुवाई या रोपाई कर ली है, उनके सामने तत्काल फसल बचाने की चुनौती होती है। ऐसे किसानों के लिए जलाशयों से मिलने वाला पानी बेहद महत्वपूर्ण है।

जलाशयों का स्तर कम होने का असर केवल मौजूदा फसल पर ही नहीं बल्कि आने वाले महीनों की जल उपलब्धता पर भी पड़ सकता है। मानसून समाप्त होने के बाद लंबे समय तक जलाशयों में जमा पानी पर निर्भर रहना पड़ता है। इसलिए अभी कितना पानी बचाया जाता है, यह भविष्य की पेयजल जरूरतों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।

प्रशासन को उपलब्ध जल भंडार, संभावित आवक और आगामी महीनों की जरूरतों का आकलन कर पानी छोड़ने के फैसले लेने होंगे। इसमें घरेलू उपयोग, कृषि और अन्य आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण होगा।

तमिलनाडु के लिए पानी छोड़े जाने का मुद्दा भी किसानों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। कर्नाटक के किसानों की चिंता है कि जलाशयों का स्तर गिरने के बीच उनकी फसलों के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध रहना चाहिए। दूसरी ओर कावेरी बेसिन के निचले हिस्सों में स्थित तमिलनाडु भी अपनी कृषि और पेयजल जरूरतों के लिए नदी के पानी पर निर्भर है।

ऐसे में कावेरी जल प्रबंधन से जुड़े फैसले केवल एक क्षेत्र की जरूरतों के आधार पर नहीं लिए जाते। जल उपलब्धता, निर्धारित हिस्सेदारी और संबंधित व्यवस्थाओं के आधार पर पानी के प्रवाह का प्रबंधन किया जाता है।

फिलहाल किसानों की सबसे बड़ी उम्मीद कैचमेंट क्षेत्रों में अच्छी बारिश से जुड़ी है। यदि कोडगु और कावेरी बेसिन के ऊपरी हिस्सों में बारिश बढ़ती है तो काबिनी और KRS में पानी की आवक बढ़ सकती है। इससे सिंचाई और पेयजल दोनों जरूरतों के लिए स्थिति बेहतर होने की संभावना रहेगी।

लेकिन बारिश कमजोर रहने पर आने वाले दिनों में जल प्रबंधन और कठिन हो सकता है। अधिकारियों की ओर से मौजूदा पानी को मुख्य रूप से पेयजल आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त बताए जाने से कृषि क्षेत्र की चिंता बढ़ गई है।

अब सभी की नजर बारिश और जलाशयों में आने वाले पानी पर है। मैसूर क्षेत्र के धान किसानों के लिए अगले कुछ दिन महत्वपूर्ण हो सकते हैं। यदि जलस्तर में सुधार नहीं हुआ तो सिंचाई को लेकर दबाव और बढ़ सकता है। काबिनी और KRS की स्थिति आने वाले समय में क्षेत्र की कृषि और पेयजल व्यवस्था दोनों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगी।

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