
मैसूर। कर्नाटक के मैसूर जिले के एच.डी. कोटे तालुक में स्थित काबिनी जलाशय से तमिलनाडु के लिए बड़ी मात्रा में पानी छोड़े जाने के बाद जलस्तर में करीब 9 फीट की गिरावट दर्ज की गई है। जलाशय में पानी की आवक कम होने के बावजूद बहाव बढ़ाकर करीब 14,000 क्यूसेक किए जाने से आसपास के किसानों की चिंता बढ़ गई है। किसानों को आशंका है कि यदि आवक में सुधार नहीं हुआ और जलाशय से इसी तरह पानी छोड़ा जाता रहा, तो आने वाले दिनों में सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी पर दबाव बढ़ सकता है।
काबिनी जलाशय कर्नाटक के प्रमुख जल संसाधन परियोजनाओं में शामिल है और इसका जलस्तर कर्नाटक के साथ-साथ तमिलनाडु के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। काबिनी नदी कावेरी नदी तंत्र का हिस्सा है और जलाशय से छोड़ा गया पानी आगे कावेरी प्रणाली में शामिल होता है। इसलिए जलाशय के संचालन और पानी की निकासी पर दोनों राज्यों की नजर रहती है।
अगस्त की शुरुआत में लगभग भर गया था जलाशय
अगस्त के पहले सप्ताह में काबिनी जलग्रहण क्षेत्र में अच्छी बारिश हुई थी। खासकर केरल के वायनाड जिले में लगातार बारिश के कारण काबिनी बेसिन में पानी की आवक तेजी से बढ़ी। भारी आवक के चलते जलाशय का जलस्तर अधिकतम भंडारण क्षमता के करीब पहुंच गया था।
लगातार बारिश और बढ़ती आवक के बीच जलाशय में पर्याप्त मात्रा में पानी जमा हो गया था। उस समय जल संसाधन विभाग के सामने जलाशय की सुरक्षा और अतिरिक्त पानी को नियंत्रित तरीके से नीचे की ओर छोड़ने की चुनौती थी। हालांकि, अब बारिश की तीव्रता कम होने के साथ जलाशय में पानी की आवक भी घट गई है।
आवक घटकर 7,184 क्यूसेक हुई
शुक्रवार को काबिनी जलाशय में पानी की आवक घटकर करीब 7,184 क्यूसेक रह गई। इसके विपरीत जलाशय से नदी में लगभग 14,600 क्यूसेक पानी छोड़ा गया। यानी जलाशय में आने वाले पानी की तुलना में लगभग दोगुना पानी बाहर छोड़ा जा रहा है।
आवक और बहाव के बीच इस अंतर का सीधा असर जलाशय के जलस्तर पर पड़ा है। कुछ ही समय में जलाशय का जलस्तर करीब 9 फीट नीचे आ गया है। किसानों और स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि बारिश नहीं हुई तो लगातार अधिक मात्रा में पानी छोड़े जाने से जलाशय के भंडार पर दबाव बढ़ सकता है।
किसानों में बढ़ी चिंता
एच.डी. कोटे और आसपास के क्षेत्रों में खेती के लिए काबिनी जलाशय महत्वपूर्ण जल स्रोत है। जलाशय से पानी छोड़े जाने और जलस्तर में तेज गिरावट के कारण किसानों की चिंता बढ़ गई है। किसान चाहते हैं कि पानी की निकासी और उपलब्ध जल भंडार के बीच संतुलन बनाए रखा जाए, ताकि आने वाले समय में सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध रहे।
किसानों का कहना है कि बारिश की स्थिति हमेशा एक जैसी नहीं रहती। अगस्त की शुरुआत में जहां भारी बारिश के कारण जलाशय लगभग भर गया था, वहीं अब आवक तेजी से कम हुई है। ऐसे में भविष्य की बारिश का अनुमान लगाए बिना बड़े पैमाने पर पानी छोड़ना जोखिमपूर्ण हो सकता है।
हालांकि, जलाशय से पानी छोड़ने का फैसला केवल स्थानीय जरूरतों से जुड़ा नहीं है। काबिनी कावेरी नदी प्रणाली का हिस्सा होने के कारण कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच पानी के बंटवारे के व्यापक संदर्भ में भी इसकी भूमिका महत्वपूर्ण है।
कावेरी जल प्रबंधन से जुड़ा मामला
काबिनी जलाशय से पानी छोड़े जाने का असर कावेरी जल प्रबंधन पर भी पड़ता है। कर्नाटक से निकलने वाली कावेरी की प्रमुख सहायक नदियों में काबिनी महत्वपूर्ण है। जलाशय से छोड़ा गया पानी आगे कावेरी में पहुंचता है और तमिलनाडु की ओर बहता है।
इसी कारण काबिनी सहित कावेरी बेसिन के प्रमुख जलाशयों की स्थिति पर दोनों राज्यों की नजर रहती है। जलाशयों में पानी की आवक, भंडारण और निकासी को लेकर हर बदलाव जल प्रबंधन की रणनीति को प्रभावित करता है।
वर्तमान स्थिति में एक ओर जलाशय से बड़ी मात्रा में पानी छोड़ा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर वायनाड और काबिनी बेसिन में बारिश कम होने के कारण आवक घट रही है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो जलाशय के संचालन को लेकर अधिकारियों के सामने संतुलन बनाने की चुनौती बढ़ सकती है।
बारिश पर टिकी आगे की स्थिति
काबिनी जलाशय की मौजूदा स्थिति काफी हद तक आने वाले दिनों में होने वाली बारिश पर निर्भर करेगी। यदि काबिनी के जलग्रहण क्षेत्र और वायनाड में फिर से अच्छी बारिश होती है तो पानी की आवक बढ़ सकती है और जलाशय में गिरते जलस्तर पर कुछ हद तक रोक लग सकती है। लेकिन यदि बारिश कमजोर रहती है और पानी का बहाव ऊंचा बना रहता है, तो जलस्तर में और गिरावट संभव है।
जल संसाधन विभाग को अब जलाशय की स्थिति पर लगातार नजर रखनी होगी। खासकर आवक और बहाव के बीच बढ़ते अंतर को देखते हुए जल निकासी की मात्रा में बदलाव करना पड़ सकता है।
जल प्रबंधन में संतुलन जरूरी
मौजूदा हालात ने एक बार फिर काबिनी जलाशय के बहुआयामी महत्व को सामने ला दिया है। एक तरफ जलाशय में भारी बारिश के समय अतिरिक्त पानी को नियंत्रित करना जरूरी होता है, तो दूसरी तरफ बारिश कम होने पर उपलब्ध जल भंडार को सावधानी से इस्तेमाल करना पड़ता है। इसके अलावा कावेरी जल प्रणाली और तमिलनाडु की पानी की जरूरतें भी जल प्रबंधन के फैसलों को प्रभावित करती हैं।
अगस्त की शुरुआत में लगभग भर चुके काबिनी जलाशय का जलस्तर अब करीब 9 फीट नीचे आ जाना मौसम और जल प्रबंधन की बदलती परिस्थितियों को दर्शाता है। 7,184 क्यूसेक की आवक के मुकाबले करीब 14,600 क्यूसेक पानी छोड़े जाने से फिलहाल किसानों की चिंता स्वाभाविक है।
अब सभी की नजर आने वाले दिनों की बारिश और जलाशय में पानी की आवक पर टिकी है। यदि बारिश फिर तेज होती है तो स्थिति में सुधार संभव है, लेकिन मौजूदा कम आवक के बीच लगातार अधिक बहाव जारी रहा तो किसानों और जल प्रबंधकों दोनों के लिए चुनौती बढ़ सकती है।





