
बेंगलुरु। महर्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम से जुड़े करोड़ों रुपये के कथित घोटाले में कर्नाटक के मंत्री बी. नागेंद्र की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। खबरों के मुताबिक, केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने नागेंद्र से पूछताछ और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की अनुमति लेने के लिए कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत को पत्र लिखा है। हालांकि, इस संबंध में आधिकारिक तौर पर विस्तृत जानकारी सामने आना बाकी है।
सूत्रों के अनुसार, CBI ने करीब एक सप्ताह पहले राज्यपाल को पत्र भेजकर मामले से संबंधित जानकारी साझा की और मंत्री के खिलाफ आगे की कार्रवाई के लिए आवश्यक मंजूरी मांगी। बताया जा रहा है कि केंद्रीय एजेंसी ने मामले में नागेंद्र से पूछताछ करने के साथ-साथ उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करने की अनुमति का अनुरोध किया है।
सूत्रों का कहना है कि राज्यपाल ने मामले को गंभीरता से लेते हुए इस पर कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञों से राय मांगी है। राज्यपाल कार्यालय की ओर से विशेषज्ञों की राय मिलने के बाद आगे का निर्णय लिए जाने की संभावना है। हालांकि, इस मामले में राज्यपाल कब तक फैसला लेंगे, इसकी कोई आधिकारिक समयसीमा सामने नहीं आई है।
महर्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम से जुड़ा कथित घोटाला पिछले वर्ष कर्नाटक की राजनीति में बड़ा मुद्दा बनकर सामने आया था। निगम के बैंक खातों से कथित तौर पर बड़ी रकम के अनधिकृत लेनदेन और धन के दूसरे खातों में ट्रांसफर किए जाने के आरोप लगे थे। मामले की जांच आगे बढ़ने के साथ इसमें कई अधिकारियों और अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच की गई।
घोटाले को लेकर विपक्ष ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार पर लगातार हमला बोला था। विपक्षी दलों ने सरकार से जिम्मेदारी तय करने और मामले में शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की थी। मामले के राजनीतिक रूप से संवेदनशील होने के कारण जांच की प्रगति पर भी लगातार नजर बनी रही।
CBI द्वारा अब मंत्री बी. नागेंद्र के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति मांगे जाने की खबर ने इस मामले को एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। यदि राज्यपाल की ओर से अनुमति मिलती है, तो केंद्रीय जांच एजेंसी मंत्री से पूछताछ सहित आगे की कानूनी कार्रवाई कर सकती है। हालांकि, किसी भी व्यक्ति के खिलाफ आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही हो सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम में राज्यपाल की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। संविधान और संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत किसी मौजूदा मंत्री के खिलाफ अभियोजन या कानूनी कार्रवाई से जुड़े मामलों में आवश्यक प्रक्रिया का पालन करना होता है। इसी वजह से CBI के पत्र के बाद राज्यपाल द्वारा कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञों की राय लिए जाने की बात कही जा रही है।
राज्यपाल थावरचंद गहलोत पहले भी कर्नाटक के एक हाई-प्रोफाइल मामले में ऐसी ही भूमिका निभा चुके हैं। अगस्त 2024 में उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के खिलाफ कथित MUDA घोटाले के मामले में मुकदमा चलाने की अनुमति दी थी। इस फैसले के बाद मामला अदालत तक पहुंचा और बाद में कर्नाटक हाई कोर्ट ने राज्यपाल की अनुमति को बरकरार रखा था।
MUDA मामले में राज्यपाल के फैसले ने कर्नाटक की राजनीति में व्यापक बहस छेड़ दी थी। सरकार और विपक्ष के बीच इस मुद्दे को लेकर तीखी राजनीतिक बयानबाजी हुई थी। अब महर्षि वाल्मीकि निगम मामले में भी राज्यपाल के समक्ष कार्रवाई की अनुमति का मुद्दा पहुंचने से एक बार फिर संवैधानिक अधिकारों और राज्यपाल की भूमिका को लेकर चर्चा तेज हो सकती है।
CBI की ओर से कथित तौर पर भेजे गए पत्र में किन धाराओं के तहत कार्रवाई की मांग की गई है और एजेंसी के पास मंत्री के खिलाफ क्या सामग्री है, इसकी विस्तृत जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं हुई है। जांच एजेंसी की ओर से भी इस मामले पर आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। ऐसे में फिलहाल पूरा घटनाक्रम सूत्रों से मिली जानकारी पर आधारित है।
यदि राज्यपाल अनुमति देते हैं, तो CBI के लिए मंत्री से पूछताछ और मामले में उनकी कथित भूमिका की जांच का रास्ता खुल सकता है। जांच एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश कर सकती है कि निगम में कथित वित्तीय अनियमितताओं की जानकारी किस स्तर पर थी और धन के कथित दुरुपयोग में किन लोगों की भूमिका रही।
मामले में यह भी महत्वपूर्ण होगा कि जांच के दौरान सामने आए दस्तावेज, बैंक लेनदेन और अन्य सबूत किस दिशा में इशारा करते हैं। किसी भी कार्रवाई से पहले जांच एजेंसी को कानूनी प्रक्रिया के तहत उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करना होगा।
राजनीतिक स्तर पर भी CBI के इस कदम को अहम माना जा रहा है। विपक्षी दल सरकार पर पहले से ही भ्रष्टाचार के आरोप लगाते रहे हैं। वहीं, सत्तारूढ़ कांग्रेस के लिए यह घटनाक्रम राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर चुनौती पैदा कर सकता है।
फिलहाल राज्यपाल द्वारा मांगी गई कानूनी और संवैधानिक राय पर सबकी नजर है। उनके निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगा कि CBI को बी. नागेंद्र से पूछताछ और उनके खिलाफ आगे कानूनी कार्रवाई की अनुमति मिलती है या नहीं। तब तक मामले में लगाए गए आरोप जांच के दायरे में हैं और अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।





