
मंगलुरु। कर्नाटक के तटीय जिले दक्षिण कन्नड़ में सांप्रदायिक सद्भाव और सांस्कृतिक एकता की एक अनूठी मिसाल देखने को मिली है। मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने वाली 33 वर्षीय कलाकार अर्शिया खान ने मंगलुरु के ऐतिहासिक कादरी श्री मंजुनाथ स्वामी मंदिर में आयोजित यक्षगान महोत्सव के मंच पर देवी के रूप में शानदार प्रस्तुति दी। अर्शिया खान, जिन्हें कला जगत में 'तनु विटला' के नाम से जाना जाता है, ने अष्टभुजा श्रीदेवी का किरदार निभाकर दर्शकों का दिल जीत लिया। उनकी इस प्रस्तुति ने दिखाया कि कला और संस्कृति धार्मिक सीमाओं से ऊपर उठकर लोगों को एकजुट करने की क्षमता रखती हैं।
20 अक्टूबर को मंदिर परिसर में आयोजित 'संपूर्ण श्रीदेवी महात्मे' यक्षगान प्रस्तुति में अर्शिया खान देवी के रूप में मंच पर उतरीं। पारंपरिक वेशभूषा, आकर्षक श्रृंगार और भावपूर्ण अभिनय के जरिए उन्होंने देवी के स्वरूप को जीवंत कर दिया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में मौजूद दर्शकों और कला प्रेमियों ने उनकी प्रस्तुति की सराहना की।
मुस्लिम महिला ने निभाया अष्टभुजा देवी का किरदार
अर्शिया खान दक्षिण कन्नड़ जिले के बंतवाल तालुक में स्थित विटला के पास माडा गांव की रहने वाली हैं। यक्षगान में वह तनु विटला के नाम से पहचानी जाती हैं।
अर्शिया ने 'देवी महात्मे' प्रसंग में अष्टभुजा श्रीदेवी का रूप धारण किया। इस किरदार में देवी को आठ भुजाओं के साथ बुराई का विनाश करने वाली शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
मंच पर उनकी प्रस्तुति के दौरान दर्शकों ने उनकी अभिनय क्षमता, भाव-भंगिमा और पारंपरिक कला के प्रति समर्पण की प्रशंसा की।
एक मुस्लिम महिला कलाकार द्वारा हिंदू धार्मिक कथा में देवी की भूमिका निभाना सांस्कृतिक समन्वय का विशेष उदाहरण बन गया है।
नौ साल की उम्र में शुरू हुआ कला का सफर
अर्शिया खान का यक्षगान से जुड़ाव बचपन से ही रहा है। उन्होंने महज नौ साल की उम्र में इस पारंपरिक कला को सीखना शुरू कर दिया था।
जब वह चौथी कक्षा में पढ़ती थीं, तब अपने आसपास आयोजित यक्षगान कार्यक्रमों को देखकर उनके मन में इस कला के प्रति रुचि पैदा हुई।
धीरे-धीरे यह रुचि उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई। उन्होंने पारंपरिक अभिनय, नृत्य, संवाद अदायगी और पात्रों की प्रस्तुति का प्रशिक्षण लेना शुरू किया।
मंगलुरु के प्रसिद्ध यक्षगान गुरु कादरी रमेश भट्ट के मार्गदर्शन में अर्शिया ने अपनी प्रतिभा को निखारा। पिछले लगभग 12 वर्षों से वह विभिन्न मंचीय प्रस्तुतियों में सक्रिय रही हैं।
उनकी इस यात्रा में परिवार का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
माता-पिता ने दिया पूरा सहयोग
अर्शिया खान के पिता अब्दुल खादर सेवानिवृत्त उप तहसीलदार हैं, जबकि उनकी मां मुमताज गृहिणी हैं।
अर्शिया के अनुसार, जब उन्होंने यक्षगान सीखने की इच्छा जताई तो परिवार ने उनका हौसला बढ़ाया। अलग धार्मिक पृष्ठभूमि होने के बावजूद माता-पिता ने उनकी कला के प्रति रुचि का सम्मान किया।
परिवार से मिले समर्थन ने उन्हें पारंपरिक रंगमंच पर आगे बढ़ने का आत्मविश्वास दिया।
अर्शिया ने अपने अभिनय से यह संदेश देने का प्रयास किया है कि कला किसी एक समुदाय की सीमाओं में बंधी नहीं होती। कलाकार की प्रतिभा, मेहनत और समर्पण ही उसकी पहचान बनाते हैं।
देवी की भूमिका के लिए रखा विशेष व्रत
अष्टभुजा श्रीदेवी की भूमिका निभाने के लिए अर्शिया खान ने विशेष तैयारियां की थीं। धार्मिक चरित्र की गरिमा और मंचीय परंपराओं का सम्मान करते हुए उन्होंने निर्धारित व्रत का पालन किया।
प्रस्तुति से पहले उन्होंने शुद्ध शाकाहारी भोजन अपनाया और अनुशासित दिनचर्या का पालन किया।
अर्शिया ने बताया कि देवी की भूमिका निभाने का अवसर उनके लिए विशेष महत्व रखता है। वह उल्लाल्थी दुर्गापरमेश्वरी के आशीर्वाद के रूप में इस अवसर को देखती हैं।
उन्होंने कला प्रेमियों से मिले स्नेह और प्रोत्साहन के लिए आभार भी व्यक्त किया।
दस दिवसीय यक्षगान महोत्सव का हुआ समापन
कादली कला केंद्र की ओर से कादरी श्री मंजुनाथ स्वामी मंदिर के राजांगण में दशहरा के अवसर पर दस दिवसीय यक्षगान महोत्सव का आयोजन किया गया था।
'कादली दशाहा' नामक इस महोत्सव का यह 14वां वर्ष था। कार्यक्रम 11 अक्टूबर से शुरू होकर 20 अक्टूबर तक चला।
समापन समारोह में 'संपूर्ण श्रीदेवी महात्मे' का विशेष मंचन किया गया। इसी प्रस्तुति में अर्शिया खान ने अष्टभुजा श्रीदेवी की भूमिका निभाई।
कार्यक्रम में कटील और पावंजे सहित प्रसिद्ध यक्षगान मंडलियों के कलाकारों ने भाग लिया। विभिन्न पात्रों के माध्यम से देवी की कथा को पारंपरिक शैली में प्रस्तुत किया गया।
इसके अलावा अन्य कलाकारों ने भी विशेष भूमिकाएं निभाईं, जिससे कार्यक्रम का सांस्कृतिक महत्व और बढ़ गया।
पहले राक्षसों की भूमिकाएं निभाकर बनाई पहचान
अर्शिया खान यक्षगान की दुनिया में पहले से पहचाना जाने वाला नाम हैं। वह कई पौराणिक पात्रों का सफलतापूर्वक अभिनय कर चुकी हैं।
उन्होंने महिषासुर, शुंभ, निशुंभ और अन्य पौराणिक पात्रों की भूमिकाएं निभाई हैं। विशेष रूप से राक्षसी पात्रों के पारंपरिक 'बन्नदा वेशा' यानी रंगीन वेशभूषा वाले अभिनय में उनकी रुचि रही है।
2025 में यक्षध्रुव पटला फाउंडेशन ट्रस्ट द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में अर्शिया को यक्षगान के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए सम्मानित भी किया गया था।
धार्मिक एकता का संदेश दे रही अर्शिया की प्रस्तुति
तटीय कर्नाटक की सांस्कृतिक पहचान में यक्षगान का विशेष स्थान है। यह पारंपरिक रंगमंच नृत्य, संगीत, अभिनय और पौराणिक कथाओं का अनूठा संगम है।
यक्षगान में कलाकार आकर्षक वेशभूषा और संवादों के माध्यम से धार्मिक तथा पौराणिक कथाओं का मंचन करते हैं।
इस कला ने लंबे समय से अलग-अलग सामाजिक और धार्मिक पृष्ठभूमि के लोगों को जोड़ने का काम किया है।
अर्शिया खान की प्रस्तुति इसी समृद्ध परंपरा का उदाहरण बनकर सामने आई है। उन्होंने अपनी धार्मिक पहचान से अलग कला के प्रति समर्पण को प्राथमिकता दी और दर्शकों का सम्मान प्राप्त किया।
दर्शकों ने की कलाकार की जमकर सराहना
कादरी मंदिर में अर्शिया खान के अभिनय को दर्शकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली। बड़ी संख्या में उपस्थित यक्षगान प्रेमियों ने उनके आत्मविश्वास और अभिनय कौशल की प्रशंसा की।
उनकी प्रस्तुति ने धार्मिक सद्भाव, पारस्परिक सम्मान और सांस्कृतिक विविधता का संदेश दिया।
कर्नाटक के तटीय क्षेत्र में सामने आई यह घटना बताती है कि कला का मंच विभिन्न समुदायों के बीच संवाद और आपसी विश्वास बढ़ाने का माध्यम बन सकता है।
अर्शिया खान की कहानी उन कलाकारों के लिए भी प्रेरणादायक है, जो सामाजिक और धार्मिक सीमाओं से आगे बढ़कर अपनी प्रतिभा के बल पर पहचान बनाना चाहते हैं।
मंगलुरु के कादरी मंदिर में देवी के रूप में अर्शिया खान की प्रस्तुति ने यह संदेश दिया है कि धर्म अलग हो सकते हैं, लेकिन कला, संस्कृति और मानवीय सम्मान लोगों को एक साथ जोड़ सकते हैं।





