
बेंगलुरु। कर्नाटक सरकार ने पर्यावरण संरक्षण और जलस्रोतों के पुनर्जीवन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। बेंगलुरु दक्षिण जिले के चन्नापटना तालुक में स्थित दो प्रमुख झीलों के संरक्षण और विकास के लिए राज्य सरकार ने कुल छह करोड़ रुपये की अनुदान राशि मंजूर की है। इसके तहत रामम्मा झील और संतेमोगेनाहल्ली झील के लिए तीन-तीन करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। दोनों झीलें लंबे समय से प्रदूषण, अतिक्रमण और प्रशासनिक उपेक्षा जैसी समस्याओं से जूझ रही हैं। सरकार के इस फैसले से स्थानीय निवासियों और किसानों को राहत मिलने की उम्मीद है।
जानकारी के अनुसार, दोनों झीलों के संरक्षण के लिए यह राशि उपलोकायुक्त न्यायमूर्ति केएन फणींद्र के निर्देशों के आधार पर मंजूर की गई है। न्यायमूर्ति फणींद्र ने क्षेत्र की झीलों की खराब स्थिति को गंभीरता से लेते हुए संबंधित अधिकारियों को आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए थे। इसके बाद प्रशासन ने झीलों के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए कार्रवाई तेज की।
चन्नापटना तालुक की रामम्मा झील लंबे समय से गंभीर प्रदूषण की समस्या का सामना कर रही है। चन्नापटना शहर से निकलने वाला सीवेज यानी गंदा पानी इस झील में पहुंचने के कारण इसकी जल गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसके अलावा झील के आसपास बड़े पैमाने पर अतिक्रमण भी सामने आया है। इन समस्याओं के चलते झील की प्राकृतिक स्थिति और जल संरक्षण की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
स्थानीय स्तर पर झीलों की खराब स्थिति को लेकर पहले भी चिंता जताई जा चुकी है। प्रदूषित जलस्रोत आसपास के पर्यावरण और स्थानीय लोगों के लिए परेशानी का कारण बन सकते हैं। यदि झीलों में लगातार बिना उपचारित गंदा पानी पहुंचता रहे तो उनके पुनर्जीवन के प्रयास भी प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे में केवल सफाई ही नहीं, बल्कि प्रदूषण के मूल स्रोतों को नियंत्रित करना भी आवश्यक होगा।
वहीं, संतेमोगेनाहल्ली झील की स्थिति भी चिंताजनक बताई गई है। लंबे समय से उपेक्षित रहने के कारण यह झील सूख चुकी है। झील के भीतर पेड़ और अन्य वनस्पतियां उग आई हैं। इसके अलावा झील के एक हिस्से पर अतिक्रमण होने की जानकारी भी सामने आई है।
इस झील से जुड़ी एक अन्य समस्या जंगली हाथियों की आवाजाही है। रिपोर्टों के अनुसार, सूखी झील के क्षेत्र में हाथी ठहरते रहे हैं और आसपास के खेतों में पहुंचकर फसलों को नुकसान पहुंचाते रहे हैं। इससे स्थानीय किसानों को परेशानी का सामना करना पड़ा है। झील के संरक्षण के साथ इस समस्या के समाधान की आवश्यकता भी महसूस की जा रही है।
दरअसल, चन्नापटना क्षेत्र की झीलों की स्थिति को लेकर मई 2025 में एक समाचार रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। इसमें कई झीलों के प्रदूषण और अतिक्रमण की समस्या को उजागर किया गया था। इस रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए उपलोकायुक्त न्यायमूर्ति केएन फणींद्र ने स्वतः संज्ञान का मामला दर्ज किया था।
इसके बाद न्यायमूर्ति फणींद्र ने संबंधित स्थानीय निकायों के अधिकारियों के साथ झीलों का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान प्रदूषण और अतिक्रमण से जुड़ी समस्याओं का जायजा लिया गया। उपलोकायुक्त ने अधिकारियों को तलब कर झीलों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने को कहा।
जानकारी के मुताबिक, संबंधित अधिकारियों के साथ दो बार बैठक की गई। नौ सितंबर 2026 को हुई बैठक के बाद झीलों के संरक्षण के लिए निर्देश जारी किए गए। इन निर्देशों के आधार पर राज्य सरकार ने अब दोनों झीलों के लिए तीन-तीन करोड़ रुपये की राशि मंजूर की है।
झीलों के पुनर्जीवन से क्षेत्र में जल संरक्षण की व्यवस्था मजबूत होने की उम्मीद है। सामान्य तौर पर झीलें वर्षा जल को एकत्र करने, भूजल पुनर्भरण और स्थानीय पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यदि इन जलस्रोतों का सही तरीके से संरक्षण किया जाए तो आसपास के इलाकों को दीर्घकालिक पर्यावरणीय लाभ मिल सकते हैं।
हालांकि, इन दोनों झीलों में प्रस्तावित कार्यों की विस्तृत परियोजना सूची अभी स्पष्ट नहीं है। संरक्षण कार्यों में गंदे पानी की आवक रोकने, जलस्रोतों की सफाई, सीमांकन और अतिक्रमण की समस्या का समाधान करने जैसे कदम महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इन कार्यों का वास्तविक स्वरूप संबंधित विभाग की स्वीकृत कार्ययोजना से निर्धारित होगा।
चन्नापटना क्षेत्र में झीलों के संरक्षण को लेकर यह पहली पहल नहीं है। हाल ही में लघु सिंचाई एवं भूजल विकास विभाग ने चन्नापटना तालुक की कुडलूर झील के संरक्षण के लिए भी 3.8 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की है। यह मंजूरी 29 अक्टूबर को दी गई थी। कुडलूर झील भी प्रदूषण और अतिक्रमण की समस्या से प्रभावित है।
कुडलूर झील का निरीक्षण भी उपलोकायुक्त न्यायमूर्ति फणींद्र ने किया था। इसके बाद संबंधित प्रशासनिक विभागों को संरक्षण के लिए आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए। इस तरह चन्नापटना की तीन महत्वपूर्ण झीलों के संरक्षण के लिए हालिया मंजूरियों की कुल राशि 9.8 करोड़ रुपये हो गई है।
इसके अतिरिक्त चन्नापटना शहर में भूमिगत जल निकासी व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए राज्य सरकार ने 128 करोड़ रुपये की परियोजना को भी मंजूरी दी है। सितंबर 2026 में जिला प्रशासन ने उपलोकायुक्त को इसकी जानकारी दी थी। इस परियोजना का उद्देश्य शहर की सीवेज व्यवस्था को बेहतर बनाना है, जिससे झीलों में गंदे पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
चन्नापटना तालुक में झीलों पर अतिक्रमण की समस्या व्यापक बताई गई है। सितंबर में सामने आई जानकारी के अनुसार, तालुक की कुल 413 झीलों में से 207 झीलों पर अतिक्रमण हटाने का काम लंबित था। यह आंकड़ा दर्शाता है कि क्षेत्र में जलस्रोतों के संरक्षण के लिए बड़े स्तर पर प्रशासनिक कार्रवाई की आवश्यकता है।
पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से झीलों का महत्व केवल पानी एकत्र करने तक सीमित नहीं है। ये जलस्रोत पक्षियों, जलीय जीवों और आसपास की वनस्पतियों के लिए भी महत्वपूर्ण होते हैं। इनके पुनर्जीवन से स्थानीय जैव विविधता को बढ़ावा मिल सकता है।
स्थानीय किसानों के लिए भी इस परियोजना का विशेष महत्व है। जलस्रोतों की स्थिति में सुधार से आसपास के क्षेत्रों की पर्यावरणीय परिस्थितियां बेहतर हो सकती हैं। हालांकि, संतेमोगेनाहल्ली झील के आसपास हाथियों की आवाजाही रोकने के लिए वन विभाग को अलग से उचित उपाय करने होंगे।
फिलहाल राज्य सरकार की ओर से राशि स्वीकृत होने के बाद संबंधित विभागों की जिम्मेदारी बढ़ गई है। अब यह सुनिश्चित करना होगा कि मंजूर धनराशि का सही उपयोग हो और संरक्षण कार्य समयबद्ध तरीके से पूरे किए जाएं।
कुल मिलाकर, रामम्मा और संतेमोगेनाहल्ली झीलों के लिए छह करोड़ रुपये की मंजूरी चन्नापटना क्षेत्र में जल संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यदि योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन होता है तो लंबे समय से प्रदूषण और अतिक्रमण से जूझ रही इन झीलों को नया जीवन मिल सकता है।





