
बेंगलुरु। कर्नाटक के समुद्र तटों को स्वच्छ, सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में राज्य सरकार ने महत्वपूर्ण पहल की है। राज्य के दो लोकप्रिय समुद्र तटों, मंगलुरु के ससिहितलु बीच और कारवार के रवींद्रनाथ टैगोर बीच को वर्ष 2026 में प्रतिष्ठित 'ब्लू फ्लैग' प्रमाणन मिलने की संभावना जताई जा रही है। इसके लिए सरकार K-SHORE परियोजना के तहत समुद्र तटों की साफ-सफाई, समुद्री प्रदूषण की रोकथाम और जलीय जीवों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दे रही है। हालांकि, दोनों समुद्र तटों को अभी यह प्रमाणन नहीं मिला है और इसके लिए आवश्यक प्रक्रिया पूरी की जानी बाकी है।
राज्य के वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, इस वर्ष कुछ प्रमुख समुद्र तटों को ब्लू फ्लैग श्रेणी में शामिल कराने के लिए विस्तृत प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। प्रस्ताव को पहले राज्य मंत्रिमंडल के समक्ष रखा जाएगा। मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलने के बाद इसे केंद्र सरकार के पास आगे की स्वीकृति के लिए भेजा जाएगा। प्रस्ताव में ससिहितलु और टैगोर बीच को विशेष प्राथमिकता दी गई है।
K-SHORE परियोजना का उद्देश्य कर्नाटक के तटीय क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण के साथ आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है। विश्व बैंक के परियोजना दस्तावेजों में इसका नाम 'कर्नाटक—स्ट्रेंथनिंग कोस्टल रेजिलिएंस एंड द इकोनॉमी' दर्ज है। इसके अंतर्गत तटीय समुदायों को जलवायु परिवर्तन और समुद्री कटाव जैसी चुनौतियों से निपटने में सक्षम बनाने, प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करने तथा आजीविका के अवसर बढ़ाने पर जोर दिया गया है।
परियोजना को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए एक विशेष प्रयोजन इकाई यानी स्पेशल पर्पस व्हीकल (SPV) गठित किया गया है। यह इकाई समुद्र तटों की सफाई के अलावा समुद्र में जमा होने वाले मछली पकड़ने के पुराने और बेकार उपकरणों के निपटान पर भी काम करेगी।
समुद्री प्रदूषण में प्लास्टिक और स्टायरोफोम के बाद परित्यक्त, खोए हुए या फेंके गए मछली पकड़ने के उपकरण एक गंभीर समस्या बनकर सामने आए हैं। इन्हें अंग्रेजी में 'एबैंडन्ड, लॉस्ट एंड डिस्कार्डेड फिशिंग गियर' (ALDFG) कहा जाता है।
इस श्रेणी में समुद्र में छूट जाने वाले मछली पकड़ने के जाल, रस्सियां और अन्य उपकरण शामिल होते हैं। ऐसे सामान लंबे समय तक समुद्र में पड़े रहते हैं और समुद्री जीवों के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। कई बार मछलियां, कछुए और अन्य जलीय जीव पुराने जालों में उलझ जाते हैं। इससे उनके घायल होने या मरने का जोखिम बढ़ जाता है।
K-SHORE के अंतर्गत इस समस्या के समाधान के लिए कचरा संग्रहण और निपटान की व्यवस्था विकसित करने की योजना है। अधिकारियों के अनुसार, समुद्री कचरे के उचित प्रबंधन से जलीय जीवन की सुरक्षा के साथ मछुआरा समुदाय को अतिरिक्त आय के अवसर भी मिल सकते हैं।
वन विभाग से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि मछुआरे सप्ताह में लगभग तीन बार समुद्र में जाकर लौटते समय औसतन 10 किलोग्राम तक पुराने या फेंके गए मछली पकड़ने के उपकरण साथ लाते हैं। लेकिन इनके उचित निपटान की सुविधाएं सीमित होने के कारण कई बार यह कचरा फिर समुद्र में फेंक दिया जाता है या समुद्र तट पर जमा हो जाता है।
इस समस्या से निपटने के लिए ऐसी व्यवस्था तैयार की जा रही है, जिसमें समुद्र से कचरा एकत्र कर निर्धारित केंद्रों पर जमा कराने वाले मछुआरों को प्रोत्साहन दिया जा सके। इससे समुद्र की सफाई को नियमित गतिविधि बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
अधिकारियों के मुताबिक, देश में फिलहाल ऐसे मछली पकड़ने के उपकरणों के प्रसंस्करण से जुड़े तीन प्रमुख केंद्र गुजरात, तमिलनाडु और केरल में हैं। कर्नाटक में भी इस तरह के कचरे का बेहतर प्रबंधन करने के लिए विभिन्न विभागों और स्थानीय निकायों के बीच समन्वय बढ़ाने पर काम किया जा रहा है।
K-SHORE परियोजना के तहत वन, मत्स्य पालन, ग्रामीण विकास और पंचायती राज विभाग मिलकर काम कर रहे हैं। इसके अलावा समुद्र तटीय शहरों, कस्बों और गांवों के स्थानीय निकायों को भी कचरा प्रबंधन की व्यवस्था से जोड़ने की योजना है।
सरकार का उद्देश्य समुद्र तटों पर कचरे के जमाव को रोकना, प्लास्टिक प्रदूषण घटाना और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से स्वच्छता व्यवस्था को मजबूत करना है।
ब्लू फ्लैग प्रमाणन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समुद्र तटों की गुणवत्ता का एक महत्वपूर्ण मानक माना जाता है। इसे फाउंडेशन फॉर एनवायरनमेंटल एजुकेशन (FEE) के कार्यक्रम के तहत प्रदान किया जाता है। इसके लिए समुद्र तटों को जल की गुणवत्ता, पर्यावरण प्रबंधन, स्वच्छता, सुरक्षा, पर्यावरण शिक्षा और पर्यटकों के लिए उपलब्ध सुविधाओं से जुड़े निर्धारित मानदंड पूरे करने होते हैं।
कर्नाटक के लिए यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य पहले से ब्लू फ्लैग प्रमाणित समुद्र तटों की सूची में शामिल है। उडुपी जिले का पदुबिद्री बीच और उत्तर कन्नड़ जिले में होन्नावर के पास स्थित कासरकोड इको बीच इस सम्मान को प्राप्त कर चुके हैं। अब सरकार अन्य समुद्र तटों को भी इसी स्तर तक विकसित करना चाहती है।
मंगलुरु का ससिहितलु बीच अपनी प्राकृतिक सुंदरता और सर्फिंग गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध है। कर्नाटक पर्यटन विभाग के अनुसार, यह क्षेत्र शांभवी और नंदिनी नदियों के अरब सागर से मिलने वाले स्थान के निकट स्थित है। यहां की समुद्री लहरें इसे सर्फिंग के शौकीनों के लिए आकर्षक बनाती हैं।
दूसरी ओर, कारवार का रवींद्रनाथ टैगोर बीच उत्तर कन्नड़ जिले के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल है। यदि दोनों समुद्र तट ब्लू फ्लैग मानकों पर खरे उतरते हैं, तो इससे राज्य में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार पर्यटन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
इससे पहले जनवरी 2026 में कर्नाटक पर्यटन विभाग ने राज्य के 11 समुद्र तटों को ब्लू फ्लैग मानकों के अनुरूप विकसित करने की संभावनाओं पर विचार किया था। इनमें दक्षिण कन्नड़, उडुपी और उत्तर कन्नड़ जिलों के कई समुद्र तट शामिल थे। अधिकारियों ने उस समय इनके विकास के लिए लगभग 142.06 करोड़ रुपये के संभावित खर्च का अनुमान बताया था।
राज्य सरकार की मौजूदा पहल केवल पर्यटन सुविधाएं बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसका एक महत्वपूर्ण उद्देश्य समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखना और तटीय समुदायों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करना भी है।
मछुआरों को कचरा संग्रहण से जोड़ने की योजना सफल होती है तो इससे समुद्र में फेंके जाने वाले पुराने जालों और प्लास्टिक की मात्रा कम हो सकती है। साथ ही स्थानीय स्तर पर कचरा संग्रहण, छंटाई और प्रसंस्करण से रोजगार के अवसर भी विकसित हो सकते हैं।
फिलहाल, ससिहितलु और टैगोर बीच के लिए प्रस्ताव तैयार करने की प्रक्रिया जारी है। राज्य मंत्रिमंडल और आगे की आवश्यक मंजूरियों के बाद ही प्रमाणन की दिशा में अगला कदम बढ़ाया जा सकेगा। ऐसे में दोनों समुद्र तटों को इसी वर्ष ब्लू फ्लैग दर्जा मिलने की उम्मीद जरूर है, लेकिन अंतिम निर्णय निर्धारित मानकों और प्रमाणन प्रक्रिया के पूरा होने पर निर्भर करेगा।





