
बेंगलुरु : 24 वर्षीय एथलीट यशस पलक्ष की कहानी संघर्ष, मेहनत और जुनून की मिसाल बन गई है। आर्थिक तंगी, सीमित संसाधनों और कई गंभीर चोटों के बावजूद यशस ने अपने सपने को नहीं छोड़ा और आज वह भारत के सबसे तेज सक्रिय 400 मीटर हर्डल्स धावकों में शामिल हैं। दिहाड़ी मजदूरों के परिवार से आने वाले यशस अब ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का प्रतिनिधित्व करने जा रहे हैं।
यशस का सफर आसान नहीं रहा। बचपन से ही उन्होंने आर्थिक कठिनाइयों का सामना किया। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे महंगे खेल संसाधन या प्रशिक्षण का खर्च उठा सकें। इसके बावजूद खेलों के प्रति उनका जुनून लगातार बढ़ता गया। उन्होंने अपनी मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर वह मुकाम हासिल किया, जहां पहुंचना कई लोगों के लिए सिर्फ एक सपना होता है।
अपनी एथलेटिक्स यात्रा के बारे में बात करते हुए यशस ने बताया कि खेल हमेशा से उनका सपना रहा है। उन्होंने कहा कि उनके परिवार में पढ़ाई को लेकर काफी उम्मीदें थीं और सभी लोग डिग्री हासिल करने की राह पर आगे बढ़ रहे थे। लेकिन उन्हें महसूस हुआ कि उनका असली जुनून खेलों में है।
यशस ने कहा, "हमारा परिवार डिग्री हासिल करने की राह पर था। लेकिन मुझे पता था कि यह मेरे लिए सही रास्ता नहीं है। मेरे पास बिजनेस शुरू करने या क्रिकेट किट खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। लेकिन खेलों में मेरी बहुत दिलचस्पी थी। मैं बिना ज्यादा पैसे खर्च किए ग्लोबल लेवल पर कुछ हासिल करने का तरीका ढूंढ रहा था, और एथलेटिक्स मेरे सामने आया।"
एथलेटिक्स को चुनना उनके लिए केवल खेल का फैसला नहीं था, बल्कि सीमित संसाधनों के बीच अपने सपने को पूरा करने का रास्ता भी था। उन्होंने दौड़ को अपना माध्यम बनाया और धीरे-धीरे अपनी प्रतिभा को निखारना शुरू किया।
400 मीटर हर्डल्स जैसी कठिन स्पर्धा में सफलता हासिल करना आसान नहीं होता। इसमें गति के साथ-साथ तकनीक, संतुलन और मानसिक मजबूती की भी जरूरत होती है। यशस ने लगातार अभ्यास और अनुशासन के दम पर इस स्पर्धा में अपनी पहचान बनाई।
हालांकि, उनके सफर में कई बाधाएं भी आईं। उन्हें गंभीर चोटों का सामना करना पड़ा, जिसने उनके करियर को कई बार मुश्किल स्थिति में डाल दिया। चोट के कारण मैदान से दूर रहना किसी भी खिलाड़ी के लिए चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन यशस ने हार नहीं मानी। उन्होंने हर बार वापसी की और अपनी फिटनेस तथा प्रदर्शन को बेहतर बनाया।
उनका मानना है कि कठिन परिस्थितियां खिलाड़ी को मजबूत बनाती हैं। संघर्षों ने उन्हें धैर्य रखना सिखाया और हर चुनौती का सामना करने की क्षमता दी। यही वजह है कि वह आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए तैयार हैं।
यशस की सफलता उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जिनके पास बड़े सपने तो हैं लेकिन संसाधनों की कमी है। उनकी कहानी बताती है कि सफलता केवल सुविधाओं पर निर्भर नहीं करती, बल्कि मेहनत, लगन और लगातार प्रयास से भी हासिल की जा सकती है।
कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे बड़े मंच पर देश का प्रतिनिधित्व करना यशस के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। यह उनके वर्षों के संघर्ष और मेहनत का परिणाम है। उन्होंने न केवल अपने परिवार और शहर का नाम रोशन किया है, बल्कि उन सभी खिलाड़ियों को उम्मीद दी है जो सीमित साधनों के बावजूद अपने सपनों का पीछा कर रहे हैं।
एथलेटिक्स में भारत की पहचान लगातार मजबूत हो रही है और यशस जैसे खिलाड़ी इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उनकी सफलता यह दिखाती है कि प्रतिभा किसी खास वर्ग या सुविधा की मोहताज नहीं होती।
यशस अब कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में अपने प्रदर्शन से देश को गौरवान्वित करने की तैयारी कर रहे हैं। उनका लक्ष्य केवल प्रतियोगिता में हिस्सा लेना नहीं, बल्कि अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के साथ भारत के लिए पदक जीतने का है।
दिहाड़ी मजदूर परिवार से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने वाले यशस पलक्ष की यात्रा संघर्षों से भरी जरूर रही, लेकिन उनकी कहानी यह साबित करती है कि मजबूत इरादों और लगातार मेहनत के सामने मुश्किलें ज्यादा देर तक टिक नहीं सकतीं।





