
धारवाड़। कर्नाटक में गन्ने का लाभकारी मूल्य निर्धारित करने और किसानों की विभिन्न लंबित मांगों को पूरा करने की मांग को लेकर आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा है। कर्नाटक राज्य रैथा संघ और हसीरु सेना के नेतृत्व में निकाली जा रही विशाल किसान पदयात्रा रविवार, 18 अक्टूबर को धारवाड़ जिले में प्रवेश कर गई। बड़ी संख्या में किसान इस आंदोलन में शामिल हैं और सरकार से गन्ने की कीमतों को लेकर ठोस निर्णय लेने की मांग कर रहे हैं। शनिवार को कित्तूर में मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के साथ किसान नेताओं की बातचीत के बाद आंदोलन समाप्त होने की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन बैठक में कोई अंतिम समाधान नहीं निकलने के कारण किसानों ने पदयात्रा जारी रखने का फैसला किया।
रविवार को आंदोलन के पांचवें दिन किसान धारवाड़ के पास गुलेदकोप्पा पहुंचे। किसान संगठनों का कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर स्पष्ट और ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
पांचवें दिन धारवाड़ जिले में पहुंची पदयात्रा
कर्नाटक राज्य रैथा संघ और हसीरु सेना द्वारा आयोजित पदयात्रा में गन्ना उत्पादक किसान बड़ी संख्या में भाग ले रहे हैं। आंदोलन का मुख्य उद्देश्य गन्ने के लिए लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करना और किसानों की आर्थिक समस्याओं की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करना है।
रविवार को पदयात्रा धारवाड़ जिले के गुलेदकोप्पा पहुंची। आंदोलनकारी किसानों ने अपनी मांगों के समर्थन में प्रदर्शन जारी रखा।
किसान संगठनों का कहना है कि खेती की बढ़ती लागत के मुकाबले उन्हें अपनी उपज का पर्याप्त मूल्य नहीं मिल रहा है। ऐसे में गन्ने का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करना आवश्यक है।
मुख्यमंत्री से बातचीत के बाद भी नहीं बनी सहमति
शनिवार, 17 अक्टूबर को मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने बेलगावी जिले के कित्तूर में आंदोलनकारी किसानों से मुलाकात की थी।
मुख्यमंत्री ने किसान नेताओं से आंदोलन समाप्त करने की अपील करते हुए उनकी समस्याओं का समाधान निकालने का आश्वासन दिया।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार गन्ना उत्पादकों, चीनी मिल मालिकों और संबंधित अधिकारियों के साथ बैठक करेगी। इसके अलावा किसानों की मांगों को केंद्र सरकार के समक्ष भी उठाया जाएगा।
हालांकि, किसान नेताओं ने केवल आश्वासन के आधार पर आंदोलन समाप्त करने से इनकार कर दिया। उनका कहना है कि गन्ने की कीमतों पर स्पष्ट निर्णय होने तक संघर्ष जारी रहेगा।
गन्ने के लाभकारी मूल्य की प्रमुख मांग
आंदोलनकारी किसान गन्ने की कीमतों में बढ़ोतरी की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि खेती में इस्तेमाल होने वाले उर्वरक, मजदूरी, सिंचाई, परिवहन और अन्य आवश्यक संसाधनों की लागत लगातार बढ़ रही है।
ऐसी परिस्थितियों में गन्ने का मौजूदा मूल्य किसानों की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
किसान संगठनों ने वर्ष 2026-27 के पेराई सत्र के लिए गन्ने की कीमत 5,500 रुपये प्रति टन निर्धारित करने की मांग भी उठाई है।
इसके अलावा चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य को बढ़ाने और पिछले पेराई सत्र के लिए अतिरिक्त भुगतान जैसी मांगें भी आंदोलन का हिस्सा हैं।
केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी से भी आश्वासन चाहते किसान
किसान नेताओं ने केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी से भी अपनी मांगों पर स्पष्ट आश्वासन देने की मांग की है।
शनिवार को मुख्यमंत्री के साथ हुई बातचीत के दौरान किसानों ने कहा था कि केंद्र सरकार को भी गन्ना उत्पादकों की समस्याओं के समाधान में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
किसानों ने केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी को कित्तूर आने और उनकी मांगों पर बातचीत करने का आग्रह किया था।
किसान संगठनों का मानना है कि गन्ना और चीनी के मूल्य से जुड़े कई महत्वपूर्ण निर्णय केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। इसलिए केवल राज्य सरकार की पहल से सभी समस्याओं का समाधान संभव नहीं है।
हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद नई रणनीति
इस बीच केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी के आवास के सामने प्रदर्शन करने की किसान संगठनों की योजना को लेकर अदालत का अंतरिम आदेश सामने आया है।
उच्च न्यायालय ने किसानों को केंद्रीय मंत्री के आवास के सामने विरोध प्रदर्शन करने से रोकने वाला अंतरिम आदेश दिया है।
इस आदेश के बाद किसान नेताओं ने बैठक कर आंदोलन की आगे की रणनीति पर चर्चा की।
बैठक में सरकार की प्रतिक्रिया, किसानों की मांगों और विरोध प्रदर्शन को आगे बढ़ाने के संभावित तरीकों पर विचार किया गया।
फिलहाल आंदोलनकारी संगठनों की ओर से अगली रणनीति को लेकर चर्चा जारी है।
चीनी के न्यूनतम मूल्य में बढ़ोतरी की मांग
गन्ना उत्पादकों की प्रमुख मांगों में चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य बढ़ाने का मुद्दा भी शामिल है।
किसान संगठनों का तर्क है कि चीनी का उचित मूल्य निर्धारित होने से मिलों की भुगतान क्षमता बेहतर हो सकती है और किसानों को गन्ने का अधिक लाभकारी मूल्य मिलने का रास्ता खुल सकता है।
आंदोलनकारी किसानों ने चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य 60 रुपये प्रति किलो करने की मांग उठाई है।
उनका कहना है कि बढ़ती महंगाई और उत्पादन लागत को देखते हुए मूल्य निर्धारण प्रणाली की समीक्षा जरूरी है।
हालांकि, चीनी की कीमतों में किसी भी बदलाव का असर उपभोक्ताओं, चीनी उद्योग और बाजार पर भी पड़ सकता है। इसलिए इस विषय पर केंद्र और राज्य सरकारों के साथ उद्योग प्रतिनिधियों की बातचीत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
सरकार ने दिया बातचीत से समाधान निकालने का भरोसा
मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने किसानों को भरोसा दिलाया है कि राज्य सरकार उनकी समस्याओं के समाधान के लिए प्रयास करेगी।
उन्होंने कहा कि गन्ना किसानों की समस्याएं केवल कर्नाटक तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दूसरे राज्यों के किसान भी इसी तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
मुख्यमंत्री ने दशहरा के बाद बेलगावी स्थित सुवर्ण विधान सौध में किसान नेताओं, चीनी मिल मालिकों और संबंधित अधिकारियों के साथ बैठक आयोजित करने का आश्वासन दिया है।
उन्होंने किसानों से बातचीत के जरिए समाधान निकालने के लिए आंदोलन स्थगित करने की अपील की थी।
किसानों ने आंदोलन जारी रखने का लिया फैसला
मुख्यमंत्री से मिले आश्वासन के बावजूद किसान संगठनों ने पदयात्रा समाप्त नहीं की है।
किसान नेताओं का कहना है कि पहले भी उनकी समस्याओं के समाधान को लेकर कई बार बातचीत हुई है, लेकिन मूल्य निर्धारण और अन्य मांगों पर संतोषजनक निर्णय नहीं हो पाया।
इसी कारण किसान इस बार केवल आश्वासन के बजाय ठोस निर्णय चाहते हैं।
आंदोलनकारियों ने साफ किया है कि गन्ने के लाभकारी मूल्य और अन्य मांगों को लेकर उनका संघर्ष जारी रहेगा।
सरकार और किसानों के बीच गतिरोध बरकरार
कर्नाटक में गन्ना किसानों का आंदोलन अब सरकार के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती बन गया है।
एक ओर किसान अपनी उपज के लिए अधिक लाभकारी मूल्य की मांग कर रहे हैं, वहीं सरकार बातचीत के जरिए समाधान निकालने का प्रयास कर रही है।
रविवार को धारवाड़ जिले में पदयात्रा के प्रवेश के बाद यह स्पष्ट हो गया कि फिलहाल किसान संगठन आंदोलन वापस लेने के लिए तैयार नहीं हैं।
अब सबकी नजर केंद्र सरकार, राज्य सरकार और चीनी मिल मालिकों के बीच होने वाली संभावित बातचीत पर टिकी है। आने वाले दिनों में होने वाली बैठकों से यह तय होगा कि किसानों की मांगों पर सहमति बनती है या आंदोलन और आगे बढ़ता है।





