कर्नाटक
पेट्रोल में 31% इथेनॉल कर्नाटक सरकार के खुलासे से मचा हड़कंप
Ratna Netam
6 Nov 2026 5:06 PM IST

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बेंगलुरु। कर्नाटक में पेट्रोल की गुणवत्ता और उसमें इथेनॉल की मात्रा को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। राज्य के खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री रिजवान अरशद ने शुक्रवार (6 नवंबर 2026) को दावा किया कि राज्य के विभिन्न पेट्रोल पंपों से लिए गए नमूनों में निर्धारित सीमा से अधिक इथेनॉल पाया गया है। उन्होंने कहा कि पेट्रोल में अत्यधिक इथेनॉल मिश्रण से वाहनों की कार्यक्षमता प्रभावित होने और तकनीकी खराबी आने की आशंका है। मंत्री ने इस मामले में केंद्र सरकार और तेल विपणन कंपनियों से स्पष्टीकरण मांगा है।रिपोर्ट के मुताबिक, कर्नाटक सरकार ने पेट्रोल की गुणवत्ता की जांच के लिए सात जिलों से कुल 63 नमूने एकत्र किए थे। इनमें बेंगलुरु, बेंगलुरु ग्रामीण, कोलार, चिक्कबल्लापुर, रामनगर, मंगलुरु और तुमकुरु के पेट्रोल पंप शामिल हैं। नमूनों को परीक्षण के लिए प्रमाणित प्रयोगशाला भेजा गया। मंत्री का कहना है कि राज्य सरकार ने पहले तेल विपणन कंपनियों से पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा की जानकारी मांगी थी, लेकिन संतोषजनक जवाब नहीं मिलने के बाद स्वतंत्र जांच कराने का फैसला लिया गया।
जांच के शुरुआती नतीजों ने राज्य सरकार की चिंता बढ़ा दी है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, परीक्षण किए गए 14 नमूनों में से 11 में इथेनॉल की मात्रा 20 प्रतिशत से अधिक पाई गई। एक नमूने में यह मात्रा 31.2 प्रतिशत तक दर्ज की गई। रिपोर्ट में बताया गया कि यह नमूना इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के एक पेट्रोल पंप से लिया गया था। हालांकि, इन निष्कर्षों के आधार पर राज्य के सभी पेट्रोल पंपों पर इसी तरह की स्थिति होने का दावा नहीं किया जा सकतामंत्री रिजवान अरशद ने कहा कि भारत में वर्तमान में ई-20 पेट्रोल के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है। ई-20 का अर्थ ऐसा पेट्रोल है, जिसमें 20 प्रतिशत इथेनॉल और शेष हिस्सा पेट्रोल होता है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब निर्धारित मिश्रण 20 प्रतिशत है, तो कुछ नमूनों में इससे कहीं अधिक इथेनॉल कैसे पाया गया।अरशद ने आशंका जताई कि निर्धारित मानक से अधिक इथेनॉल मिश्रण का असर विशेष रूप से उन वाहनों पर पड़ सकता है, जिन्हें अधिक इथेनॉल वाले ईंधन के लिए डिजाइन नहीं किया गया है। ऐसे वाहनों में ईंधन प्रणाली के कुछ हिस्सों की अनुकूलता, माइलेज और रखरखाव से जुड़ी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ई-20 पेट्रोल और निर्धारित सीमा से अधिक इथेनॉल मिले पेट्रोल का मामला अलग-अलग है। केंद्र सरकार का कहना है कि ई-20 ईंधन को वाहन निर्माताओं तथा तकनीकी संस्थानों के परीक्षण और निर्धारित मानकों के आधार पर लागू किया गया है। इसलिए सभी वाहनों में ई-20 से नुकसान होने का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगाइथेनॉल एक प्रकार का अल्कोहल आधारित जैव ईंधन है, जिसे मुख्य रूप से कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। भारत सरकार पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की नीति को कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने, किसानों की आय बढ़ाने और पर्यावरण संबंधी लक्ष्यों को हासिल करने के महत्वपूर्ण उपाय के रूप में देखती है।देश में इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम कई वर्षों से चल रहा है। केंद्र सरकार ने चरणबद्ध तरीके से पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा बढ़ाई है। सरकारी जानकारी के अनुसार, अप्रैल 2026 से नए बीएस-6 वाहनों के लिए ई-20 से संबंधित उत्सर्जन मानकों का पालन आवश्यक किया गया है। इसके साथ ही ईंधन की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए निर्धारित तकनीकी मानक भी लागू हैं।
इस बीच कर्नाटक सरकार ने वाहन मालिकों के आर्थिक नुकसान का मुद्दा भी उठाया है। मंत्री ने कहा कि यदि किसी वाहन में निर्धारित सीमा से अधिक इथेनॉल वाले ईंधन के कारण खराबी आती है, तो उसकी मरम्मत का खर्च उपभोक्ता पर नहीं डाला जाना चाहिए।उन्होंने ईंधन से होने वाले संभावित नुकसान की भरपाई के लिए विशेष मुआवजा व्यवस्था बनाने की मांग भी की है। साथ ही पेट्रोल पंपों पर इथेनॉल मिश्रण का प्रतिशत स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करने का सुझाव दिया, ताकि ग्राहकों को खरीदारी के समय ईंधन की सही जानकारी मिल सके।इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू वाहनों का माइलेज भी है। इथेनॉल में सामान्य पेट्रोल की तुलना में ऊर्जा की मात्रा कम होती है। इसलिए ईंधन मिश्रण बदलने से कुछ वाहनों की ईंधन दक्षता प्रभावित हो सकती है। हालांकि, माइलेज में वास्तविक अंतर वाहन के मॉडल, इंजन की तकनीक, उसकी स्थिति और ड्राइविंग परिस्थितियों पर निर्भर करता है।नीति आयोग की पूर्व रिपोर्ट में भी अलग-अलग श्रेणियों के वाहनों पर ई-20 के संभावित प्रभावों का आकलन किया गया था। दूसरी ओर, केंद्र सरकार का कहना है कि उसे ई-20 पेट्रोल के कारण व्यापक स्तर पर गंभीर वाहन खराबी की पुष्ट शिकायतें प्राप्त नहीं हुई हैं।
कर्नाटक सरकार की ओर से सामने आए परीक्षण परिणामों ने ईंधन की आपूर्ति और गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए हैं। आमतौर पर पेट्रोल में इथेनॉल का मिश्रण तेल विपणन कंपनियों की निर्धारित सुविधाओं पर किया जाता है। इसके बाद तैयार ईंधन पेट्रोल पंपों तक पहुंचाया जाता है। ऐसे में यदि मिश्रण निर्धारित सीमा से अधिक है, तो यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि अंतर किस स्तर पर पैदा हुआ।विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी ईंधन नीति की सफलता के लिए केवल पर्यावरण और आर्थिक लाभ पर्याप्त नहीं हैं। उपभोक्ताओं को सही जानकारी, गुणवत्ता की नियमित निगरानी और वाहनों की तकनीकी अनुकूलता भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।फिलहाल कर्नाटक सरकार के दावों पर केंद्र सरकार और संबंधित तेल कंपनियों का विस्तृत जवाब महत्वपूर्ण होगा। यह भी देखना होगा कि क्या नमूनों की दोबारा जांच कराई जाती है और निर्धारित सीमा से अधिक इथेनॉल मिलने के कारणों की पड़ताल होती है।इस पूरे विवाद ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है कि स्वच्छ ईंधन की दिशा में बढ़ते भारत में उपभोक्ताओं के हितों और वाहनों की सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। यदि कर्नाटक सरकार के परीक्षण परिणाम आगे की जांच में सही साबित होते हैं, तो पेट्रोल की गुणवत्ता की निगरानी और उपभोक्ता संरक्षण व्यवस्था को लेकर अतिरिक्त कदम उठाने की जरूरत पड़ सकती है।
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