कर्नाटक

कन्नड़ गाना गाओ, मुफ्त पौधा पाओ! मैसूर में अनोखा अभियान

Kavita2
12 Oct 2026 12:17 PM IST
कन्नड़ गाना गाओ, मुफ्त पौधा पाओ! मैसूर में अनोखा अभियान
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मैसूर। कर्नाटक के सांस्कृतिक शहर मैसूर में आयोजित दशहरा पुस्तक मेले में एक अनोखी पहल लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही है। यहां पर्यावरण संरक्षण और कन्नड़ भाषा के प्रति प्रेम बढ़ाने के लिए एक विशेष अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान की खास बात यह है कि लोगों को मुफ्त में पौधे दिए जा रहे हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें कन्नड़ भाषा में कोई गीत गाना या कविता सुनानी होती है। इस अनोखे प्रयास का उद्देश्य लोगों को पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरूक करने के साथ ही कन्नड़ भाषा और साहित्य से जोड़ना है।

इस पहल की शुरुआत बेंगलुरु महानगर परिवहन निगम (BMTC) में कार्यरत एक मैकेनिक ने की है। उन्होंने पर्यावरण की रक्षा और कन्नड़ भाषा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यह अभियान शुरू किया है। पुस्तक मेले में आने वाले लोग कन्नड़ गीत गाकर या कविता सुनाकर मुफ्त पौधे प्राप्त कर सकते हैं। इस तरह भाषा, साहित्य और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

कन्नड़ गीत और कविता सुनाने पर मिल रहे मुफ्त पौधे

मैसूर के दशहरा पुस्तक मेले में चल रहे इस अभियान की सबसे खास बात इसका सरल और रचनात्मक तरीका है। यहां पौधा प्राप्त करने के लिए लोगों को किसी प्रकार का शुल्क नहीं देना पड़ता। उन्हें केवल कन्नड़ भाषा में एक गीत गाना या कविता सुनानी होती है। इसके बदले उन्हें एक पौधा मुफ्त दिया जाता है, जिसे वे अपने घर ले जा सकते हैं।

यह पहल लोगों को अपनी मातृभाषा के प्रति लगाव दिखाने और पर्यावरण संरक्षण में भागीदारी करने का अवसर प्रदान कर रही है। आमतौर पर पुस्तक मेलों में साहित्य, लेखकों और किताबों से जुड़े कार्यक्रम आयोजित होते हैं, लेकिन इस अभियान में साहित्यिक अभिव्यक्ति को पौधारोपण से जोड़ा गया है।

कन्नड़ भाषा में गीत गाने या कविता सुनाने की शर्त लोगों को भाषा के प्रति अपनी रुचि व्यक्त करने का अवसर देती है। वहीं मुफ्त पौधा मिलने से पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी उनके घर तक पहुंचता है।

BMTC के मैकेनिक ने शुरू किया अनोखा अभियान

इस अभियान के पीछे BMTC में काम करने वाले एक मैकेनिक की सोच है। उन्होंने अपनी नियमित नौकरी के साथ पर्यावरण संरक्षण और कन्नड़ भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए यह प्रयास शुरू किया है।

उनका उद्देश्य केवल पौधे वितरित करना नहीं, बल्कि लोगों को यह समझाना भी है कि प्रकृति की रक्षा और अपनी भाषा का संरक्षण दोनों महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं।

इस अभियान के माध्यम से वह लोगों को कन्नड़ भाषा में अपनी अभिव्यक्ति प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। साथ ही पौधे देकर उन्हें पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

यह पहल इस बात का उदाहरण है कि सामाजिक और सांस्कृतिक जागरूकता बढ़ाने के लिए बड़े संसाधनों की आवश्यकता हमेशा नहीं होती। एक व्यक्ति अपनी सोच और प्रयास से भी लोगों को सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ सकता है।

पर्यावरण संरक्षण के साथ भाषा को बढ़ावा देने का प्रयास

इस अभियान में दो महत्वपूर्ण उद्देश्यों को एक साथ जोड़ा गया है। पहला उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना है, जबकि दूसरा कन्नड़ भाषा और साहित्य के प्रति लोगों का लगाव मजबूत करना है।

पौधे पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पेड़-पौधे वायु की गुणवत्ता बेहतर बनाने, जैव विविधता को सहारा देने और हरियाली बढ़ाने में योगदान करते हैं। ऐसे में लोगों को पौधे वितरित करना पर्यावरण जागरूकता बढ़ाने का एक उपयोगी माध्यम बन सकता है।

वहीं कन्नड़ भाषा में गीत और कविता सुनाने की गतिविधि स्थानीय साहित्यिक परंपराओं से जुड़ने का अवसर देती है। कन्नड़ भाषा का समृद्ध साहित्यिक इतिहास रहा है और गीत-कविताएं इसकी सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

इस तरह अभियान में शामिल व्यक्ति न केवल पौधा प्राप्त करता है, बल्कि अपनी भाषा के प्रति प्रेम भी व्यक्त करता है।

दशहरा पुस्तक मेले में आकर्षण बना अभियान

मैसूर का दशहरा उत्सव अपनी सांस्कृतिक परंपराओं और विभिन्न आयोजनों के लिए प्रसिद्ध है। इसी उत्सवी माहौल में आयोजित पुस्तक मेले में यह अभियान एक अलग पहचान बना रहा है।

पुस्तक मेले का मुख्य उद्देश्य लोगों को किताबों, साहित्य और ज्ञान से जोड़ना होता है। ऐसे आयोजन भाषा और संस्कृति के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इस बार पुस्तक मेले में पर्यावरण संरक्षण को कन्नड़ भाषा के साथ जोड़ने की पहल विशेष रूप से ध्यान आकर्षित कर रही है। यहां आने वाले लोगों के लिए गीत और कविता के माध्यम से पौधा प्राप्त करना एक अलग अनुभव है।

इस गतिविधि से पुस्तक मेले का दायरा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसमें प्रकृति और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश भी शामिल हो जाता है।

कन्नड़ भाषा के संरक्षण का संदेश

किसी भी क्षेत्र की भाषा उसकी संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार होती है। कन्नड़ भाषा कर्नाटक की सांस्कृतिक विरासत का प्रमुख हिस्सा है।

ऐसे में कन्नड़ गीत गाने और कविता सुनाने के माध्यम से लोगों को प्रोत्साहित करना भाषा के प्रति रुचि बढ़ाने का रचनात्मक तरीका है।

इस अभियान में भाषा को किसी औपचारिक प्रतियोगिता के बजाय एक सरल गतिविधि के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लोग अपनी पसंद का कन्नड़ गीत या कविता सुनाकर इसमें भाग ले सकते हैं।

इसका उद्देश्य भाषा के उपयोग को प्रोत्साहित करना और लोगों को अपनी साहित्यिक परंपराओं से जुड़े रहने का संदेश देना है।

एक पौधे के जरिए दो महत्वपूर्ण संदेश

मैसूर के दशहरा पुस्तक मेले में शुरू हुआ यह अभियान पर्यावरण संरक्षण और भाषाई जागरूकता का अनोखा संगम प्रस्तुत कर रहा है। एक ओर लोगों को मुफ्त पौधे देकर हरियाली बढ़ाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर कन्नड़ गीत और कविता के माध्यम से स्थानीय भाषा को प्रोत्साहन मिल रहा है।

BMTC के एक मैकेनिक की यह पहल बताती है कि छोटे और रचनात्मक प्रयासों के जरिए भी महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश दिए जा सकते हैं।

हालांकि, अभियान में अब तक कितने पौधे वितरित किए गए हैं और कितने लोगों ने भाग लिया है, इसकी आधिकारिक संख्या उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद यह अनोखी पहल पुस्तक मेले में चर्चा का विषय बनी हुई है।

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