कर्नाटक

सिद्धारमैया बोले- देश में अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति, एक और स्वतंत्रता संग्राम की जरूरत

Kavita2
12 Oct 2026 11:28 AM IST
सिद्धारमैया बोले- देश में अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति, एक और स्वतंत्रता संग्राम की जरूरत
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बेंगलुरु। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों पर चिंता जताते हुए कहा कि आज भारत में अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति बन गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में तानाशाही और भ्रष्टाचार का माहौल है तथा संवैधानिक संस्थाओं को कठपुतली बना दिया गया है। उन्होंने वोट के अधिकार से जुड़े मुद्दों पर भी चिंता जताई और कहा कि ऐसी परिस्थितियों में चुपचाप बैठना उचित नहीं है।

सिद्धारमैया ने ये बातें गांधी भवन में आयोजित जयप्रकाश नारायण जयंती और जेपी पुरस्कार वितरण कार्यक्रम के दौरान कहीं। इस कार्यक्रम का आयोजन भारत यात्रा केंद्र और लोकनायक जेपी विचार वेदिका की ओर से किया गया था। अपने संबोधन में उन्होंने लोकतंत्र, संवैधानिक संस्थाओं और नागरिकों के अधिकारों से जुड़े मुद्दे उठाए। उन्होंने पूर्व सांसद वी.एस. उग्रप्पा की उस टिप्पणी का भी समर्थन किया, जिसमें मौजूदा परिस्थितियों के संदर्भ में एक और स्वतंत्रता संग्राम की जरूरत बताई गई थी।

देश में अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति: सिद्धारमैया

पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा कि देश में मौजूदा परिस्थितियां चिंता पैदा करने वाली हैं। उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि आज देश में अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति दिखाई दे रही है। उनके अनुसार, लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और नागरिकों के अधिकारों का सम्मान बेहद जरूरी है।

उन्होंने आरोप लगाया कि देश में तानाशाही और भ्रष्टाचार का माहौल है। सिद्धारमैया ने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं को कठपुतली बना दिया गया है और वोट छीने जा रहे हैं। उन्होंने इन मुद्दों को लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर बताते हुए लोगों से स्थिति पर ध्यान देने की अपील की।

हालांकि, ये आरोप सिद्धारमैया ने अपने राजनीतिक संबोधन में लगाए हैं। कार्यक्रम के दौरान इन आरोपों के समर्थन में विस्तृत उदाहरण या संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया का विवरण उपलब्ध नहीं है।

संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर उठाए सवाल

सिद्धारमैया ने अपने संबोधन में संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर विशेष जोर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि संस्थाओं को स्वतंत्र रूप से काम करने के बजाय कठपुतली की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। उनके अनुसार, लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए संस्थाओं की निष्पक्षता और स्वतंत्रता आवश्यक है।

उन्होंने वोट के अधिकार को लेकर भी चिंता जताई। उनके बयान में चुनावी प्रक्रिया और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े सवाल प्रमुख रहे। सिद्धारमैया ने कहा कि ऐसी स्थिति में समाज और राजनीतिक नेतृत्व हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकते।

उन्होंने अपने संबोधन के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए नागरिकों और राजनीतिक संगठनों को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। उनके विचार में संवैधानिक संस्थाओं और मताधिकार से जुड़े मुद्दों पर चुप्पी साधना उचित नहीं है।

एक और स्वतंत्रता संग्राम की जरूरत का समर्थन

कार्यक्रम के दौरान सिद्धारमैया ने पूर्व सांसद वी.एस. उग्रप्पा की टिप्पणी का उल्लेख किया। उग्रप्पा ने मौजूदा परिस्थितियों के संदर्भ में एक और स्वतंत्रता संग्राम की जरूरत बताई थी। सिद्धारमैया ने इस विचार को सही ठहराते हुए कहा कि देश में जो स्थिति बनी हुई है, उसे देखते हुए चुपचाप बैठना उचित नहीं होगा।

उनके बयान में स्वतंत्रता संग्राम का उल्लेख लोकतांत्रिक अधिकारों और संस्थाओं की रक्षा के लिए संघर्ष के संदर्भ में आया। उन्होंने मौजूदा हालात पर चिंता जताते हुए कहा कि लोगों को अपने अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति सजग रहना चाहिए।

हालांकि, उनके संबोधन में इस कथित स्वतंत्रता संग्राम के स्वरूप, उसके तरीकों या किसी विशेष कार्यक्रम की विस्तृत रूपरेखा का उल्लेख नहीं किया गया। उन्होंने मुख्य रूप से लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े सवालों पर सक्रियता की जरूरत पर जोर दिया।

जयप्रकाश नारायण के विचारों को किया याद

गांधी भवन में आयोजित कार्यक्रम जयप्रकाश नारायण की जयंती और जेपी पुरस्कार वितरण के अवसर पर रखा गया था। भारत यात्रा केंद्र और लोकनायक जेपी विचार वेदिका की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में सिद्धारमैया ने अपने विचार रखे।

जयप्रकाश नारायण भारतीय राजनीति में लोकतंत्र और जनभागीदारी से जुड़े आंदोलनों के लिए जाने जाते हैं। उनकी जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में लोकतंत्र, संवैधानिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों जैसे विषयों पर चर्चा हुई।

सिद्धारमैया ने अपने संबोधन में देश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को लेकर चिंता व्यक्त की। उन्होंने तानाशाही और भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता तथा वोट के अधिकार से जुड़े सवाल उठाए।

लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों पर बहस तेज

सिद्धारमैया के बयान ने देश की राजनीतिक परिस्थितियों, संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका और मताधिकार से जुड़े मुद्दों पर बहस को फिर सामने ला दिया है। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में हाथ पर हाथ धरे बैठना सही नहीं है और लोकतंत्र की रक्षा के लिए सक्रियता जरूरी है।

उनके संबोधन का मुख्य संदेश यही रहा कि लोकतांत्रिक मूल्यों, संवैधानिक संस्थाओं और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए। उन्होंने पूर्व सांसद वी.एस. उग्रप्पा की टिप्पणी का समर्थन करते हुए एक और स्वतंत्रता संग्राम की जरूरत बताई।

फिलहाल सिद्धारमैया के बयान में लगाए गए आरोप राजनीतिक प्रतिक्रिया का हिस्सा हैं। इन पर केंद्र सरकार या संबंधित संस्थाओं की प्रतिक्रिया की जानकारी उपलब्ध नहीं है।

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