
बेंगलुरु: पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सिद्धारमैया ने कर्नाटक हाई कोर्ट के उस फ़ैसले को ऐतिहासिक रूप से पिछड़े समुदायों की उम्मीदों के लिए "बड़ा झटका" बताया है, जिसमें अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों के लिए आरक्षण बढ़ाने वाले कानून को रद्द कर दिया गया था।
सोमवार को जारी एक प्रेस बयान में, सिद्धारमैया ने इस मुद्दे पर बीजेपी सरकार के रवैये पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि SC के लिए आरक्षण कोटा 15% से बढ़ाकर 17% और ST के लिए 3% से बढ़ाकर 7% करने का फ़ैसला 2023 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले लिया गया था, जबकि प्रशासन को यह पता था कि कुल आरक्षण 50% की सीमा से ज़्यादा हो जाएगा।
सिद्धारमैया ने कहा, "हम न्यायपालिका का सम्मान करते हैं। हालाँकि, यह फ़ैसला सामाजिक न्याय के मामले में बीजेपी के रवैये पर बुनियादी सवाल खड़े करता है। बीजेपी सरकार ने 2023 के विधानसभा चुनावों से पहले SC आरक्षण को 15% से बढ़ाकर 17% और ST आरक्षण को 3% से बढ़ाकर 7% कर दिया, जबकि उन्हें पता था कि कुल आरक्षण 50% की सीमा से ज़्यादा हो जाएगा।"
उन्होंने पूछा, "बीजेपी ने आरक्षण बढ़ाने की घोषणा करने से पहले इसकी संवैधानिक वैधता सुनिश्चित क्यों नहीं की? क्या स्थायी सामाजिक न्याय के बजाय चुनावी फ़ायदे को प्राथमिकता दी गई?"
पूर्व मुख्यमंत्री ने ज़ोर देकर कहा कि आरक्षण बढ़ाने की मांग पिछड़े समुदायों के "दशकों के संघर्ष" का नतीजा थी। उन्होंने बताया कि इस कदम की नींव जस्टिस नागमोन दास समिति ने रखी थी, जिसका गठन 2018 में कांग्रेस-JD(S) गठबंधन सरकार के दौरान किया गया था।
सिद्धारमैया ने आरक्षण कोटा बढ़ाने के कर्नाटक के अनुरोध को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने में देरी करने के लिए बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर भी निशाना साधा।
उन्होंने कहा, "केंद्र सरकार को अब यह बताना चाहिए कि वह क्या संवैधानिक समाधान प्रस्तावित करती है।"
अहिंदा (अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और दलितों के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द) के कल्याण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए, सिद्धारमैया ने ज़ोर दिया कि "आरक्षण कोई खैरात नहीं है", बल्कि "ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का एक संवैधानिक साधन" है। बयान में कहा गया, "हम मांग करते हैं कि केंद्र सरकार 50 प्रतिशत की सीमा की समीक्षा करे, आबादी के आधार पर आरक्षण के लिए संवैधानिक रूप से मान्य व्यवस्था बनाए और कर्नाटक के नौवीं अनुसूची वाले प्रस्ताव पर फिर से विचार करे।"
मौजूदा राज्य सरकार से छात्रों और नौकरी के उम्मीदवारों के हितों की रक्षा के लिए सभी ज़रूरी कानूनी कदम उठाने का आग्रह करते हुए, सिद्धारमैया ने चेतावनी दी कि सामाजिक न्याय की लड़ाई को सिर्फ़ "चुनाव के समय की घोषणाओं" तक सीमित नहीं किया जा सकता।
उन्होंने आगे कहा, "हमारा मकसद सिर्फ़ प्रतिनिधित्व का वादा करना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे पक्का करना है।"





