
यादगीर। कर्नाटक में भीषण सूखे ने ग्रामीण इलाकों में जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। बारिश की भारी कमी, फसलों की बर्बादी और पेयजल संकट के कारण कई गांवों में लोगों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि सैकड़ों परिवार अपने घरों में ताला लगाकर रोजगार की तलाश में बेंगलुरु, हैदराबाद और मुंबई जैसे बड़े शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। यादगीर जिले के पुटपाक गांव में भी सूखे का गंभीर असर देखने को मिल रहा है। यहां खेती-बाड़ी प्रभावित होने से ग्रामीणों के सामने रोजगार के अवसर कम हो गए हैं। गांव के चार बोरवेल में से एक सूख चुका है, जबकि बाकी तीन में भी पानी समाप्त होने की आशंका जताई जा रही है। गांव में रहने वाले 70 वर्षीय मारेप्पा ने हालात की तुलना वर्ष 1972 के भीषण सूखे से करते हुए कहा कि वर्तमान संकट उससे भी अधिक गंभीर महसूस हो रहा है।
पुटपाक गांव में खेती-बाड़ी पर संकट
यादगीर जिले के पुटपाक गांव में अधिकांश परिवार अपनी आजीविका के लिए खेती और कृषि मजदूरी पर निर्भर हैं। लेकिन इस वर्ष पर्याप्त बारिश नहीं होने के कारण फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है।
कई खेतों में खड़ी फसल सूख गई है, जबकि कुछ किसानों को अपेक्षित उत्पादन मिलने की उम्मीद नहीं है। कृषि गतिविधियां प्रभावित होने से खेतिहर मजदूरों के लिए रोजगार के अवसर भी कम हो गए हैं।
ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ी चुनौती परिवार के लिए नियमित आय की व्यवस्था करना है। खेती से आमदनी नहीं होने और स्थानीय स्तर पर मजदूरी का काम कम मिलने के कारण लोग दूसरे शहरों का रुख कर रहे हैं।
सूखे का असर केवल किसानों तक सीमित नहीं है। कृषि पर निर्भर छोटे दुकानदारों और दूसरे ग्रामीण व्यवसायों के सामने भी आर्थिक परेशानियां बढ़ सकती हैं।
घरों में ताला लगाकर शहरों की ओर पलायन
पुटपाक गांव में आजीविका का संकट गहराने से कई परिवार गांव छोड़कर बाहर जा रहे हैं।
ग्रामीणों के अनुसार, काम की तलाश में लोग बेंगलुरु, हैदराबाद और मुंबई जैसे शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
इन शहरों में निर्माण कार्य, छोटे उद्योगों और अन्य असंगठित क्षेत्रों में रोजगार मिलने की उम्मीद के साथ परिवार अपना गांव छोड़ रहे हैं।
गांव में अनेक घर बंद होने और युवा आबादी के बाहर चले जाने से सामाजिक जीवन भी प्रभावित हो रहा है।
कई परिवारों के बुजुर्ग सदस्य गांव में ही रह गए हैं, जबकि कमाने वाले सदस्य दूसरे शहरों में रोजगार तलाश रहे हैं।
ऐसी स्थिति में बुजुर्गों के सामने दैनिक जरूरतों को पूरा करने और घरों की देखभाल की अतिरिक्त चुनौती पैदा हो गई है।
चार में से एक बोरवेल सूखा, बाकी पर भी संकट
पुटपाक गांव में पेयजल की कमी एक गंभीर समस्या बन गई है।
स्थानीय जानकारी के अनुसार, गांव में मौजूद चार बोरवेल में से एक पूरी तरह सूख चुका है।
बाकी तीन बोरवेल से पानी उपलब्ध हो रहा है, लेकिन ग्रामीणों को चिंता है कि अगले एक-दो महीनों में इनका जलस्तर भी और नीचे जा सकता है।
यदि ऐसा होता है, तो गांव में पीने के पानी की उपलब्धता और अधिक प्रभावित हो सकती है।
ग्रामीण इलाकों में भूजल पर अत्यधिक निर्भरता और पर्याप्त वर्षा नहीं होने के कारण इस प्रकार की समस्याएं गंभीर रूप ले सकती हैं।
कर्नाटक के कई सूखाग्रस्त जिलों में भूजल स्तर गिरने और बोरवेल सूखने की समस्या सामने आई है।
70 वर्षीय मारेप्पा बोले- 1972 से भी बदतर हालात
गांव के 70 वर्षीय मारेप्पा ने सूखे से पैदा हुई परेशानियों को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान परिस्थितियां उन्हें वर्ष 1972 के भीषण सूखे की याद दिला रही हैं।
मारेप्पा के अनुसार, पानी की कमी और रोजगार के अभाव ने ग्रामीणों का जीवन अत्यंत कठिन बना दिया है।
उन्होंने अपनी स्थानीय भाषा में बताया कि इस बार गांव के लोगों को जिस संकट का सामना करना पड़ रहा है, वह उनकी यादों में मौजूद 1972 के सूखे से भी अधिक गंभीर है।
उनकी यह तुलना व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है। हालांकि, पूरे राज्य में वर्तमान सूखे की ऐतिहासिक गंभीरता का आकलन आधिकारिक वर्षा और कृषि आंकड़ों के आधार पर ही किया जा सकता है।
कर्नाटक में सामान्य से 35 प्रतिशत कम बारिश
कर्नाटक में इस वर्ष मानसून के दौरान बारिश में भारी कमी दर्ज की गई है।
कर्नाटक राज्य प्राकृतिक आपदा निगरानी केंद्र के आंकड़ों के अनुसार, एक जून से 30 सितंबर 2026 के बीच राज्य में सामान्य 852 मिलीमीटर के मुकाबले केवल 551 मिलीमीटर बारिश हुई।
इस प्रकार मानसूनी वर्षा में लगभग 35 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
यह पिछले 55 वर्षों में राज्य के सबसे गंभीर मानसूनी वर्षा घाटों में शामिल है।
बारिश की कमी का असर खेती, जलाशयों और भूजल भंडार पर पड़ा है। विशेष रूप से वर्षा आधारित कृषि वाले क्षेत्रों में किसानों को अधिक परेशानी हुई है।
राज्य के 217 तालुकों में सूखे का असर
कर्नाटक सरकार ने राज्य के विभिन्न जिलों में सूखे के हालात को गंभीर बताया है।
आठ अक्टूबर को उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने कहा था कि राज्य के कुल 240 तालुकों में से 217 को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है।
उन्होंने बताया कि सरकार किसानों को राहत देने और प्रभावित क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने के लिए आवश्यक कदम उठा रही है।
परमेश्वर ने कहा कि यदि जरूरत पड़ी, तो किसानों को सहायता देने के लिए सरकार अतिरिक्त वित्तीय संसाधनों का भी इंतजाम करेगी।
उन्होंने ग्रामीण इलाकों से पलायन रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर मजदूरी और रोजगार उपलब्ध कराने को महत्वपूर्ण बताया।
फसल बर्बाद होने से किसानों की आर्थिक स्थिति कमजोर
बारिश की कमी के कारण किसानों को खेती में किए गए निवेश पर नुकसान उठाना पड़ रहा है।
बीज, खाद, कीटनाशक और खेत की तैयारी में खर्च करने के बाद फसल खराब होने से कई परिवारों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई है।
सूखाग्रस्त क्षेत्रों में कृषि मजदूरों के लिए काम की उपलब्धता भी घट रही है।
इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दोहरा प्रभाव पड़ रहा है। एक ओर किसानों की आय कम हो रही है, दूसरी ओर मजदूरी पर निर्भर परिवारों को रोजगार नहीं मिल पा रहा है।
कर्नाटक सरकार ने 19 अक्टूबर को सूखे की स्थिति को अत्यंत गंभीर बताते हुए केंद्र से अतिरिक्त राहत राशि मांगने की तैयारी की जानकारी दी थी।
पीने के पानी और रोजगार की व्यवस्था बड़ी चुनौती
सूखे से प्रभावित गांवों में सबसे जरूरी आवश्यकताओं में स्वच्छ पेयजल और आजीविका के साधन शामिल हैं।
ग्रामीणों के लिए नियमित जलापूर्ति बनाए रखना, खराब जलस्रोतों की मरम्मत और आवश्यकता के अनुसार वैकल्पिक पानी की व्यवस्था करना महत्वपूर्ण है।
इसके अलावा ग्रामीण रोजगार योजनाओं के माध्यम से स्थानीय स्तर पर काम उपलब्ध कराने से मजबूरी में होने वाले पलायन को कम करने में मदद मिल सकती है।
कर्नाटक सरकार ने भी सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पेयजल, पशुओं के चारे और रोजगार उपलब्ध कराने को प्राथमिकता देने की बात कही है।
सूखे ने गांवों के भविष्य पर खड़े किए सवाल
पुटपाक गांव में सूखे की स्थिति ने ग्रामीण जीवन के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
खेती-बाड़ी ठप होने, रोजगार के अवसर कम होने और पानी के स्रोत सूखने की आशंका के बीच ग्रामीणों को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।
युवाओं और कामकाजी परिवारों के शहरों की ओर जाने से गांव में बुजुर्गों की जिम्मेदारी और बढ़ गई है।
फिलहाल ग्रामीणों की सबसे बड़ी जरूरत पीने के पानी की विश्वसनीय व्यवस्था, कृषि नुकसान से राहत और स्थानीय रोजगार के अवसर हैं।
राज्य सरकार की राहत योजनाओं का लाभ प्रभावित परिवारों तक कितनी तेजी से पहुंचता है, यह आने वाले समय में महत्वपूर्ण होगा।





