
बेंगलुरु। कर्नाटक सरकार की महत्वाकांक्षी शरावती पंप्ड स्टोरेज पावर परियोजना को लेकर बड़ा वित्तीय सवाल खड़ा हो गया है। राज्य में बिजली उत्पादन और ऊर्जा भंडारण की क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से प्रस्तावित इस परियोजना पर जमीनी निर्माण कार्य शुरू होने से पहले ही 382 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। वर्ष 2021 से अब तक परियोजना के लिए बड़ी राशि खर्च किए जाने के बावजूद आवश्यक वन्यजीव मंजूरी का इंतजार जारी है। इस बीच परियोजना की अनुमानित लागत 8,800 करोड़ रुपये से बढ़कर 10,240 करोड़ रुपये हो गई है। लागत में लगातार बढ़ोतरी और निर्माण कार्य में देरी को लेकर ऊर्जा विभाग के भीतर भी चिंता जताई जा रही है।
जानकारी के अनुसार, शरावती पंप्ड स्टोरेज परियोजना पर अब तक खर्च किए गए 382 करोड़ रुपये में से लगभग 360 करोड़ रुपये इंजीनियरिंग, खरीद और अनुबंध से संबंधित कार्यों पर खर्च हुए हैं। इसके अलावा विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी डीपीआर तैयार करने के लिए 22 करोड़ रुपये खर्च किए गए। डीपीआर तैयार करने का काम वर्ष 2021 से 2024 के बीच किया गया था।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बाद भी परियोजना का मुख्य निर्माण कार्य शुरू नहीं हो पाया है। परियोजना के लिए आवश्यक मंजूरियों में देरी के कारण सरकार को समय और धन, दोनों स्तरों पर चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
परियोजना की लागत में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। पहले इस परियोजना पर लगभग 8,800 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान था, लेकिन अब यह बढ़कर 10,240 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। इस तरह शुरुआती अनुमान की तुलना में लागत में लगभग 1,440 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई है।
ऊर्जा विभाग के कुछ अधिकारियों को उम्मीद है कि नवंबर के तीसरे सप्ताह में प्रस्तावित राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) की स्थायी समिति की बैठक में परियोजना को आवश्यक मंजूरी मिल सकती है। हालांकि, विभाग के अन्य अधिकारियों ने लागत बढ़ने और निर्माण शुरू नहीं होने की स्थिति को वित्तीय बोझ बताया है।
जानकारी के मुताबिक, आगामी बैठक में बेंगलुरु स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज (NIAS) द्वारा तैयार की गई तकनीकी रिपोर्ट की भी समीक्षा की जाएगी। इस रिपोर्ट का महत्व इसलिए बढ़ गया है, क्योंकि परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर पहले से सवाल उठाए जा रहे हैं।
शरावती पंप्ड स्टोरेज परियोजना कर्नाटक की प्रमुख प्रस्तावित ऊर्जा परियोजनाओं में शामिल है। इसकी कुल प्रस्तावित क्षमता 2,000 मेगावाट है। इस परियोजना को कर्नाटक पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (KPCL) द्वारा विकसित किया जाना है।
केंद्र सरकार की केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) ने अगस्त 2024 में इस परियोजना को तकनीकी सहमति प्रदान की थी। हालांकि, तकनीकी सहमति मिलने का अर्थ यह नहीं है कि परियोजना को सभी आवश्यक पर्यावरणीय और वन्यजीव मंजूरियां भी मिल चुकी हैं।
पंप्ड स्टोरेज बिजली परियोजनाएं ऊर्जा भंडारण के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इन परियोजनाओं में बिजली की मांग कम होने के समय पानी को निचले जलाशय से ऊपरी जलाशय तक पंप किया जाता है। इसके बाद बिजली की मांग बढ़ने पर उसी पानी को नीचे छोड़कर टरबाइन के माध्यम से बिजली पैदा की जाती है।
इस व्यवस्था का उपयोग सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों से मिलने वाली बिजली के बेहतर प्रबंधन में किया जा सकता है। सौर ऊर्जा का उत्पादन दिन में अधिक होता है, जबकि बिजली की मांग कई बार शाम के समय बढ़ जाती है। ऐसी परिस्थितियों में पंप्ड स्टोरेज परियोजनाएं बिजली आपूर्ति को संतुलित करने में मदद कर सकती हैं।
लेकिन शरावती परियोजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसका प्रस्तावित स्थान है। यह परियोजना पश्चिमी घाट के संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्र से जुड़ी हुई है। इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण वन संपदा और दुर्लभ वन्यजीव पाए जाते हैं।
पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संगठनों और विशेषज्ञों ने परियोजना के संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियां जंगलों, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और स्थानीय पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित कर सकती हैं।
विशेष रूप से शरावती घाटी के लायन-टेल्ड मकाक वन्यजीव अभयारण्य के आसपास परियोजना के संभावित प्रभावों पर चर्चा होती रही है। इस क्षेत्र में पाए जाने वाले दुर्लभ जीवों और वन संपदा के संरक्षण को लेकर विशेषज्ञों ने सावधानी बरतने की आवश्यकता जताई है।
इससे पहले राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति ने परियोजना से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर अतिरिक्त जानकारी मांगी थी। फरवरी 2026 में हुई बैठक में संबंधित अधिकारियों से तकनीकी सवालों का जवाब देने और NIAS की रिपोर्ट उपलब्ध कराने को कहा गया था।
कर्नाटक सरकार ने बाद में आवश्यक दस्तावेज और तकनीकी रिपोर्ट प्रस्तुत करने की जानकारी दी। अक्टूबर में राज्य सरकार की ओर से केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव से परियोजना को शीघ्र मंजूरी देने का अनुरोध भी किया गया था।
परियोजना को लेकर कानूनी अड़चनें भी सामने आ चुकी हैं। मार्च 2026 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि अदालत की अनुमति के बिना शरावती पंप्ड स्टोरेज परियोजना से संबंधित जमीनी गतिविधियां आगे नहीं बढ़ाई जाएं।
अदालत ने यह निर्देश पर्यावरण और वन क्षेत्र से जुड़े मुद्दों को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया था। उस समय भी यह स्पष्ट किया गया था कि परियोजना के लिए आवश्यक मंजूरियों की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है।
ऐसी स्थिति में परियोजना के भविष्य को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। एक ओर सरकार इसे ऊर्जा सुरक्षा और नवीकरणीय ऊर्जा के बेहतर उपयोग के लिए महत्वपूर्ण मानती है, वहीं दूसरी ओर इसके पर्यावरणीय प्रभाव और लगातार बढ़ती लागत पर चिंता जताई जा रही है।
ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े जानकारों के अनुसार, बड़ी बिजली परियोजनाओं में मंजूरी मिलने में देरी से लागत बढ़ने की आशंका रहती है। निर्माण सामग्री, उपकरण, श्रम और अन्य सेवाओं की लागत समय के साथ बदल सकती है। ऐसे में परियोजना जितनी लंबी अवधि तक लंबित रहती है, उसके वित्तीय प्रबंधन की चुनौती उतनी ही बढ़ सकती है।
शरावती परियोजना के मामले में अब तक खर्च किए गए 382 करोड़ रुपये और अनुमानित लागत में 1,440 करोड़ रुपये की वृद्धि को लेकर वित्तीय समीक्षा की जरूरत महसूस की जा रही है। हालांकि, केवल निर्माण शुरू नहीं होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अब तक किया गया पूरा खर्च व्यर्थ हो गया है। डीपीआर, इंजीनियरिंग और अन्य प्रारंभिक कार्य परियोजना की तैयारी का हिस्सा होते हैं।
फिलहाल शरावती पंप्ड स्टोरेज परियोजना का भविष्य नवंबर के तीसरे सप्ताह में प्रस्तावित राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की बैठक और आवश्यक अनुमतियों पर निर्भर करेगा। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि परियोजना को मंजूरी मिलती है या पर्यावरणीय चिंताओं के कारण इसे और इंतजार करना पड़ता है।





