कर्नाटक

धर्म अलग हो सकते हैं, लेकिन इंसानियत और भक्ति एक: डीके शिवकुमार

Kavita2
24 Aug 2026 10:36 AM IST
धर्म अलग हो सकते हैं, लेकिन इंसानियत और भक्ति एक: डीके शिवकुमार
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बेंगलुरु। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने कहा कि इंसानियत के साथ-साथ समाज में समानता और भाईचारे की भावना को मजबूत करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग धर्मों की पूजा-पद्धतियां और परंपराएं भले ही अलग हों, लेकिन उनका मूल उद्देश्य शांति, आत्म-शुद्धि, सेवा और मानव कल्याण से जुड़ा हुआ है।

शिवकुमार बेंगलुरु की एम.जी. रेलवे कॉलोनी स्थित अमलोद्भव माता मंदिर की 125वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने विभिन्न धर्मों की परंपराओं और उनके बीच मौजूद समानताओं का उल्लेख करते हुए धार्मिक सद्भाव और भाईचारे का संदेश दिया।

धर्म अलग, सिद्धांत एक

मुख्यमंत्री ने कहा कि दुनिया में धर्म और धार्मिक परंपराएं अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन इनके पीछे मौजूद मूल भावना काफी हद तक समान है। उन्होंने कहा कि लोगों को धर्म के बाहरी अंतर से अधिक उसके मानवीय संदेश को समझने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि धर्म कई हैं, लेकिन सिद्धांत एक है। नाम अनेक हैं, लेकिन ईश्वर एक है। पूजा की पद्धतियां अलग हो सकती हैं, लेकिन भक्ति की भावना एक ही है। काम अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन निष्ठा का भाव समान है।

शिवकुमार ने कहा कि ईश्वर को अलग-अलग समुदाय और धर्म अपने-अपने तरीके से याद करते हैं, लेकिन इससे ईश्वर की मूल अवधारणा नहीं बदलती। धार्मिक विविधता को समाज की ताकत के रूप में देखा जाना चाहिए।

इंसानियत और भाईचारे पर जोर

मुख्यमंत्री ने कहा कि आज के समय में समाज को सबसे अधिक जरूरत इंसानियत, समानता और भाईचारे की है। अलग-अलग धर्मों के लोग अपनी-अपनी परंपराओं का पालन करते हुए भी एक-दूसरे का सम्मान कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि धार्मिक आस्थाएं लोगों को शांति और सुकून देने के साथ समाज सेवा की प्रेरणा भी देती हैं। पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत आस्था तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इससे समाज के कमजोर और जरूरतमंद लोगों की मदद की भावना भी मजबूत होनी चाहिए।

उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अपने धर्म और परंपराओं का पालन करते हुए दूसरे धर्मों की मान्यताओं का भी सम्मान करें। इससे समाज में आपसी विश्वास और सद्भाव बढ़ेगा।

दीये और मोमबत्ती का उदाहरण

धार्मिक परंपराओं में समानता को समझाने के लिए शिवकुमार ने दीये और मोमबत्ती का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि हिंदू परंपरा में दीया जलाया जाता है, जबकि ईसाई परंपरा में मोमबत्ती का इस्तेमाल होता है।

दोनों के तरीके अलग हैं, लेकिन दोनों का उद्देश्य प्रकाश और आध्यात्मिक भावना से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि इसी तरह विभिन्न धर्मों की पूजा-पद्धतियां अलग हो सकती हैं, लेकिन उनके पीछे शांति, आस्था और ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना देखी जा सकती है।

उन्होंने कहा कि समाज में धार्मिक विविधता को लेकर दूरी बनाने के बजाय लोगों को इसके बीच मौजूद समानताओं को समझना चाहिए।

मंदिर और चर्च की परंपराओं का जिक्र

मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में चर्च और हिंदू मंदिरों की कुछ स्थापत्य परंपराओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जैसे चर्च में कुछ विशेष धार्मिक प्रतीक और परंपराएं होती हैं, उसी तरह हिंदू मंदिरों में भी अपनी विशिष्ट परंपराएं होती हैं।

उन्होंने ध्वज-स्तंभ का उदाहरण देते हुए कहा कि धार्मिक स्थलों में प्रतीकों और परंपराओं का अपना महत्व होता है। अलग-अलग धार्मिक स्थानों की संरचना और पूजा की प्रक्रिया अलग होने के बावजूद लोगों की आस्था उन्हें जोड़ने का काम करती है।

उन्होंने कहा कि धार्मिक परंपराओं को उनके ऐतिहासिक और आध्यात्मिक संदर्भ में समझना चाहिए, न कि उनके बीच के बाहरी अंतर के आधार पर समाज में दूरी पैदा करनी चाहिए।

संगीत और आध्यात्मिकता का उदाहरण

कार्यक्रम के दौरान प्रस्तुत संगीत का जिक्र करते हुए शिवकुमार ने कहा कि संगीत की मधुर ध्वनि मन को शांति देती है। उन्होंने कार्यक्रम में बजाए गए संगीत की सराहना की और इसे आध्यात्मिक वातावरण से जोड़ा।

उन्होंने बांस की बांसुरी का उदाहरण देते हुए कहा कि साधारण बांस से बनी बांसुरी भी जब बजती है तो मधुर ध्वनि पैदा करती है। इसी तरह अलग-अलग माध्यमों के जरिए आध्यात्मिक अनुभूति व्यक्त की जाती है।

उन्होंने भगवान कृष्ण के शंख का भी उल्लेख किया और कहा कि धार्मिक परंपराओं में शंख की ध्वनि का अपना विशेष महत्व है। उनके मुताबिक, अलग-अलग धार्मिक प्रतीकों और ध्वनियों के पीछे सदियों पुरानी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराएं जुड़ी हुई हैं।

125वीं वर्षगांठ का महत्व

अमलोद्भव माता मंदिर की 125वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में मंदिर से जुड़ी ऐतिहासिक और धार्मिक परंपराओं को भी याद किया गया। इतने लंबे समय से किसी धार्मिक स्थल का अस्तित्व स्थानीय समुदाय और उसकी आस्था के साथ उसके गहरे जुड़ाव को दर्शाता है।

शिवकुमार ने इस अवसर पर लोगों को शुभकामनाएं देते हुए धार्मिक संस्थाओं से समाज सेवा और मानव कल्याण के कार्यों को आगे बढ़ाने की अपील की।

समाज सेवा को धार्मिक मूल्यों से जोड़ने की अपील

मुख्यमंत्री ने कहा कि धर्म का एक महत्वपूर्ण पक्ष मानव सेवा भी है। अलग-अलग धार्मिक समुदाय अपनी परंपराओं के माध्यम से समाज के जरूरतमंद लोगों की मदद करते हैं। उन्होंने कहा कि धार्मिक संस्थाओं को भी सामाजिक जिम्मेदारियों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि धार्मिक आस्था इंसान को दूसरे इंसान की मदद करने, जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशील बनने और समाज में शांति बनाए रखने की प्रेरणा देती है, तो उसका सकारात्मक प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है।

विविधता में एकता का संदेश

शिवकुमार के संबोधन का मुख्य संदेश धार्मिक विविधता के बीच एकता, समानता और भाईचारे को मजबूत करने का रहा। उन्होंने कहा कि भारत की विशेषता ही इसकी विविध धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में है।

उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे अपने-अपने धर्म और परंपराओं को सम्मान के साथ निभाएं, लेकिन साथ ही दूसरे समुदायों की आस्थाओं का भी सम्मान करें। उनके मुताबिक, पूजा के तरीके अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवता और ईश्वर के प्रति आस्था की भावना लोगों को एक-दूसरे से जोड़ सकती है।

अमलोद्भव माता मंदिर की 125वीं वर्षगांठ के मंच से मुख्यमंत्री का यह संदेश धार्मिक सद्भाव, सामाजिक एकता और मानव सेवा पर केंद्रित रहा। उन्होंने कहा कि समाज को मजबूत बनाने के लिए धर्म के साथ इंसानियत, समानता और भाईचारे को जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाना जरूरी है।

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