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कर्नाटक में मिली आदि शंकराचार्य की दुर्लभ प्रतिमा, ASI की बड़ी खोज

Kavita2
6 Nov 2026 10:59 AM IST
कर्नाटक में मिली आदि शंकराचार्य की दुर्लभ प्रतिमा, ASI की बड़ी खोज
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नई दिल्ली/मैसूर। भारत के महान दार्शनिक और अद्वैत वेदांत के प्रमुख प्रवर्तक जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के जीवन, यात्राओं और दार्शनिक योगदान से जुड़े ऐतिहासिक प्रमाणों को खोजने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने एक महत्वपूर्ण शोध परियोजना शुरू की है। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के निर्देश पर शुरू हुई इस परियोजना में 84 हजार से अधिक प्राचीन शिलालेखों का अध्ययन किया जा रहा है। इसी बीच कर्नाटक के मैसूर जिले में आदि शंकराचार्य से जुड़ी एक दुर्लभ प्रतिमा मिलने की जानकारी सामने आई है। ASI के अधिकारियों के अनुसार, प्रतिमा विज्ञान विशेषज्ञों ने इसकी पहचान आदि शंकराचार्य की प्रतिमा के रूप में की है।

यह खोज अक्टूबर 2026 में मैसूर जिले के के.आर. नगर तालुक स्थित हम्पापुर गांव में हुई। यहां एक प्राचीन ईंट निर्मित संरचना के भीतर मूर्ति मिली थी। ASI के अभिलेख विभाग के निदेशक के. मुनिरत्नम रेड्डी ने बताया कि प्रतिमा की जांच विभाग की विशेषज्ञ टीम ने की है।

अधिकारियों के अनुसार, जिस ईंट निर्मित संरचना में प्रतिमा मिली है, उसका संबंध नौवीं शताब्दी से बताया जा रहा है। हालांकि, संरचना के निर्माणकाल और प्रतिमा के वास्तविक निर्माणकाल को एक समान मानना उचित नहीं होगा। प्रतिमा की ऐतिहासिक महत्ता तथा उसके काल निर्धारण से जुड़े अन्य पहलुओं का विस्तृत अध्ययन महत्वपूर्ण रहेगा।

ASI की यह पहल केवल एक मूर्ति की पहचान तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य आदि शंकराचार्य के जीवन और कार्यों से संबंधित शिलालेखों, ऐतिहासिक अभिलेखों तथा विभिन्न स्थानों पर उपलब्ध साक्ष्यों को एकत्रित करना है। शोधकर्ताओं की कोशिश है कि इन प्रमाणों की सहायता से उनके धार्मिक और दार्शनिक प्रभाव का ऐतिहासिक अध्ययन अधिक व्यवस्थित ढंग से किया जा सके।

आदि शंकराचार्य को भारतीय दर्शन में अद्वैत वेदांत के सबसे प्रभावशाली आचार्यों में माना जाता है। परंपरागत मान्यताओं के अनुसार, उन्होंने भारत के विभिन्न क्षेत्रों की यात्राएं कीं और वेदांत दर्शन के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी यात्राओं को धार्मिक परंपरा में 'दिग्विजय' यात्रा के रूप में जाना जाता है।

इन यात्राओं से संबंधित विवरण विभिन्न ग्रंथों, धार्मिक परंपराओं और मठों के इतिहास में मिलते हैं। हालांकि, उनके जीवन से जुड़े सभी घटनाक्रमों और यात्राओं का स्वतंत्र ऐतिहासिक सत्यापन एक जटिल कार्य है। ऐसे में शिलालेखों का अध्ययन अतिरिक्त साक्ष्य उपलब्ध कराने में सहायक हो सकता है।

ASI के अभिलेख विभाग के निदेशक के. मुनिरत्नम रेड्डी इस परियोजना का नेतृत्व कर रहे हैं। उनके अनुसार, विभाग के पास 84,000 से अधिक शिलालेखों का संग्रह है। इन अभिलेखों की जांच करके ऐसे संदर्भ अलग किए जा रहे हैं, जिनका संबंध आदि शंकराचार्य, उनकी शिक्षाओं या उनके दार्शनिक प्रभाव से हो सकता है।

इस शोध में देश के विभिन्न प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों से संबंधित शिलालेखों का अध्ययन भी शामिल है। विभाग के अभिलेखों में श्रीशैलम से 645, कांचीपुरम से 625, चिदंबरम से 352 और तिरुपति से 159 शिलालेख दर्ज हैं। शोधकर्ता इन अभिलेखों का परीक्षण करेंगे, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इनमें से कितने शिलालेख आदि शंकराचार्य से संबंधित उपयोगी जानकारी प्रदान करते हैं।

इस परियोजना के दौरान तमिलनाडु से जुड़ा एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शिलालेख भी दोबारा चर्चा में आया है। तिरुचिरापल्ली क्षेत्र के चोलमादेवी स्थित कैलासनाथ मंदिर में 11वीं शताब्दी का एक शिलालेख मौजूद है, जिसका संबंध चोल शासक वीरराजेंद्र के शासनकाल से बताया जाता है।

यह अभिलेख लगभग 1065 ईस्वी का है। मंदिर के मुख्य गर्भगृह की दक्षिणी दीवार पर अंकित इस शिलालेख में संस्कृत और तमिल भाषाओं का प्रयोग हुआ है। अभिलेख ग्रंथ और तमिल लिपियों में लिखा गया है।

इस शिलालेख में एक ऐसे शिक्षक के निर्वाह के लिए भूमि अनुदान का उल्लेख मिलता है, जो आदि शंकराचार्य के दार्शनिक ग्रंथ से संबंधित टीका का अध्यापन करता था। अभिलेख में चिदानंद पिडारार द्वारा रचित 'प्रदीपक' नामक व्याख्या का उल्लेख है, जो भगवत्पाद के शारीरक भाष्य से संबंधित थी।

यह संदर्भ इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि 11वीं शताब्दी के चोल शासनकाल में आदि शंकराचार्य के दार्शनिक विचारों का अध्ययन और अध्यापन किया जा रहा था।

प्रसिद्ध पुरातत्वविद् आर. नागास्वामी ने भी वर्ष 1991 में प्रकाशित अपने एक लेख में इस शिलालेख के ऐतिहासिक महत्व की चर्चा की थी। अब ASI इस अभिलेख की नई प्रतिलिपियां तैयार करने का काम कर रहा है, क्योंकि पहले तैयार किए गए कुछ शिलालेख छाप उपलब्ध नहीं हैं।

इस शोध परियोजना का एक महत्वपूर्ण पहलू प्राचीन अभिलेखों का डिजिटलीकरण भी है। ASI के भारतश्री यानी BharatSHRI पोर्टल के माध्यम से ऐतिहासिक शिलालेखों को डिजिटल रूप में संरक्षित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और आम नागरिकों को प्राचीन भारतीय इतिहास से जुड़े प्रमाणों तक पहुंच उपलब्ध कराना है।

ASI की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, भारतश्री परियोजना के अंतर्गत मैसूर स्थित अभिलेख निदेशालय में संरक्षित शिलालेखों की छापों को स्कैन करके डिजिटल संग्रह तैयार किया जा रहा है। इसमें शिलालेखों की प्रतियां, उनका पाठ और संबंधित विवरण उपलब्ध कराने की योजना है।

आदि शंकराचार्य से संबंधित नई परियोजना के अंतर्गत जिन शिलालेखों की पहचान और प्रमाणिकता स्थापित होगी, उन्हें भी भारतश्री पोर्टल पर उपलब्ध कराया जाएगा। इससे भविष्य में उनके दार्शनिक प्रभाव और ऐतिहासिक यात्राओं का तुलनात्मक अध्ययन करने में सहायता मिल सकती है।

शोधकर्ताओं के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती प्राचीन शिलालेखों में प्रयुक्त विभिन्न भाषाओं और लिपियों को पढ़ने की है। कई अभिलेख समय के साथ क्षतिग्रस्त हो चुके हैं, जबकि कुछ की प्रतियां अस्पष्ट हैं। ऐसी स्थिति में अभिलेख विशेषज्ञों को ऐतिहासिक संदर्भ, भाषा और लेखन शैली के आधार पर विस्तृत अध्ययन करना पड़ता है।

ASI को आदि शंकराचार्य की यात्राओं से जुड़े कुछ अन्य स्थानों के बारे में भी नई जानकारियां मिल रही हैं। अधिकारियों के अनुसार, अमरावती के कुछ स्थानों से संबंधित सूचनाओं की भी जांच की जाएगी। आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञ टीमों को संबंधित स्थलों पर भेजकर उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण किया जाएगा।

के. मुनिरत्नम रेड्डी ने बताया कि परियोजना की प्रगति और आगे की कार्ययोजना को लेकर 6 नवंबर को केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के साथ चर्चा प्रस्तावित है। इस बैठक में अब तक सामने आए अभिलेखों और आगे के शोध की दिशा पर विचार किया जाना है।

विशेषज्ञों के लिए यह परियोजना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आदि शंकराचार्य का प्रभाव भारतीय दर्शन, धार्मिक संस्थाओं और शास्त्रीय अध्ययन की परंपरा में व्यापक रूप से दिखाई देता है। उनके विचारों का अध्ययन आज भी देश के अनेक शिक्षण संस्थानों और धार्मिक केंद्रों में किया जाता है।

कर्नाटक के हम्पापुर गांव में मिली प्रतिमा और हजारों शिलालेखों की जांच इस दिशा में नए शोध के अवसर प्रदान कर सकती है। हालांकि, इन खोजों के आधार पर आदि शंकराचार्य की पूरी यात्रा का ऐतिहासिक मार्ग निर्धारित करने के लिए अतिरिक्त प्रमाणों और वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता होगी।

फिलहाल ASI की इस पहल को भारतीय इतिहास और दर्शन से जुड़े प्राचीन स्रोतों के व्यवस्थित अध्ययन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यदि परियोजना के अंतर्गत पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं, तो भविष्य में आदि शंकराचार्य के जीवन, उनके दार्शनिक योगदान और भारत के विभिन्न क्षेत्रों में उनके प्रभाव को अधिक स्पष्ट रूप से समझने में मदद मिल सकती है।

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