
हम्पी। यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल हम्पी के समृद्ध इतिहास में एक और महत्वपूर्ण खोज जुड़ गई है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने हम्पी में जैन मंदिर परिसर के पास चल रही खुदाई के दौरान दो दुर्लभ मूर्तियों की खोज की है। इनमें एक नागिनी की प्रतिमा है, जबकि दूसरी पौराणिक और धार्मिक परंपरा में महत्वपूर्ण माने जाने वाले गरुड़ की आकृति है।
पुरातत्वविदों के लिए यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि दोनों प्रतिमाएं हम्पी क्षेत्र में प्राचीन धार्मिक परंपराओं, कला और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के बारे में नई जानकारी उपलब्ध करा सकती हैं। इन प्रतिमाओं के अध्ययन से यह समझने में मदद मिल सकती है कि ऐतिहासिक हम्पी में अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं और कलात्मक परंपराओं का किस तरह सह-अस्तित्व रहा होगा।
जैन मंदिर परिसर के पास मिलीं प्रतिमाएं
ASI की टीम ने हम्पी के जैन मंदिर परिसर के आसपास खुदाई के दौरान इन मूर्तियों को खोजा। खुदाई से सामने आई दोनों प्रतिमाएं अलग-अलग धार्मिक और पौराणिक प्रतीकों से जुड़ी हैं। एक प्रतिमा नागिनी की है, जिसे मानव और सर्प जैसे गुणों वाली महिला रक्षक आकृति के रूप में दर्शाया गया है।
दूसरी प्रतिमा गरुड़ की है। गरुड़ हिंदू धार्मिक परंपरा में महत्वपूर्ण दिव्य आकृति हैं और उन्हें सामान्य तौर पर भगवान विष्णु के वाहन के रूप में जाना जाता है। खुदाई से मिली प्रतिमा में गरुड़ को बिना सिर वाले बाज के रूप में दर्शाया गया है।
पुरातत्व विशेषज्ञों के लिए दोनों मूर्तियों का एक ही पुरातात्विक क्षेत्र से मिलना विशेष रुचि का विषय है। इससे क्षेत्र में धार्मिक प्रतीकों के इस्तेमाल, मूर्तिकला की शैली और विभिन्न परंपराओं के बीच संभावित सांस्कृतिक संपर्क का अध्ययन करने का अवसर मिलेगा।
गरुड़ की मूर्ति 32 सेंटीमीटर चौड़ी
ASI को मिली गरुड़ की मूर्ति का आकार लगभग 32 सेंटीमीटर चौड़ा और 37 सेंटीमीटर लंबा है। मूर्ति में गरुड़ को बाज के रूप में दर्शाया गया है। हालांकि प्रतिमा का सिर मौजूद नहीं है, लेकिन इसकी शेष संरचना से इसकी पहचान गरुड़ के रूप में की गई है।
गरुड़ की आकृति भारतीय धार्मिक और कलात्मक परंपरा में लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। विशेष रूप से वैष्णव परंपरा में गरुड़ को भगवान विष्णु के वाहन और भक्त के रूप में प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त है। इसलिए हम्पी जैसे ऐतिहासिक धार्मिक केंद्र में गरुड़ की प्रतिमा का मिलना क्षेत्र की धार्मिक कला को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है।
नागिनी की प्रतिमा भी दुर्लभ
खुदाई से मिली दूसरी प्रतिमा नागिनी की है। इसका आकार लगभग 30 सेंटीमीटर चौड़ा और 51 सेंटीमीटर लंबा है। नागिनी को मानव और सर्प के मिश्रित स्वरूप वाली महिला रक्षक आकृति के रूप में दर्शाया गया है।
भारतीय कला और धार्मिक परंपराओं में नाग और नागिन से जुड़ी आकृतियां अलग-अलग रूपों में देखने को मिलती हैं। इनका संबंध सुरक्षा, जल, उर्वरता और धार्मिक मान्यताओं जैसी विभिन्न अवधारणाओं से जोड़ा जाता रहा है। हम्पी से नागिनी की प्रतिमा का मिलना क्षेत्र में प्रचलित धार्मिक प्रतीकों और स्थानीय कलात्मक परंपराओं के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध करा सकता है।
धार्मिक परंपराओं के बीच संबंधों पर नई जानकारी
हम्पी विजयनगर साम्राज्य की राजधानी के रूप में अपनी ऐतिहासिक और स्थापत्य विरासत के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। यहां मंदिरों, धार्मिक स्मारकों, बाजारों, जल संरचनाओं और अन्य ऐतिहासिक अवशेषों की बड़ी संख्या मौजूद है। इस क्षेत्र में विभिन्न धार्मिक परंपराओं से जुड़े अवशेष भी मिले हैं।
जैन मंदिर परिसर के पास हिंदू धार्मिक परंपरा से जुड़े गरुड़ और नागिनी जैसे प्रतीकों का मिलना शोधकर्ताओं के लिए विशेष महत्व रखता है। इससे यह अध्ययन करने में मदद मिल सकती है कि अलग-अलग धार्मिक समुदायों और परंपराओं के बीच कला, प्रतीकों और धार्मिक मान्यताओं का किस तरह आदान-प्रदान हुआ।
हालांकि, इन प्रतिमाओं के काल निर्धारण, निर्माण शैली और उनके मूल संदर्भ को समझने के लिए विस्तृत वैज्ञानिक और पुरातात्विक अध्ययन की जरूरत होगी। केवल प्रतिमा मिलने के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय खुदाई स्थल की परतों, आसपास मिले अन्य अवशेषों और मूर्तियों की शैली का तुलनात्मक अध्ययन किया जाएगा।
हम्पी की पुरातात्विक विरासत में नया अध्याय
हम्पी पहले से ही भारत के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक और सांस्कृतिक स्थलों में शामिल है। यहां समय-समय पर होने वाली खुदाई और संरक्षण गतिविधियों के दौरान ऐतिहासिक महत्व के अवशेष सामने आते रहे हैं। नई मूर्तियों की खोज ने एक बार फिर हम्पी की पुरातात्विक संपदा और इसके भीतर छिपी ऐतिहासिक परतों की ओर ध्यान आकर्षित किया है।
पुरातत्वविदों के लिए ऐसी खोजें केवल मूर्तियों तक सीमित नहीं होतीं। प्रत्येक प्रतिमा अपने समय की कला, धार्मिक विश्वास, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक संपर्कों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दे सकती है।
नागिनी और गरुड़ की इन दोनों प्रतिमाओं का अध्ययन हम्पी के धार्मिक और कलात्मक इतिहास को समझने में नई कड़ी जोड़ सकता है। विशेष रूप से जैन मंदिर परिसर के निकट इनका मिलना क्षेत्र में मौजूद धार्मिक विविधता और सांस्कृतिक संपर्कों पर आगे शोध का रास्ता खोल सकता है।
आगे के अध्ययन से खुलेगा इतिहास
ASI द्वारा खोजी गई इन प्रतिमाओं का विस्तृत अध्ययन अब महत्वपूर्ण होगा। विशेषज्ञ इनके निर्माण में इस्तेमाल सामग्री, मूर्तिकला शैली, क्षति की स्थिति और खुदाई स्थल के संदर्भ का विश्लेषण कर सकते हैं। इसके आधार पर इनके संभावित काल और उपयोग को लेकर अधिक स्पष्ट जानकारी सामने आ सकती है।
पुरातात्विक खोजों का महत्व केवल वर्तमान में दिखाई देने वाले अवशेषों तक सीमित नहीं होता, बल्कि वे अतीत की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना को समझने का माध्यम भी बनते हैं। हम्पी में नागिनी और गरुड़ की मूर्तियों की खोज भी इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
दोनों प्रतिमाओं के आकार और स्वरूप से जुड़ी जानकारी दर्ज की गई है—गरुड़ की प्रतिमा 32 सेंटीमीटर चौड़ी और 37 सेंटीमीटर लंबी, जबकि नागिनी की प्रतिमा 30 सेंटीमीटर चौड़ी और 51 सेंटीमीटर लंबी है। अब इन दुर्लभ प्रतिमाओं का विस्तृत अध्ययन हम्पी की धार्मिक प्रथाओं, कला और विभिन्न सांस्कृतिक परंपराओं के आपसी संबंधों को समझने में नई जानकारी दे सकता है।





