
बेंगलुरु। तेलंगाना सरकार की ओर से अल्मट्टी और नारायणपुर जलाशयों से पानी छोड़ने की मांग को लेकर कर्नाटक में विरोध शुरू हो गया है। खासकर विजयपुरा जिले के किसान संगठनों ने राज्य सरकार से साफ कहा है कि मौजूदा जल संकट और सूखे जैसी परिस्थितियों को देखते हुए तेलंगाना को पानी नहीं दिया जाना चाहिए। दूसरी ओर कर्नाटक सरकार ने तेलंगाना की अपील पर सकारात्मक रुख दिखाया है, जिससे यह मुद्दा अब राजनीतिक और किसान हितों से जुड़ी संवेदनशील बहस में बदल गया है।
तेलंगाना सरकार ने हाल ही में कर्नाटक से कृष्णा नदी प्रणाली के तहत अल्मट्टी और नारायणपुर जलाशयों से पानी छोड़ने का अनुरोध किया था। तेलंगाना का कहना है कि पूर्ववर्ती महबूबनगर क्षेत्र में खड़ी फसलें पानी की कमी से प्रभावित हो रही हैं और उन्हें बचाने के लिए तत्काल अतिरिक्त पानी की जरूरत है। तेलंगाना के प्रतिनिधिमंडल ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार से मुलाकात कर इस संबंध में आग्रह किया था।
तेलंगाना ने कर्नाटक से प्रतिदिन लगभग 5,000 क्यूसेक पानी एक महीने तक छोड़ने की मांग की थी। इस पानी का उपयोग जुराला, भीमा, नेट्टेमपाडु और कोइलसागर परियोजनाओं के तहत आने वाली करीब 5.5 लाख एकड़ फसलों को बचाने के लिए करने की योजना बताई गई थी। तेलंगाना के नेताओं ने कहा कि कम बारिश और जलाशयों में घटते जलस्तर के कारण किसानों की फसलें संकट में हैं।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने तेलंगाना की मांग पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। इसके बाद कर्नाटक की ओर से चरणबद्ध तरीके से करीब 3 टीएमसी फीट कृष्णा नदी का पानी छोड़ने का आश्वासन सामने आया। तेलंगाना सरकार ने इस आश्वासन के बाद जुराला परियोजना से भी किसानों के लिए पानी छोड़ना शुरू कर दिया।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने भी इस मामले में कर्नाटक सरकार की सकारात्मक प्रतिक्रिया का उल्लेख किया। दोनों राज्यों में कांग्रेस की सरकार होने के कारण बातचीत के जरिए समस्या का समाधान निकालने की कोशिश की जा रही है। हालांकि कर्नाटक में किसानों के विरोध ने सरकार के लिए स्थिति को जटिल बना दिया है।
विजयपुरा जिले में कर्नाटक राज्य किसान संघ और अन्य किसान संगठनों ने तेलंगाना को पानी देने के प्रस्ताव का विरोध किया है। किसान नेताओं का कहना है कि कर्नाटक खुद कम बारिश और जल संकट से जूझ रहा है, इसलिए राज्य के जलाशयों में उपलब्ध पानी को पहले स्थानीय किसानों और पेयजल जरूरतों के लिए सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
किसान संगठनों ने राज्य सरकार को चेतावनी दी है कि यदि अल्मट्टी या नारायणपुर जलाशय से तेलंगाना को पानी छोड़ा गया तो आंदोलन किया जा सकता है। उनका कहना है कि उत्तर कर्नाटक के कई इलाकों में पहले ही फसलों पर असर पड़ा है और आने वाले महीनों में पेयजल तथा सिंचाई की जरूरत और बढ़ सकती है।
कर्नाटक इस समय गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। राज्य के कई तालुकों में सूखे जैसी स्थिति बनी हुई है और जलाशयों के स्तर को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। इसी वजह से किसान संगठनों का तर्क है कि उपलब्ध पानी का इस्तेमाल बेहद सावधानी से किया जाना चाहिए।
इस मुद्दे की संवेदनशीलता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि कर्नाटक पहले से तमिलनाडु के साथ कावेरी जल बंटवारे को लेकर दबाव में है। मुख्यमंत्री शिवकुमार ने हाल ही में कहा था कि तमिलनाडु को पानी उपलब्धता के आधार पर ही छोड़ा जा सकता है। ऐसे में कृष्णा नदी का पानी तेलंगाना को देने का फैसला किसानों के बीच असंतोष बढ़ा सकता है।
तेलंगाना की ओर से कहा गया है कि पानी की मांग आपात स्थिति में खड़ी फसलों को बचाने के उद्देश्य से की गई है। वहां के किसानों को विशेष रूप से महबूबनगर क्षेत्र में सिंचाई संकट का सामना करना पड़ रहा है। तेलंगाना सरकार का कहना है कि थोड़ी अवधि के लिए अतिरिक्त पानी मिलने से बड़ी संख्या में किसानों को राहत मिल सकती है।
दूसरी ओर कर्नाटक के किसान संगठनों का कहना है कि दूसरे राज्य की मदद करने से पहले राज्य सरकार को यहां के किसानों की जरूरतों का पूरा आकलन करना चाहिए। किसान नेताओं का तर्क है कि यदि आने वाले महीनों में बारिश नहीं हुई तो रबी फसलों और पेयजल व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है।
दक्षिण भारत के कई जलाशयों में इस साल पानी का स्तर सामान्य से कम है। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार सितंबर के अंतिम सप्ताह में दक्षिण भारत के प्रमुख जलाशयों में भंडारण पिछले साल की तुलना में काफी कम था। कम और असमान मानसूनी बारिश ने स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
अब कर्नाटक सरकार के सामने दोनों पक्षों के हितों में संतुलन बनाने की चुनौती है। एक ओर पड़ोसी राज्य तेलंगाना की फसलों को बचाने के लिए पानी देने का मानवीय और अंतरराज्यीय सहयोग का सवाल है, वहीं दूसरी ओर कर्नाटक के किसानों की अपनी सिंचाई और भविष्य की जल जरूरतें हैं।
सरकार ने अभी तक किसानों के विरोध के बाद अंतिम रूप से यह स्पष्ट नहीं किया है कि पानी की कितनी मात्रा, किस समय और किन शर्तों पर छोड़ी जाएगी। माना जा रहा है कि जलाशयों में उपलब्ध पानी, स्थानीय सिंचाई मांग और आने वाले महीनों की पेयजल जरूरत का आकलन करने के बाद ही अंतिम फैसला लिया जाएगा।
फिलहाल तेलंगाना की मांग पर कर्नाटक का सकारात्मक रुख और विजयपुरा के किसानों का विरोध आमने-सामने है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि राज्य सरकार किसानों की आपत्तियों को कैसे संबोधित करती है और अल्मट्टी तथा नारायणपुर जलाशयों से पानी छोड़ने के प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय क्या लिया जाता है।





