
बेलगावी। कर्नाटक के बेलगावी में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान फॉर्म-7 के जरिए बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाने की मांग को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि अल्पसंख्यक समुदाय के मतदाताओं को निशाना बनाते हुए सामूहिक रूप से नाम हटाने की कोशिश की गई। हालांकि ये आरोप अभी स्थापित नहीं हुए हैं और स्थानीय प्रशासन ने मामले की जांच की बात कही है।
विवाद बेलगावी के वीरभद्र नगर स्थित एक मतदान केंद्र से शुरू हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक दो अज्ञात व्यक्ति वहां पहुंचे और उन्होंने कथित तौर पर खुद को बेलगावी सिटी कॉरपोरेशन से जुड़ा कर्मचारी बताया। आरोप है कि दोनों ने बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) पर करीब 200 फॉर्म-7 आवेदनों पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव बनाया। इन आवेदनों के जरिए मतदाता सूची में दर्ज लोगों के नाम हटाने की मांग की गई थी।
BLO ने इन आवेदनों पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। रिपोर्ट के मुताबिक अधिकारी ने कहा कि जिन मतदाताओं के नाम पर आपत्ति जताई गई है, उनकी मैपिंग और जानकारी का सत्यापन वह पहले ही कर चुकी हैं। दोनों व्यक्तियों पर इन फॉर्मों से जुड़ी पावती की प्रतियां लेने पर जोर देने का भी आरोप है।
घटना सामने आने के बाद स्थानीय कांग्रेस नेताओं ने गंभीर आरोप लगाए। उनका दावा है कि लगभग 200 फॉर्म-7 में जिन मतदाताओं के नाम हटाने की मांग की गई थी, वे मुस्लिम समुदाय से संबंधित थे। कांग्रेस नेताओं ने दोनों व्यक्तियों के एक स्थानीय भाजपा नेता से जुड़े होने का भी आरोप लगाया है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
यूथ कांग्रेस नेता अमान सैत ने मामले में शिकायत दर्ज कराने और कथित तौर पर चुनाव अधिकारियों पर दबाव बनाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। कांग्रेस का आरोप है कि बेलगावी के अन्य हिस्सों में भी BLO पर मतदाताओं के नाम हटाने के लिए दबाव डालने की कोशिश की जा रही है। पार्टी ने पूरे मामले की विस्तृत जांच कराने की मांग की है।
वहीं बेलगावी के उपायुक्त मोहम्मद रोशन ने स्पष्ट किया है कि संबंधित मतदान केंद्र पर मिली आपत्तियों के आधार पर किसी मतदाता का नाम नहीं हटाया गया है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से सामूहिक आपत्तियों को लेकर शिकायतें मिली हैं। प्रशासन पूरे मामले की जांच करेगा और किसी तरह का उल्लंघन पाए जाने पर नियमों के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
फॉर्म-7 मतदाता सूची में किसी नाम को हटाने या किसी प्रस्तावित नाम को शामिल किए जाने पर आपत्ति दर्ज करने के लिए निर्धारित आवेदन है। चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के मुताबिक संबंधित निर्वाचन क्षेत्र में पंजीकृत मतदाता ऐसा आवेदन दे सकता है। नाम हटाने के लिए मृत्यु, कम उम्र, स्थायी रूप से स्थानांतरण, एक से अधिक जगह पंजीकरण या भारतीय नागरिक न होने जैसे निर्धारित कारणों में से एक बताना होता है।
चुनाव आयोग के दिशा-निर्देश यह भी स्पष्ट करते हैं कि आपत्ति में दिए गए आधार को साबित करने की जिम्मेदारी आवेदन करने वाले व्यक्ति की होती है। आवेदन में गलत घोषणा करना दंडनीय हो सकता है। इस कारण केवल फॉर्म-7 जमा हो जाने से किसी मतदाता का नाम अपने आप मतदाता सूची से नहीं हट जाता; संबंधित चुनाव अधिकारी को निर्धारित प्रक्रिया के तहत आपत्ति पर विचार करना होता है।
वीरभद्र नगर का मामला सामने आने के बाद कांग्रेस और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच राजनीतिक तनाव भी बढ़ा है। 22 सितंबर को इसी मतदान केंद्र पर सामूहिक फॉर्म-7 आपत्तियों के आरोपों को लेकर दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के बीच विवाद हुआ था, जिसके बाद पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा।
इस बीच विवाद का दायरा करीब 200 आवेदनों से आगे भी बढ़ गया है। कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष बीके हरिप्रसाद ने आरोप लगाया कि बेलगावी दक्षिण से भाजपा विधायक अभय पाटिल ने चुनाव अधिकारियों को पत्र लिखकर करीब 2,500 मतदाताओं के नामों को लेकर सवाल उठाए थे। कांग्रेस का दावा है कि ये मतदाता अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित हैं।
अभय पाटिल ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि उनके पत्र में केवल बूथ लेवल एजेंट की रिपोर्ट का सत्यापन कराने की मांग की गई थी। पाटिल के मुताबिक उन्होंने चुनाव अधिकारियों से कहा था कि सत्यापन में यदि कोई मतदाता फर्जी पाया जाता है, तभी नियमों के मुताबिक उसका नाम हटाया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि उनके पत्र में किसी समुदाय को निशाना बनाने की बात नहीं थी।
इस तरह मामले में दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं। कांग्रेस इसे अल्पसंख्यक मतदाताओं के नाम सामूहिक रूप से हटाने की कथित कोशिश बता रही है, जबकि भाजपा पक्ष का कहना है कि संदिग्ध मतदाता प्रविष्टियों का नियमों के मुताबिक सत्यापन कराने की मांग की गई है। प्रशासन ने फिलहाल किसी भी पक्ष के आरोपों को अंतिम रूप से सही नहीं ठहराया है।
चुनाव आयोग के आधिकारिक नियमों के मुताबिक मतदाता सूची में किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर आपत्ति करने के लिए फॉर्म-7 का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन आपत्ति करने वाले को निर्धारित आधार और उससे संबंधित जानकारी देनी होती है। चुनाव अधिकारी के स्तर पर सत्यापन और प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही नाम हटाने पर निर्णय लिया जा सकता है।
यही कारण है कि वीरभद्र नगर में एक साथ करीब 200 आवेदन सामने आने का मामला राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गया है। कांग्रेस यह जानना चाहती है कि इतने बड़े पैमाने पर फॉर्म किसने तैयार किए और उनके पीछे आधार क्या था। साथ ही उन दो व्यक्तियों की भूमिका की जांच की मांग की जा रही है, जिन्होंने कथित तौर पर नगर निगम कर्मचारी होने का दावा किया था।
प्रशासन के सामने अब यह पता लगाने की चुनौती है कि फॉर्म-7 आवेदन किसने दाखिल किए, उनमें दर्ज आपत्तियों के लिए क्या प्रमाण दिए गए और मतदान केंद्र पर पहुंचे दोनों व्यक्तियों की वास्तविक पहचान क्या है। इसके साथ ही यह भी जांच का विषय है कि BLO पर किसी तरह का अनुचित दबाव बनाया गया था या नहीं।
फिलहाल प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि विवादित आपत्तियों के आधार पर कोई नाम मतदाता सूची से नहीं हटाया गया है। बेलगावी में SIR और फॉर्म-7 को लेकर राजनीतिक टकराव के बीच अब निगाहें प्रशासनिक जांच पर हैं। जांच के बाद ही स्पष्ट होगा कि सामूहिक आपत्तियां नियमों के तहत दाखिल की गई थीं या प्रक्रिया में किसी तरह की गड़बड़ी हुई थी।





