
बेंगलुरु। कर्नाटक के वित्त विभाग के एक पत्र के लीक होने को लेकर राज्य की राजनीति गरमा गई है। विधानसभा में विपक्ष के नेता और भाजपा के वरिष्ठ नेता आर. अशोक ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने जानबूझकर यह पत्र लीक कराया, ताकि राज्य की मौजूदा वित्तीय स्थिति के लिए पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की सरकार को जिम्मेदार ठहराया जा सके। हालांकि मुख्यमंत्री ने इस आरोप को स्वीकार नहीं किया है और इससे पहले कहा था कि गोपनीय पत्र कैसे बाहर आया, इसकी जांच की जाएगी।
विधान सौधा में शुक्रवार को पत्रकारों से बातचीत करते हुए आर. अशोक ने वित्त विभाग के पत्र को लेकर सरकार पर कई सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि पत्र सार्वजनिक होने के बाद सरकार की वित्तीय स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। अशोक के मुताबिक इतने महत्वपूर्ण और गोपनीय दस्तावेज का सामने आना सामान्य घटना नहीं माना जा सकता।
अशोक ने मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के उस रुख पर भी सवाल उठाया, जिसमें वित्त विभाग की सलाह को प्रशासनिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा बताया गया था। मुख्यमंत्री ने कहा था कि वित्त विभाग द्वारा सरकार को वित्तीय अनुशासन और खर्च को लेकर सलाह देना नियमित प्रक्रिया है और इसे राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए।
वित्त विभाग की ओर से सरकार को भेजे गए नोट में उपलब्ध वित्तीय संसाधनों को ध्यान में रखते हुए खर्च में सावधानी बरतने की सलाह दी गई थी। रिपोर्टों के मुताबिक विभाग ने नए वित्तीय दायित्व लेने से पहले उपलब्ध संसाधनों का वास्तविक आकलन करने और पहले से लंबित परियोजनाओं के खर्च का बोझ नहीं बढ़ाने की बात कही थी।
इसी पत्र को आधार बनाते हुए विपक्ष लगातार राज्य सरकार की वित्तीय स्थिति पर सवाल उठा रहा है। आर. अशोक ने आरोप लगाया कि सरकार पहले ही अपनी उधारी क्षमता पर काफी दबाव डाल चुकी है और नई परियोजनाओं के लिए धन जुटाना मुश्किल हो रहा है। ये विपक्ष के राजनीतिक आरोप हैं; वित्त विभाग के पत्र में खर्च को लेकर सावधानी बरतने और वित्तीय सीमाओं को ध्यान में रखने की सलाह दी गई थी।
आर. अशोक ने शुक्रवार की प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्र लीक होने के समय को लेकर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि जब सिद्धारमैया मुख्यमंत्री थे तब इस तरह के वित्त विभाग के पत्र सार्वजनिक क्यों नहीं हुए। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा समय में पत्र को बाहर लाने का मकसद पिछली सरकार के वित्तीय प्रबंधन को कठघरे में खड़ा करना है।
अशोक ने दावा किया कि मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार यह संदेश देना चाहते हैं कि सिद्धारमैया के कार्यकाल में सरकारी खजाने पर अत्यधिक बोझ डाला गया और नई सरकार के लिए सीमित संसाधन छोड़े गए। उन्होंने इसी आधार पर आरोप लगाया कि पत्र का लीक होना कांग्रेस के भीतर राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है और इसे आर. अशोक के आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
नेता प्रतिपक्ष ने यह सवाल भी उठाया कि क्या सरकार के शीर्ष स्तर की जानकारी के बिना वित्त विभाग का इतना महत्वपूर्ण पत्र सार्वजनिक हो सकता है। उन्होंने दावा किया कि मुख्यमंत्री या शीर्ष प्रशासनिक स्तर की जानकारी के बिना ऐसे गोपनीय दस्तावेज का बाहर आना आसान नहीं है।
दूसरी ओर मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने पत्र लीक होने को गंभीरता से लेने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि यह पता लगाया जाएगा कि वित्त विभाग का गोपनीय पत्र मीडिया तक कैसे पहुंचा। उन्होंने यह भी कहा था कि संबंधित वरिष्ठ अधिकारी के लौटने के बाद मामले पर चर्चा की जाएगी और पत्र लीक करने वाले का पता लगाया जाएगा। यह बयान अशोक के उस आरोप से अलग है जिसमें उन्होंने स्वयं मुख्यमंत्री को पत्र लीक होने के लिए जिम्मेदार बताया है।
वित्त विभाग के पत्र को लेकर विवाद उस समय शुरू हुआ जब राज्य सरकार की वित्तीय स्थिति और नई योजनाओं के लिए उपलब्ध संसाधनों से संबंधित सलाह सामने आई। रिपोर्टों के अनुसार विभाग ने सरकार को खर्च में सावधानी बरतने की सलाह दी और वित्तीय दायित्वों को देखते हुए अतिरिक्त परियोजनाओं पर सोच-समझकर फैसला करने को कहा।
मुख्यमंत्री शिवकुमार ने इस पर कहा था कि वित्त विभाग की सलाह सरकार के हित को ध्यान में रखकर दी गई है। उन्होंने कहा कि वित्त मंत्री के रूप में उन्हें पता है कि किन योजनाओं को जारी रखना है और किन योजनाओं को शुरू करना है। उन्होंने राज्य की पांच गारंटी योजनाओं का भी बचाव किया और कहा कि सरकार किसानों तथा आम लोगों की आजीविका का समर्थन कर रही है।
विपक्ष इस मुद्दे को लेकर विधानसभा के भीतर और बाहर सरकार को घेर रहा है। भाजपा और JDS ने वित्तीय स्थिति को लेकर प्रदर्शन भी किया है। भाजपा नेताओं का दावा है कि वित्त विभाग का पत्र सरकार के वित्तीय प्रबंधन पर सवाल खड़ा करता है, जबकि मुख्यमंत्री ने इन आरोपों को राजनीतिक बताया है।
वित्त विभाग की सलाह में राज्य की मौजूदा वित्तीय परिस्थितियों के साथ सूखे से पैदा होने वाले अतिरिक्त खर्च का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य की देनदारियां सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के 24.94 प्रतिशत तक पहुंचने का उल्लेख किया गया, जबकि संबंधित राजकोषीय सीमा 25 प्रतिशत बताई गई है।
आर. अशोक पहले भी इस पत्र को लेकर सरकार पर निशाना साध चुके हैं। उन्होंने आरोप लगाया था कि राज्य में नई परियोजनाओं के लिए पर्याप्त वित्तीय गुंजाइश नहीं है और सरकार को अपनी घोषणाओं तथा खर्च की प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करना चाहिए। मुख्यमंत्री की ओर से इन आरोपों के जवाब में कहा गया कि सरकार को अपने वित्तीय प्रबंधन और योजनाओं के बारे में निर्णय लेना आता है।
अब विवाद केवल राज्य की वित्तीय स्थिति तक सीमित नहीं है, बल्कि पत्र आखिर सार्वजनिक कैसे हुआ, यह भी राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। अशोक मुख्यमंत्री पर जानबूझकर पत्र लीक कराने का आरोप लगा रहे हैं, जबकि मुख्यमंत्री इससे पहले लीक का पता लगाने की बात कह चुके हैं। फिलहाल ऐसा कोई सार्वजनिक रूप से स्थापित तथ्य सामने नहीं आया है जो यह साबित करे कि पत्र किस व्यक्ति ने लीक किया।
वित्त विभाग के पत्र ने कर्नाटक में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच वित्तीय प्रबंधन को लेकर चल रही बहस को और तेज कर दिया है। भाजपा जहां इसे सरकार की वित्तीय स्थिति पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल कर रही है, वहीं मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार वित्त विभाग की सलाह को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बताते हुए विपक्ष के आरोपों को खारिज कर रहे हैं। अब पत्र लीक होने के स्रोत को लेकर सरकार की जांच या किसी आधिकारिक निष्कर्ष से ही स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी।





