
बेंगलुरु। कर्नाटक में नकली एंटीबायोटिक और ICU में इस्तेमाल होने वाली दवाओं के मामले में विशेष जांच दल (SIT) की जांच से चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। जांच के मुताबिक आरोपियों ने पिछले करीब डेढ़ साल में अस्पतालों और फार्मेसियों को 15 हजार से ज्यादा नकली एंटीबायोटिक इंजेक्शन की शीशियां सप्लाई कीं। ये दवाएं गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण और ICU में भर्ती मरीजों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली महंगी दवाओं की नकल बताई जा रही हैं।
जांच के दौरान बेंगलुरु के बाहरी इलाके बिदादी स्थित एक फार्महाउस में कथित तौर पर गैरकानूनी तरीके से नकली जीवनरक्षक दवाएं तैयार किए जाने का मामला सामने आया। SIT की जांच में पता चला कि आरोपी अलग-अलग राज्यों से सस्ती, घटिया गुणवत्ता वाली या एक्सपायर हो चुकी दवाएं और रसायन जुटाते थे। इसके बाद इन्हें नई बोतलों में भरकर नामी दवा कंपनियों के नकली लेबल लगाकर बाजार में उतारा जाता था।
जांच अधिकारियों के अनुसार, आरोपियों का नेटवर्क केवल कर्नाटक तक सीमित नहीं था। हैदराबाद, चेन्नई और उत्तराखंड से भी कम कीमत वाली दवाओं और रसायनों की खरीद की जाती थी। इसके बाद बिदादी में स्थित ठिकाने पर इनकी दोबारा पैकिंग की जाती थी। तैयार शीशियों पर फाइज़र जैसी वैश्विक कंपनियों के नकली लेबल लगाकर उन्हें असली और महंगी दवा के रूप में पेश किया जाता था।
SIT के मुताबिक पिछले करीब डेढ़ साल में 15 हजार से अधिक नकली एंटीबायोटिक इंजेक्शन की शीशियां अस्पतालों और फार्मेसियों तक पहुंचाई गईं। जांच में यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि ये दवाएं किन-किन अस्पतालों, मेडिकल स्टोर और वितरकों तक पहुंचीं और कितनी मात्रा में मरीजों के उपचार में इस्तेमाल हुईं।
मामले की गंभीरता इस बात से भी बढ़ जाती है कि जिन दवाओं की नकल की जा रही थी, वे सामान्य दवाएं नहीं थीं। इनका इस्तेमाल गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण, जटिल संक्रमण और ICU में भर्ती गंभीर मरीजों के उपचार में किया जाता है। ऐसे मामलों में सही गुणवत्ता और सही मात्रा वाली दवा बेहद महत्वपूर्ण होती है।
जांच एजेंसी को आशंका है कि घटिया या एक्सपायर सामग्री से तैयार नकली इंजेक्शन मरीजों के लिए गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकते थे। यदि किसी मरीज को असली दवा के स्थान पर नकली या कम प्रभावी दवा दी गई हो तो इलाज का असर प्रभावित होने की आशंका रहती है।
आरोपियों की कमाई को लेकर भी SIT ने बड़ा खुलासा किया है। जांच के अनुसार नकली इंजेक्शन की एक शीशी को करीब 5,500 रुपये से 6,500 रुपये तक में बेचा जाता था। बाजार में महंगी जीवनरक्षक दवाओं की कीमत का फायदा उठाते हुए आरोपियों ने नकली दवाओं को असली बताकर ऊंचे दाम पर सप्लाई किया।
SIT के अनुसार आरोपियों ने पिछले कुछ महीनों में ही इस कारोबार से 10 करोड़ रुपये से ज्यादा का मुनाफा कमाया। जांच एजेंसी अब पैसों के लेनदेन, बैंक खातों, नकद भुगतान और सप्लाई नेटवर्क की भी जांच कर रही है, ताकि पूरे गिरोह की आर्थिक श्रृंखला का पता लगाया जा सके।
फार्महाउस से दवा तैयार करने और पैकिंग में इस्तेमाल होने वाली सामग्री भी बरामद होने की बात सामने आई है। जांच अधिकारी यह पता लगा रहे हैं कि इस अवैध यूनिट में कितने लोग काम करते थे और नकली दवा बनाने की प्रक्रिया में कौन-कौन शामिल था।
इसके अलावा आरोपियों को खाली शीशियां, लेबल, पैकिंग सामग्री और अन्य सामान उपलब्ध कराने वालों की भी पहचान की जा रही है। SIT का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर नकली दवा बाजार तक पहुंचाने के लिए सप्लाई और वितरण का एक व्यवस्थित नेटवर्क सक्रिय रहा होगा।
जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी है कि नकली दवाएं किन चैनलों के जरिए अस्पताल और फार्मेसियों तक पहुंचाई गईं। सामान्य तौर पर अस्पतालों और मेडिकल स्टोर में दवाएं अधिकृत वितरकों या सप्लायरों के माध्यम से आती हैं। ऐसे में SIT यह जांच कर रही है कि क्या किसी अधिकृत सप्लाई चैनल का दुरुपयोग किया गया या नकली बिल और दस्तावेज तैयार किए गए।
दवाओं के बैच नंबर, पैकेजिंग और लेबल की भी जांच की जा रही है। आरोपियों पर नामी कंपनियों के उत्पादों जैसी पैकिंग तैयार करने का आरोप है, ताकि खरीदार पहली नजर में असली और नकली दवा में अंतर न कर सकें।
इस मामले के सामने आने के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों की चिंता भी बढ़ी है। यदि 15 हजार से ज्यादा नकली इंजेक्शन पहले ही सप्लाई हो चुके हैं, तो यह पता लगाना बेहद जरूरी हो गया है कि इनमें से कितनी शीशियां अभी भी बाजार में मौजूद हैं।
जांच एजेंसियां उन अस्पतालों और फार्मेसियों की पहचान करने की कोशिश कर रही हैं, जहां ये दवाएं पहुंची थीं। जरूरत पड़ने पर संबंधित स्टॉक को जब्त कर जांच के लिए भेजा जा सकता है।
नकली दवाओं का कारोबार न केवल आर्थिक अपराध है, बल्कि यह मरीजों के जीवन से भी जुड़ा गंभीर मामला है। खासकर ICU में भर्ती मरीज पहले ही गंभीर स्थिति में होते हैं। ऐसी स्थिति में नकली या घटिया गुणवत्ता वाली दवा का इस्तेमाल उपचार को प्रभावित कर सकता है।
SIT अब पूरे नेटवर्क के स्रोत से लेकर अंतिम खरीदार तक की कड़ी जोड़ने में जुटी है। हैदराबाद, चेन्नई और उत्तराखंड से खरीदी गई सामग्री के रिकॉर्ड भी खंगाले जा रहे हैं। साथ ही यह पता किया जा रहा है कि एक्सपायर दवाओं को आरोपियों तक किसने पहुंचाया।
मामले में शामिल लोगों की गिरफ्तारी और पूछताछ से आगे और नाम सामने आने की संभावना है। जांच एजेंसी आरोपियों के मोबाइल फोन, डिजिटल रिकॉर्ड और बैंक लेनदेन की भी पड़ताल कर रही है।
फिलहाल SIT की जांच से यह सामने आया है कि नकली एंटीबायोटिक इंजेक्शन का कारोबार बड़े स्तर पर चल रहा था। 15 हजार से अधिक शीशियों की सप्लाई और 10 करोड़ रुपये से ज्यादा के कथित मुनाफे ने इस मामले को और गंभीर बना दिया है।
अब जांच का सबसे अहम हिस्सा यह पता लगाना है कि इन नकली दवाओं से कितने अस्पताल और मरीज प्रभावित हुए और इस नेटवर्क में किन-किन लोगों की भूमिका रही। SIT पूरे मामले की जांच आगे बढ़ा रही है और आने वाले दिनों में इस अवैध दवा कारोबार से जुड़े और खुलासे हो सकते हैं।





