कर्नाटक

रात में तमिलनाडु के लिए कावेरी का पानी छोड़े जाने पर भड़का आक्रोश

Kavita2
11 Sept 2026 11:42 AM IST
रात में तमिलनाडु के लिए कावेरी का पानी छोड़े जाने पर भड़का आक्रोश
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मांड्या : जिले में कावेरी नदी का पानी तमिलनाडु के लिए छोड़े जाने के बाद तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गई है। स्थानीय किसानों और विभिन्न संगठनों ने कर्नाटक सरकार के फैसले पर नाराजगी जताई है। लोगों का आरोप है कि सरकार ने रात के समय चुपचाप बड़ी मात्रा में पानी छोड़ा। इस घटनाक्रम के बाद जिले के कई हिस्सों में विरोध के स्वर तेज हो गए हैं और किसान सरकार से तत्काल पानी का प्रवाह रोकने की मांग कर रहे हैं।

विवाद की मुख्य वजह कावेरी जल नियंत्रण समिति और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण का नया निर्देश बताया जा रहा है। इस निर्देश के तहत कर्नाटक को लगातार 15 दिनों तक प्रतिदिन तमिलनाडु के लिए 6,000 क्यूसेक पानी छोड़ना होगा। आदेश का पालन करते हुए पानी छोड़े जाने की सूचना सामने आते ही कावेरी बेसिन के किसानों में गुस्सा फैल गया।

मांड्या कर्नाटक का प्रमुख कृषि क्षेत्र है और यहां बड़ी संख्या में किसान सिंचाई के लिए कावेरी नदी तथा उससे जुड़े जलाशयों पर निर्भर हैं। धान और गन्ने सहित विभिन्न फसलों के लिए पर्याप्त पानी की जरूरत होती है। ऐसे समय में तमिलनाडु को पानी दिए जाने की सूचना ने स्थानीय किसानों की चिंता बढ़ा दी है। उनका कहना है कि पहले राज्य के किसानों और आम लोगों की आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

किसानों का आरोप है कि सरकार ने पानी छोड़े जाने के बारे में पहले स्पष्ट जानकारी नहीं दी। रात के समय जल प्रवाह बढ़ाए जाने को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि कावेरी से संबंधित कोई भी निर्णय पारदर्शी तरीके से लिया जाना चाहिए और इससे प्रभावित होने वाले किसानों को पूरी जानकारी दी जानी चाहिए।

कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी जल बंटवारे का मुद्दा लंबे समय से संवेदनशील रहा है। वर्षा में कमी या जलाशयों का स्तर घटने पर दोनों राज्यों के बीच विवाद और तेज हो जाता है। तमिलनाडु अपनी सिंचाई जरूरतों के लिए निर्धारित मात्रा में पानी छोड़ने की मांग करता है जबकि कर्नाटक के किसान राज्य की फसलों और पेयजल आवश्यकताओं का हवाला देते हुए पानी रोकने की मांग करते हैं।

कावेरी जल नियंत्रण समिति और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण नदी के पानी के प्रवाह और बंटवारे से जुड़े मामलों की निगरानी करते हैं। वर्तमान निर्देश के अनुसार कर्नाटक को 15 दिनों तक प्रतिदिन 6,000 क्यूसेक पानी उपलब्ध कराना है। इस तरह लगातार पानी छोड़े जाने से राज्य के जलाशयों में उपलब्ध भंडार पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

स्थानीय किसानों का कहना है कि राज्य सरकार को प्राधिकरण के सामने कर्नाटक की वास्तविक जल स्थिति को मजबूती से रखना चाहिए। उनका दावा है कि यदि पर्याप्त वर्षा नहीं हुई या जलाशयों में अपेक्षित जल संग्रह नहीं हुआ तो आने वाले दिनों में सिंचाई के लिए पानी की कमी हो सकती है। इससे खड़ी फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।

प्रदर्शनकारियों ने सरकार से मांग की है कि वह जलाशयों में उपलब्ध पानी सिंचाई की आवश्यकता और पेयजल की संभावित मांग का विस्तृत आकलन करे। किसानों का कहना है कि तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ने से पहले यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कावेरी बेसिन के किसानों को पर्याप्त पानी मिल सके। उन्होंने सभी संबंधित आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग भी की है।

मांड्या में पैदा हुई स्थिति को देखते हुए प्रशासन भी सतर्क हो गया है। कावेरी जल विवाद का इस क्षेत्र में व्यापक राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव रहा है। पानी छोड़े जाने के हर निर्णय पर किसान संगठनों और राजनीतिक दलों की पैनी नजर रहती है। ऐसे में विरोध बढ़ने पर प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो सकती है।

किसानों का गुस्सा इस बात को लेकर भी है कि पानी छोड़ने की प्रक्रिया रात में शुरू की गई। उनका कहना है कि यदि सरकार को आदेश का पालन करना ही था तो इसके बारे में आधिकारिक रूप से जानकारी देनी चाहिए थी। हालांकि पानी छोड़े जाने को लेकर सरकार की विस्तृत प्रतिक्रिया और उपलब्ध जल भंडार से जुड़े आधिकारिक आंकड़े सामने आने के बाद स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी।

कावेरी विवाद में दोनों राज्यों की कृषि आवश्यकताएं अहम हैं। तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा क्षेत्र के किसान भी खेती के लिए नदी के पानी पर निर्भर हैं। वहीं कर्नाटक के मांड्या और आसपास के क्षेत्रों में किसानों की आजीविका इसी जल प्रणाली से जुड़ी हुई है। इसलिए पानी की कमी वाले वर्षों में किसी एक पक्ष के हितों को प्राथमिकता देने का आरोप विवाद को और गंभीर बना देता है।

विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे विवादों के समाधान के लिए जलाशयों में उपलब्ध पानी वर्षा की स्थिति फसलों की आवश्यकता और पेयजल मांग का नियमित आकलन जरूरी है। संबंधित प्राधिकरणों के निर्देशों के साथ राज्यों के बीच संवाद बनाए रखना भी आवश्यक है। पानी छोड़ने की प्रक्रिया और उससे जुड़े आंकड़ों में पारदर्शिता रहने से लोगों की आशंकाओं को कम किया जा सकता है।

मांड्या के किसान अब राज्य सरकार के अगले कदम का इंतजार कर रहे हैं। उनकी मांग है कि सरकार कावेरी जल नियंत्रण समिति और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण के सामने राज्य का पक्ष मजबूती से रखे। किसान संगठनों ने संकेत दिया है कि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो विरोध तेज हो सकता है।

फिलहाल प्रतिदिन 6,000 क्यूसेक पानी छोड़ने का निर्देश कर्नाटक सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। एक तरफ प्राधिकरण के आदेश का पालन करने का दबाव है तो दूसरी ओर राज्य के किसानों का आक्रोश बढ़ रहा है। आने वाले दिनों में सरकार की रणनीति और जलाशयों की वास्तविक स्थिति यह तय करेगी कि विवाद शांत होता है या आंदोलन और व्यापक रूप लेता है।

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