
बेंगलुरु। कर्नाटक के काली टाइगर रिजर्व के इको-सेंसिटिव जोन (ESZ) में करीब 25 साल पहले कानूनों का उल्लंघन करते हुए पत्थर की खदान को मंजूरी देने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की तैयारी शुरू हो गई है। केंद्रीय स्तर की एक समिति ने इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए हैं।
यह मामला पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) के तहत वन सलाहकार समिति (Forest Advisory Committee) के सामने आया था। समिति न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) की ओर से दिए गए दो प्रस्तावों की जांच कर रही थी। इन प्रस्तावों में उत्तर कन्नड़ जिले के कारवार तालुक में कुल 9.71 एकड़ वन भूमि के अनधिकृत उपयोग परिवर्तन के लिए एक्स-पोस्ट फैक्टो यानी बाद में मंजूरी मांगी गई थी।
प्रस्तावित भूमि में 9.14 एकड़ क्षेत्र में पत्थर की खदान और 0.57 एकड़ क्षेत्र में खदान तक पहुंचने के लिए अप्रोच रोड का निर्माण शामिल था। जांच के दौरान समिति ने पाया कि यह कार्य आवश्यक मंजूरी प्रक्रिया का पालन किए बिना किया गया था।
मामला वर्ष 1999 का है, जब NPCIL को कैगा स्थित परमाणु ऊर्जा परियोजना में 2X700 मेगावाट क्षमता वाले न्यूक्लियर रिएक्टरों के निर्माण और संचालन के लिए पत्थर के एग्रीगेट की आवश्यकता थी। इसी जरूरत को पूरा करने के लिए पत्थर की खदान का इस्तेमाल किया गया।
हालांकि, इससे पहले वर्ष 1994 में वन भूमि के डायवर्जन को लेकर खदान लीज के लिए मंजूरी दी गई थी। लेकिन खदान की लीज अवधि वर्ष 1999 में समाप्त हो गई। इसके बाद NPCIL ने लीज के नवीनीकरण का अनुरोध किया था, लेकिन वन भूमि के डायवर्जन की मंजूरी का नवीनीकरण नहीं किया गया।
इसके बावजूद खदान गतिविधियां जारी रहने का मामला सामने आया, जिसे नियमों का उल्लंघन माना गया। वन सलाहकार समिति ने इस पूरे मामले की समीक्षा के बाद कहा कि वन संरक्षण कानूनों के तहत जरूरी प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए था।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में इस बात पर चिंता जताई कि पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र में बिना उचित अनुमति के गतिविधियां संचालित की गईं। काली टाइगर रिजर्व क्षेत्र जैव विविधता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है और यहां किसी भी तरह की गतिविधि के लिए कड़े नियम लागू होते हैं।
काली टाइगर रिजर्व पश्चिमी घाट के महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों में शामिल है। यह क्षेत्र बाघों, हाथियों और कई अन्य वन्यजीव प्रजातियों का प्राकृतिक आवास है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे क्षेत्रों में खनन जैसी गतिविधियों का वन्यजीवन और पारिस्थितिकी पर असर पड़ सकता है।
केंद्रीय समिति ने संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच करने और जिम्मेदार पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। समिति का मानना है कि भविष्य में इस तरह के उल्लंघनों को रोकने के लिए जवाबदेही तय करना जरूरी है।
NPCIL की ओर से मांगी गई एक्स-पोस्ट फैक्टो मंजूरी का मामला भी अब जांच के दायरे में है। इस तरह की मंजूरी आमतौर पर उन मामलों में मांगी जाती है, जहां किसी परियोजना का काम शुरू हो चुका होता है और बाद में उसे नियमित करने का प्रयास किया जाता है।
पर्यावरण मंत्रालय और संबंधित विभाग अब इस मामले में आगे की प्रक्रिया पर काम कर रहे हैं। अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने के साथ-साथ यह भी देखा जा रहा है कि वन क्षेत्र को हुए नुकसान और नियमों के उल्लंघन की भरपाई किस तरह की जाए।
इस मामले ने एक बार फिर वन क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज कर दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं के लिए भी पर्यावरणीय नियमों का पालन जरूरी है।
फिलहाल काली टाइगर रिजर्व के इको-सेंसिटिव जोन में खदान संचालन से जुड़े इस पुराने मामले में कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हो गई है। आने वाले समय में यह तय होगा कि किन अधिकारियों पर कार्रवाई की जाती है और वन क्षेत्र की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।





