कर्नाटक

सड़क हादसे में ब्रेन-डेड हुआ इकलौता बेटा, माता-पिता ने अंगदान कर पेश की मिसाल

Kavita2
19 Sept 2026 10:37 AM IST
सड़क हादसे में ब्रेन-डेड हुआ इकलौता बेटा, माता-पिता ने अंगदान कर पेश की मिसाल
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मैसूर। कर्नाटक के मैसूर जिले में एक परिवार ने अपने इकलौते बेटे को खोने के गहरे दुख के बीच अंगदान का फैसला कर कई जरूरतमंद मरीजों के लिए उम्मीद पैदा की। मुदालाहुंडी गांव के रहने वाले शिवमाडु और लक्ष्मम्मा के 19 वर्षीय बेटे भरत कुमार सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। अस्पताल में इलाज के दौरान उन्हें ब्रेन-डेड घोषित किए जाने के बाद माता-पिता ने उनके अंग दान करने की सहमति दी।

भरत कुमार फल का कारोबार करते थे और अपने माता-पिता के इकलौते बेटे थे। परिवार के मुताबिक 8 सितंबर की दोपहर भरत मैसूर से अपने गांव की ओर दोपहिया वाहन से जा रहे थे। इसी दौरान मैसूर-बन्नूर रोड पर थांतिकुल्लू के पास एक मोड़ पर उनका वाहन कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) की बस से टकरा गया।

बताया जा रहा है कि बस मलावली से मैसूर की ओर जा रही थी। टक्कर इतनी तेज थी कि भरत दोपहिया वाहन से सड़क पर गिर गए और उनके सिर में गंभीर चोटें आईं। हादसा होते ही आसपास मौजूद लोग मदद के लिए पहुंचे। गंभीर हालत को देखते हुए उन्हें तत्काल एक निजी अस्पताल ले जाया गया।

अस्पताल पहुंचने के बाद डॉक्टरों ने भरत को इंटेंसिव केयर यूनिट (ICU) में भर्ती किया। सिर में गंभीर चोट होने के कारण उनकी स्थिति शुरुआत से ही नाजुक बनी हुई थी। डॉक्टर लगातार उनकी हालत की निगरानी कर रहे थे और जीवन बचाने के लिए आवश्यक उपचार दिया जा रहा था।

परिवार के अनुसार डॉक्टरों ने इलाज के पहले ही दिन माता-पिता को बताया था कि भरत के मस्तिष्क की कार्यप्रणाली गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है और उनके बचने की संभावना बेहद कम है। इसके बावजूद माता-पिता को उम्मीद थी कि उनका बेटा उपचार का असर दिखाएगा और उसकी हालत में सुधार होगा।

इसी उम्मीद के सहारे परिवार ने करीब एक सप्ताह तक भरत का इलाज जारी रखा। माता-पिता अस्पताल में बेटे के स्वस्थ होने का इंतजार करते रहे, लेकिन उसकी हालत में अपेक्षित सुधार नहीं आया। चिकित्सकीय परीक्षणों और निर्धारित प्रक्रिया के बाद भरत को ब्रेन-डेड घोषित किया गया।

ब्रेन डेथ की जानकारी मिलने के बाद परिवार के सामने बेहद कठिन फैसला था। जिस बेटे के ठीक होकर घर लौटने की वे कई दिनों से उम्मीद लगाए बैठे थे, उसके वापस लौटने की संभावना समाप्त हो चुकी थी। इसी दौरान परिवार को अंगदान के बारे में जानकारी दी गई।

शिवमाडु और लक्ष्मम्मा ने अपने इकलौते बेटे की मौत के दुख के बावजूद उसके अंग दान करने की सहमति दी। परिवार का निर्णय इस सोच से प्रेरित था कि भरत भले ही उनके बीच वापस नहीं आ सकता, लेकिन उसके अंग किसी दूसरे जरूरतमंद व्यक्ति को नया जीवन दे सकते हैं।

अंगदान की सहमति मिलने के बाद अस्पताल प्रशासन और संबंधित प्रत्यारोपण टीम ने निर्धारित चिकित्सकीय प्रक्रिया शुरू की। ब्रेन-डेड व्यक्ति से अंगदान के मामले में कई मेडिकल जांच की जाती हैं। अंगों की स्थिति, संभावित प्राप्तकर्ता से मिलान और प्रत्यारोपण की समय-सीमा जैसे पहलुओं को ध्यान में रखते हुए पूरी प्रक्रिया को समन्वित किया जाता है।

भरत के माता-पिता का फैसला इसलिए भी भावुक करने वाला है क्योंकि वह उनका इकलौता बेटा था। महज 19 वर्ष की उम्र में हुई दुर्घटना ने परिवार की जिंदगी बदल दी। इसके बावजूद माता-पिता ने अपने व्यक्तिगत दुख के बीच ऐसा निर्णय लिया जिससे दूसरे परिवारों के मरीजों को जीवन की नई उम्मीद मिल सकती है।

सड़क हादसे के संबंध में भी जांच की जा रही है। हादसा मैसूर-बन्नूर रोड पर थांतिकुल्लू के पास हुआ था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार मलावली से मैसूर जा रही KSRTC बस और भरत के दोपहिया वाहन के बीच टक्कर हुई। दुर्घटना किन परिस्थितियों में हुई और इसमें किस पक्ष की क्या भूमिका थी, यह पुलिस जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।

सिर्फ बस से टक्कर होने के आधार पर चालक की गलती मान लेना उचित नहीं होगा। मोड़ पर वाहनों की स्थिति, गति, सड़क की परिस्थिति और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान जैसे तथ्यों के आधार पर दुर्घटना की वास्तविक वजह निर्धारित की जाएगी।

भारत में अंगदान को लेकर जागरूकता लगातार बढ़ रही है। ब्रेन डेथ की स्थिति में निर्धारित कानूनी और चिकित्सकीय प्रक्रिया पूरी होने के बाद परिवार की सहमति से अंगदान संभव होता है। एक पात्र अंगदाता के अलग-अलग अंग कई गंभीर मरीजों के जीवन को बचाने या उनकी जिंदगी की गुणवत्ता बेहतर करने में मदद कर सकते हैं।

ब्रेन डेथ और कोमा में भी अंतर होता है। ब्रेन डेथ में मस्तिष्क और ब्रेन स्टेम के सभी कार्य स्थायी रूप से बंद हो जाते हैं और इसे निर्धारित चिकित्सकीय परीक्षणों के बाद प्रमाणित किया जाता है। वेंटिलेटर की मदद से कुछ समय तक हृदय की धड़कन और दूसरे अंगों में रक्त प्रवाह बनाए रखा जा सकता है, जिससे प्रत्यारोपण योग्य अंगों को सुरक्षित रखने का अवसर मिलता है।

भरत के मामले में उनके कौन-कौन से अंग दान किए गए और उनसे कितने मरीजों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा, इसकी विस्तृत आधिकारिक जानकारी उपलब्ध होने पर ही संख्या स्पष्ट होगी। ऐसे में बिना पुष्टि के किसी निश्चित संख्या या अंगों का उल्लेख करना उचित नहीं होगा।

इस घटना ने सड़क सुरक्षा का मुद्दा भी एक बार फिर सामने रखा है। दोपहिया वाहन चालकों के लिए हेलमेट का सही तरीके से इस्तेमाल, नियंत्रित गति और मोड़ तथा चौराहों पर अतिरिक्त सतर्कता गंभीर चोट के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

भरत कुमार की दुर्घटना ने जहां उनके माता-पिता से उनका इकलौता बेटा छीन लिया, वहीं परिवार के अंगदान के फैसले ने दूसरों के जीवन में उम्मीद की संभावना पैदा की। शिवमाडु और लक्ष्मम्मा का यह निर्णय व्यक्तिगत दुख के बीच मानवीय संवेदना का उदाहरण बनकर सामने आया है।

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