
बेंगलुरु: सुप्रीम कोर्ट ने लोकायुक्त में भ्रष्टाचार के मामले में IPS अधिकारी श्रीनाथ जोशी एम को दी गई अग्रिम जमानत (anticipatory bail) को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा जुटाई गई सामग्री की गहन जांच जरूरी थी, इसलिए कर्नाटक हाई कोर्ट का उन्हें अग्रिम जमानत देकर हिरासत में पूछताछ (custodial interrogation) की संभावना को पूरी तरह खत्म कर देना उचित नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "प्रतिवादी (respondent) एक पुलिस अधीक्षक (SP) हैं। उन पर लोकायुक्त में अपने पद का दुरुपयोग करने के गंभीर आरोप लगे हैं। चूंकि लोकायुक्त की स्थापना का मुख्य उद्देश्य ही भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना है, इसलिए प्रतिवादी पर खुद ऐसे भ्रष्टाचार में शामिल होने का आरोप लगना एक गंभीर विषय है, जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए।"
सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा, "जोशी की तुलना किसी आम नागरिक से नहीं की जा सकती, जो किसी आपराधिक मामले में आरोपी बनाए जाने या जांच/गिरफ्तारी से बचने के लिए सुरक्षा मांगता है।"
कर्नाटक लोकायुक्त पुलिस ने कर्नाटक हाई कोर्ट के 1 सितंबर, 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें लोकायुक्त (बेंगलुरु डिवीजन) के पूर्व पुलिस अधीक्षक जोशी को अग्रिम जमानत दी गई थी। इस आपराधिक अपील को स्वीकार करते हुए, सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ (जिसमें जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा शामिल थे) ने जोशी को 29 अक्टूबर के इस आदेश के तीन सप्ताह के भीतर लोकायुक्त पुलिस के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें नियमित जमानत (regular bail) के लिए आवेदन करने की छूट भी दी है।





