कर्नाटक

बारिश के बदलते पैटर्न से कर्नाटक की खेती को बढ़ावा मिल रहा

Subhi
5 Nov 2026 8:34 AM IST
बारिश के बदलते पैटर्न से कर्नाटक की खेती को बढ़ावा मिल रहा
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बेंगलुरु: यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (UAS), बेंगलुरु के एक अध्ययन के अनुसार, पश्चिमी घाट में बारिश के बदलते पैटर्न के कारण कर्नाटक के आंतरिक इलाकों में बारिश बढ़ी है, जिससे कृषि और बागवानी को फायदा हुआ है। वहीं, तटीय इलाकों और पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढलानों पर बारिश में कमी देखी गई है।

एग्रोमेटियोरोलॉजी (कृषि-मौसम विज्ञान) वैज्ञानिक डॉ. एमबी राजेगौड़ा द्वारा प्रस्तुत इस अध्ययन में राज्य की जलवायु और बारिश के वितरण में आए बदलावों और कृषि पर उनके असर की जांच की गई। इसमें पाया गया कि 1900 से 2020 के बीच कर्नाटक का औसत तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है। राज्य में औसत वार्षिक बारिश भी 1901–1950 के दौरान 1,140 मिमी से बढ़कर 1950–2008 के दौरान 1,208 मिमी हो गई।

हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों में बारिश में अलग-अलग तरह के बदलाव देखे गए। तटीय इलाकों में वार्षिक बारिश 4,500 मिमी से घटकर 4,000 मिमी रह गई, जबकि पश्चिमी घाट में यह 4,010 मिमी से घटकर 3,680 मिमी हो गई। इसके विपरीत, उत्तरी आंतरिक कर्नाटक में बारिश 640 मिमी से बढ़कर 740 मिमी हो गई, और दक्षिणी आंतरिक कर्नाटक में यह 685 मिमी से बढ़कर 836 मिमी हो गई।

इन बदलावों के कारणों को समझाते हुए, अध्ययन में बताया गया है कि बारिश के वितरण में आए इस बदलाव के पीछे आंशिक रूप से 'ओरोग्राफिक इफेक्ट' (पर्वतों के कारण होने वाला प्रभाव) है। हिंद महासागर से उठने वाले मानसूनी बादल अरब सागर के रास्ते पश्चिमी तट पर पहुंचते हैं। इनमें से लगभग 75% बादल तटीय इलाकों और पश्चिमी घाट के पास बरस जाते हैं, जबकि बाकी 25% बादल पर्वत श्रृंखला को पार करके कर्नाटक के आंतरिक इलाकों की ओर बढ़ जाते हैं।

अध्ययन के अनुसार, जमीन और वायुमंडल के बढ़ते तापमान का असर बादलों के घनत्व और उनकी आवाजाही पर पड़ता है। इससे बादल पश्चिमी घाट के पूर्वी हिस्से की ओर धकेल दिए जाते हैं, जहां वे आंतरिक इलाकों में बारिश का कारण बनते हैं।

इस अध्ययन में पश्चिमी घाट के जंगलों के घनत्व पर औद्योगीकरण, शहरीकरण, कृषि के विस्तार, सड़क निर्माण, छोटी जलविद्युत परियोजनाओं और पर्यटन के पड़ने वाले प्रभावों को भी रेखांकित किया गया है। इसमें बताया गया है कि केंद्र द्वारा गठित गाडगिल और कस्तूरीरंगन समितियों ने इस क्षेत्र में जैव विविधता, पर्यावरणीय स्थितियों और विकास कार्यों का अध्ययन किया था।

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