
बेंगलुरु। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के महत्वाकांक्षी हेब्बल से सिल्क बोर्ड ट्विन टनल रोड प्रोजेक्ट के सामने नई कानूनी चुनौती खड़ी हो सकती है। पर्यावरण विशेषज्ञों ने आरोप लगाया है कि परियोजना के लिए हेब्बल झील की जमीन के इस्तेमाल की अनुमति सुप्रीम कोर्ट के जल निकायों और वेटलैंड्स के संरक्षण से जुड़े निर्देशों तथा लागू पर्यावरणीय नियमों के अनुरूप नहीं है। विशेषज्ञ इस मामले को अदालत में ले जाने की तैयारी कर रहे हैं।
बेंगलुरु डेवलपमेंट अथॉरिटी यानी बीडीए को कर्नाटक टैंक कंजर्वेशन एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी से हेब्बल झील की करीब 3.45 एकड़ जमीन इस्तेमाल करने की अनुमति मिली है। यह जमीन हेब्बल से सिल्क बोर्ड तक प्रस्तावित ट्विन टनल रोड परियोजना के लिए उपयोग की जानी है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल केटीसीडीए की मंजूरी को पर्याप्त नहीं माना जा सकता और वेटलैंड से जुड़े अन्य सक्षम प्राधिकरणों की अनुमति भी जरूरी हो सकती है।
हेब्बल झील बेंगलुरु के महत्वपूर्ण जल निकायों में शामिल है। ऐसे में इसकी जमीन को सड़क परियोजना के लिए इस्तेमाल किए जाने की योजना ने पर्यावरणीय चिंताएं बढ़ा दी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि शहर की झीलें केवल जल संग्रहण का साधन नहीं हैं, बल्कि वे भूजल पुनर्भरण, बारिश के पानी के प्रबंधन, जैव विविधता और स्थानीय तापमान को संतुलित रखने में भी भूमिका निभाती हैं।
भारतीय विज्ञान संस्थान के सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज के प्रोफेसर टी.वी. रामचंद्र ने सवाल उठाया है कि परियोजना के लिए कर्नाटक वेटलैंड अथॉरिटी की अनुमति क्यों नहीं ली गई। उनका कहना है कि मामला राज्य वेटलैंड अथॉरिटी के साथ आगे सक्षम राष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं के समक्ष भी रखा जाना चाहिए था। उन्होंने दावा किया कि मौजूदा प्रक्रिया वेटलैंड संरक्षण नियमों और अदालत के निर्देशों के अनुरूप नहीं है। यह विशेषज्ञ का आरोप है, जिस पर परियोजना से जुड़ी एजेंसियों का अलग पक्ष है।
कर्नाटक वेटलैंड अथॉरिटी के अधिकारियों के अनुसार इस परियोजना की अनुमति के लिए उनके पास कोई फाइल नहीं भेजी गई। वहीं केटीसीडीए के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि हेब्बल झील के डाउनस्ट्रीम हिस्से की जमीन का भूमिगत परियोजना के लिए इस्तेमाल करने की सशर्त अनुमति दी गई थी। अधिकारी के मुताबिक बीडीए से पहले अतिरिक्त स्पष्टीकरण भी मांगा गया था।
बीडीए ने पहली बार 29 जून 2026 को केटीसीडीए से संपर्क किया था। इसके बाद 17 जुलाई को दूसरी बार पत्राचार हुआ और 23 जुलाई को प्राधिकरण की ओर से मंजूरी दी गई। बीडीए अधिकारियों का कहना है कि केटीसीडीए से मिली अनुमति पर्याप्त है और इसी आधार पर परियोजना को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया की जा रही है।
दूसरी ओर पर्यावरण विशेषज्ञों का तर्क है कि झील और उसके आसपास के हिस्सों पर किसी भी निर्माण गतिविधि से पहले वेटलैंड संबंधी सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट भी पूर्व मामलों में बेंगलुरु के जल निकायों और झीलों के आसपास संरक्षण और बफर व्यवस्था को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश दे चुका है। 2019 के एक फैसले में अदालत ने झीलों और वेटलैंड्स के संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर विस्तृत विचार किया था।
वेटलैंड संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2025 में भी राज्यों और वेटलैंड अथॉरिटीज को जल निकायों की पहचान और संरक्षण की दिशा में सक्रिय कदम उठाने को कहा था। अदालत के आदेश में छोटे वेटलैंड्स की पहचान और उनके संरक्षण की प्रक्रिया पर भी जोर दिया गया था।
विशेषज्ञों का दावा है कि कर्नाटक में हजारों जल निकाय ऐसे हैं, जिन्हें वेटलैंड संरक्षण के दायरे में देखने की जरूरत है। हेब्बल झील से जुड़ा मौजूदा विवाद इसी व्यापक मुद्दे को फिर से सामने ला रहा है। पर्यावरणविदों का आरोप है कि कई जल निकायों की सीमाओं, बफर जोन और प्राकृतिक जल प्रवाह को विकास परियोजनाओं के कारण दबाव का सामना करना पड़ रहा है।
ट्विन टनल रोड परियोजना का उद्देश्य बेंगलुरु में यातायात का दबाव कम करना बताया जा रहा है। हेब्बल से सिल्क बोर्ड तक प्रस्तावित कॉरिडोर शहर के सबसे व्यस्त यातायात मार्गों को जोड़ने की योजना का हिस्सा है। सरकार इसे बेंगलुरु की ट्रैफिक समस्या के समाधान के प्रमुख प्रोजेक्ट के रूप में आगे बढ़ा रही है।
हालांकि इस परियोजना के अलग-अलग हिस्सों को लेकर पहले भी पर्यावरणीय सवाल सामने आए हैं। हेब्बल से जुड़े एक छोटे टनल प्रोजेक्ट के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई के प्रस्ताव का भी विरोध हो चुका है और उस मुद्दे पर कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। पर्यावरण समूहों का कहना है कि बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले यातायात लाभ के साथ उनके पारिस्थितिक प्रभाव का भी विस्तृत अध्ययन होना चाहिए।
हेब्बल झील की 3.45 एकड़ जमीन के इस्तेमाल का मुद्दा अब ट्विन टनल परियोजना के लिए एक नई चुनौती बनता दिख रहा है। यदि पर्यावरण विशेषज्ञ अदालत का रुख करते हैं तो बीडीए और राज्य सरकार को यह स्पष्ट करना पड़ सकता है कि परियोजना के लिए आवश्यक सभी पर्यावरणीय और वेटलैंड संबंधी अनुमतियां ली गई हैं या नहीं।
फिलहाल बीडीए का पक्ष है कि केटीसीडीए की मंजूरी परियोजना के लिए पर्याप्त है, जबकि विशेषज्ञ इससे सहमत नहीं हैं। ऐसे में मामला प्रशासनिक मंजूरी से आगे कानूनी परीक्षण तक पहुंच सकता है।
बेंगलुरु जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहर के लिए यातायात और पर्यावरण दोनों बड़ी चुनौतियां हैं। एक ओर सरकार ट्रैफिक कम करने के लिए टनल और फ्लाईओवर जैसी परियोजनाओं पर जोर दे रही है, वहीं दूसरी ओर जल निकायों और हरित क्षेत्रों के संरक्षण की मांग लगातार मजबूत हो रही है।
अब हेब्बल झील की जमीन को लेकर उठे सवालों के बाद ट्विन टनल रोड परियोजना की अगली प्रक्रिया पर नजर रहेगी। अदालत में मामला पहुंचने की स्थिति में परियोजना के लिए मिली मंजूरियों, वेटलैंड नियमों और झील संरक्षण से जुड़े प्रावधानों की विस्तृत समीक्षा हो सकती है।





